श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2330, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ सर्ग
रावणके द्वारा अनरण्यका वध तथा उनके द्वारा उसे शापकी प्राप्ति
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) पूर्वोक्त रूपसे राजा मरुत्तको जीतनेके पश्चात् राक्षसराज दशग्रीव क्रमशः अन्य नरेशोंके नगरोंमें भी युद्धकी इच्छासे गया॥ १ ॥
महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी उन महाराजोंके पास जाकर वह राक्षसराज उनसे कहता—‘राजाओ! तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा यह कह दो कि ‘हम हार गये।’ यही मेरा अच्छी तरह किया हुआ निश्चय है। इसके विपरीत करनेसे तुम्हें छुटकारा नहीं मिलेगा’॥ २-३ ॥
तब निर्भय, बुद्धिमान् तथा धर्मपूर्ण विचार रखनेवाले बहुत-से महाबली राजा परस्पर सलाह करके शत्रु की प्रबलताको समझकर बोले—‘राक्षसराज! हम तुमसे हार मान लेते हैं’॥ ४ ½ ॥
दुष्यन्त, सुरथ, गाधि, गय, राजा पुरूरवा—इन सभी भूपालोंने अपने-अपने राजत्वकालमें रावणके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर ली॥ ५ ½ ॥
इसके बाद राक्षसोंका राजा रावण इन्द्रद्वारा सुरक्षित अमरावतीकी भाँति महाराज अनरण्यद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें आया। वहाँ पुरन्दर (इन्द्र)-के समान पराक्रमी पुरुषसिंह राजा अनरण्यसे मिलकर बोला—‘राजन्! तुम मुझसे युद्ध करनेका वचन दो अथवा कह दो कि ‘मैं हार गया।’ यही मेरा आदेश है’॥ ६—८ ॥
उस पापात्माकी वह बात सुनकर अयोध्यानरेश अनरण्यको बड़ा क्रोध हुआ और वे उस राक्षसराजसे बोले—॥ ९ ॥
‘निशाचरपते! मैं तुम्हें द्वन्द्वयुद्धका अवसर देता हूँ। ठहरो, शीघ्र युद्धके लिये तैयार हो जाओ। मैं भी तैयार हो रहा हूँ’॥ १० ॥
राजाने रावणकी दिग्विजयकी बात पहलेसे ही सुन रखी थी, इसलिये उन्होंने बहुत बड़ी सेना इकट्ठी कर ली थी। नरेशकी वह सारी सेना उस समय राक्षसके वधके लिये उत्साहित हो नगरसे बाहर निकली॥ ११ ॥
नरश्रेष्ठ श्रीराम! दस हजार हाथीसवार, एक लाख घुड़सवार, कई हजार रथी और पैदल सैनिक पृथ्वीको आच्छादित करके युद्धके लिये आगे बढ़े। रथों और पैदलोंसहित सारी सेना