श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह कहकर उन्होंने सीताजीको पुनः प्रणाम किया और फिर वे नावपर चढ़ गये। नावपर चढ़कर उन्होंने मल्लाहको उसे चलानेकी आज्ञा दी॥ २२½ ॥
शोकके भारसे दबे हुए लक्ष्मण गङ्गाजीके उत्तरी तटपर पहुँचकर दुःखके कारण अचेत-से हो गये और उसी अवस्थामें जल्दीसे रथपर चढ़ गये॥ २३½ ॥
सीता गङ्गाजीके दूसरे तटपर अनाथकी तरह रोती हुईं धरतीपर लोट रही थीं। लक्ष्मण बार-बार मुँह घुमाकर उनकी ओर देखते हुए चल दिये॥ २४½ ॥
रथ और लक्ष्मण क्रमशः दूर होते गये। सीता उनकी ओर बारम्बार देखकर उद्विग्न हो उठीं। उनके अदृश्य होते ही उनपर गहरा शोक छा गया॥ २५ ॥
अब उन्हें कोई भी अपना रक्षक नहीं दिखायी दिया। अतः यशको धारण करनेवाली वे यशस्विनी सती सीता दुःखके भारी भारसे दबकर चिन्तामग्न हो मयूरोंके कलनादसे गूँजते हुए उस वनमें जोर-जोरसे रोने लगीं॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥