भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2496

शूरवीर महात्मा शत्रुघ्नके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और भरत तथा लक्ष्मण आदिसे बोले— ॥ ९ ॥

‘तुम सब लोग बड़ी सावधानीके साथ राज्याभिषेककी सामग्री जुटाकर ले आओ। मैं अभी रघुकुलनन्दन पुरुषसिंह शत्रुघ्नका अभिषेक करूँगा॥ १० ॥

‘काकुत्स्थ! मेरी आज्ञासे पुरोहित, वैदिक विद्वानों, ऋत्विजों तथा समस्त मन्त्रियोंको बुला लाओ’॥ ११ ॥

महाराजकी आज्ञा पाकर महारथी भरत और लक्ष्मण आदिने वैसा ही किया। वे पुरोहितजीको आगे करके अभिषेककी सामग्री साथ लिये राजभवनमें आये। उनके साथ ही बहुत-से राजा और ब्राह्मण भी वहाँ आ पहुँचे॥ १२ १/२ ॥

तदनन्तर महात्मा शत्रुघ्नका वैभवशाली अभिषेक आरम्भ हुआ, जो श्रीरघुनाथजी तथा समस्त पुरवासियोंके हर्षको बढ़ानेवाला था॥ १३ १/२ ॥

जैसे पूर्वकालमें इन्द्र आदि देवताओंने स्कन्दका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक किया था, उसी तरह श्रीराम आदिने वहाँ शत्रुघ्नका राजाके पदपर अभिषेक किया। इस प्रकार अभिषिक्त होकर शत्रुघ्नजी सूर्यके समान सुशोभित हुए॥ १४ १/२ ॥

क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामके द्वारा जब शत्रुघ्नका राज्याभिषेक हुआ, तब उस नगरके निवासियों और बहुश्रुत ब्राह्मणोंको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १५ १/२ ॥

इस समय कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी तथा राज्यभवनकी अन्य राजमहिलाओेंने मिलकर मङ्गलकार्य सम्पन्न किया॥ १६ १/२ ॥

शत्रुघ्नजीका राज्याभिषेक होनेसे यमुनातीरनिवासी महात्मा ऋषियोंको यह निश्चय हो गया कि अब लवणासुर मारा गया॥ १७ १/२ ॥

अभिषेकके पश्चात् शत्रुघ्नको गोदमें बिठाकर श्रीरघुनाथजीने उनका तेज बढ़ाते हुए मधुर वाणीमें कहा— ॥ १८ ॥

‘रघुनन्दन! सौम्य शत्रुघ्न! मैं तुम्हें यह दिव्य अमोघ बाण दे रहा हूँ। तुम इसके द्वारा लवणासुरको अवश्य मार डालोगे॥ १९ ॥

‘काकुत्स्थ! पिछले प्रलयकालमें जब किसीसे भी पराजित न होनेवाले अजन्मा एवं दिव्य रूपधारी भगवान् विष्णु महान् एकार्णवके जलमें शयन करते थे, उस समय उन्हें देवता और असुर