भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2501

‘वे दोनों घोर राक्षस बाघका रूप धारण करके कई हजार मृगोंको मारकर खा गये। फिर भी संतुष्ट नहीं हुए। उनके पेट नहीं भरे॥ १२ ॥

‘सौदासने उन दोनों राक्षसोंको देखा। साथ ही उनके द्वारा मृगशून्य किये गये उस वनकी अवस्थापर दृष्टिपात किया। इससे वे महान् क्रोधसे भर गये और उनमेंसे एकको विशाल बाणसे मार डाला॥ १३ ॥

‘एकको धराशायी करके वे पुरुषप्रवर सौदास निश्चिन्त हो गये। उनका अमर्ष जाता रहा और वे उस मरे हुए राक्षसको देखने लगे॥ १४ ॥

‘उस राक्षसके मरे हुए साथीको जब सौदास देख रहे थे, उस समय उनकी ओर दृष्टिपात करके उस दूसरे राक्षसने मन-ही-मन घोर संताप किया और सौदाससे इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥

“महापापी नरेश! तूने मेरे निरपराध साथीको मार डाला है, इसलिये मैं तुझसे भी इसका बदला लूँगा’ ॥ १६ ॥

‘ऐसा कहकर वह राक्षस वहीं अन्तर्धान हो गया और दीर्घकालके पश्चात् सुदासकुमार मित्रसह अयोध्याके राजा हो गये॥ १७ ॥

‘उन्हीं राजा मित्रसहने इस आश्रमके समीप अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया। महर्षि वसिष्ठ अपने तपोबलसे उस यज्ञकी रक्षा करते थे॥ १८ ॥

‘उनका वह महान् यज्ञ बहुत वर्षोंतक यहाँ चलता रहा। वह भारी धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न यज्ञ देवताओंके यज्ञकी समानता करता था॥ १९ ॥

‘उस यज्ञकी समाप्ति होनेपर पहलेके वैरका स्मरण करनेवाला वह राक्षस वसिष्ठजीका रूप धारण करके राजाके पास आया और इस प्रकार बोला— ॥ २० ॥

“राजन्! आज यज्ञकी समाप्तिका दिन है, अतः आज मुझे तुम शीघ्र ही मांसयुक्त भोजन दो। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ २१ ॥

‘ब्राह्मणरूपधारी राक्षसकी कही हुई बात सुनकर राजाने रसोई बनानेमें कुशल रसोइयोंसे कहा— ॥ २२ ॥

“तुमलोग आज शीघ्र ही मांसयुक्त हविष्य तैयार करो और उसे ऐसा बनाओ, जिससे स्वादिष्ट भोजन हो सके तथा मेरे गुरुदेव उससे संतुष्ट हो सकें’ ॥ २३ ॥