भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५ परमेश्वरके सर्वात्मभाव या विराट्-स्वरूपका वर्णन पुरुषोऽन्तरात्मेत्युक्तं पुनरपि | वह परमेश्वर पुरुष एवं अन्तरात्मा है—यह कहा गया, अब सबकी सर्वात्मानं दर्शयति—सर्वस्य | तद्रूपता प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति तावन्मात्रत्वप्रदर्शनार्थम् । उक्तं | फिर भी उसका सर्वात्मभाव दिखलाती है । कहा भी है—"अध्यारोप और च--"अध्यारोपापवादाभ्यां नि- | अपवादके द्वारा निष्प्रपञ्चको प्रपञ्चित ष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते" इति । | किया जाता है" इत्यादि । सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१४॥ वह सहस्र शिर, सहस्र नेत्र और सहस्र चरणोंवाला है तथा पूर्ण है । वह भूमिको सब ओरसे व्याप्त कर अनन्तरूपसे उसका अतिक्रमण करके स्थित है । [ अथवा ऐसा अर्थ करना चाहिये कि नाभिसे ऊपर दश अङ्गुल परिमाणवाले हृदयमें स्थित है ] ॥ १४ ॥ सहस्राण्यनन्तानि शीर्षाण्य- | इसके सहस्र अर्थात् अनन्त शिर हैं इसलिये यह सहस्रशिरवाला है । स्येति सहस्रशीर्षा । पुरुषः पूर्णः । | पुरुष अर्थात् पूर्ण है । इसी प्रकार एवमुत्तरत्र योजनीयम् । स भूमिं | आगेके विशेषणोंका भी अर्थ कर लेना १. अध्यारोप और अपवाद ये वेदान्तके पारिभाषिक शब्द हैं । किसी सत्य वस्तुमें असत्य पदार्थका भ्रम होना अध्यारोप है, जैसे रज्जुमें सर्पकी भ्रान्ति; तथा उस असत्य पदार्थके बाधपूर्वक परमार्थ-सत्यको प्रदर्शित कराना अपवाद है, जैसे कल्पित सर्पके निराकरणद्वारा उसकी अधिष्ठानभूता रज्जुका भान । इसी प्रकार निष्प्रपञ्च ब्रह्ममें मायाका आरोप करके प्रपञ्चप्रतीतिका व्यवस्था की जाती है और प्रपञ्चके अपवादद्वारा शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार कराया जाता है । परन्तु वस्तुतः ये दोनों प्रपञ्चके ही अन्तर्गत हैं, अखण्ड चिन्मात्र शुद्ध ब्रह्ममें तो किसी भी प्रकारके अध्यारोप या अपवादका अवकाश ही नहीं है । इस प्रकार अध्यारोप और अपवाद- के द्वारा उस निर्विशेषका सविशेषरूपसे वर्णन किया जाता है ।