भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 276 में से

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४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ श्रुतिप्रतिपन्नत्वान्निर्विशेषमेव श्रुतियोंसे ज्ञात होनेके कारण ब्रह्मको ब्रह्मावगन्तव्यं न पुनः सविशेष- निर्विशेष ही मानना चाहिये, मिति निर्विशेषपक्षमुपपाद्य का सविशेष नहीं। इस प्रकार निर्विशेष तर्ह्याकारवद्विषयाणां श्रुतीनां गतिः? पक्षका समर्थन करनेपर ऐसी आशंका इत्याकाङ्क्षायां "प्रकाशवच्चा- होनेपर कि 'फिर साकारब्रह्मपरा वैयर्थ्यात्" (ब्र० सू० ३।२। श्रुतियोंकी क्या गति होगी?' १५) इति चन्द्रसूर्यादीनां जला- "प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात्" इस सूत्रसे द्युपाधिकृतनानात्ववच्च ब्रह्मणो- यह बतलाया है कि जलादि ऽप्युपाधिकृतनानात्वरूपस्य विद्य- उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले मानत्वात्तदाकारवतो ब्रह्मण चन्द्र सूर्यादिके नानात्वके समान आकारविशेषोपदेश उपासनार्थो ब्रह्मका भी उपाधिकृत नानात्वरूप न विरुध्यते । विद्यमान है। अतः उपासनाके लिये एवमवैयर्थ्यं नानाकारब्रह्म- औपाधिक आकारवान् ब्रह्मके किसी विषयाणां वाक्या- आकारविशेषका उपदेश करनेमें भी निर्विशेषपक्ष- नामिति भेदश्रुती- कोई विरोध नहीं है। दृढीकरणम् नामौपाधिकब्रह्म- इस प्रकार नानारूप ब्रह्मविषयक विषयत्वेनावैयर्थ्यमुक्त्वा पुनरपि श्रुतिवाक्य भी व्यर्थ नहीं हैं। इस तरह निर्विशेषमेव ब्रह्मेति द्रढयितुम् “आह औपाधिकब्रह्मविषयिणी होनेसे भेद- च तन्मात्रम्” (ब्र० सू० ३।२। श्रुतियोंकी अव्यर्थता बतलाकर फिर १६) इति। "स यथा सैन्ध- भी यह दृढ करनेके लिये कि वघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रस- 'ब्रह्म निर्विशेष ही है' उन्होंने "आह च तन्मात्रम्" इस सूत्रकी अवतारणा की है। इस सूत्रमें “जिस प्रकार नमकका डला बाहर-भीतरसे शून्य


१. [ भिन्न-भिन्न उपाधियोंमें तदनुरूप आकार धारण करनेवाले ] प्रकाशके समान उपाधिभेदसे सविशेष ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी व्यर्थ नहीं है। २. श्रुतिने ब्रह्मकी चिन्मात्रताका प्रतिपादन किया है।