भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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सम्प्रदायका और दो मन्त्रोंसे इसके अधिकारीका वर्णन करके उप- संहार किया गया है। यही संक्षेपमें इस ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषयोंका विवेचन है। ऊपर कहा जा चुका है कि इस ग्रन्थके वाक्योंके आधारसे सांख्यवादी और द्वैतमतावलम्बियोंने भी अपने सिद्धान्तोंका समर्थन किया है। सांख्यवादियोंके लिये तो इस ग्रन्थके दो वाक्य ही परम प्रमाण हैं। उनमें एक चतुर्थ अध्यायका पञ्चम मन्त्र और दूसरा पञ्चम अध्यायका द्वितीय मन्त्र है। पहला मन्त्र इस प्रकार है— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ इस मन्त्रकी लोहितशुक्लकृष्णा अजा ही उनकी रजःसत्त्वतमो- मयी प्रकृति है। तथा उसे सेवन करनेवाला अज बद्ध पुरुष है और उसे त्याग देनेवाला दूसरा अज मुक्त पुरुष है। इस मन्त्रको यदि सांख्यवादका बीज कहें तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी । यही उनके प्रधानकी पोषक एकमात्र श्रुति है । किन्तु भगवान् शंकराचार्यने अपने शारीरकभाष्यमें इस मतका खण्डन करते हुए लोहितशुक्लकृष्णा अजासे त्रिगुणमयी प्रकृति न लेकर छान्दोग्योपनिषद्के छठे अध्यायमें बताये हुए पृथिवी, अप्, तेज तीन सूक्ष्म भूत लिये हैं। उनमें पृथिवी कृष्णवर्ण, अप् शुक्लवर्ण और तेज लोहितवर्ण है । इस प्रकार वहाँ आचार्यने अनेकों युक्तियोंसे प्रधानवादका खण्डन किया है। सांख्यसिद्धान्तका दूसरा मन्त्र इस प्रकार है— यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ इस मन्त्रके आधारपर सांख्यवादियोंने परमर्षि कपिलकी प्राची- नता और प्रामाणिकता सिद्ध करके उनके उपदेश किये हुए सांख्य- सिद्धान्तकी पुष्टि की है। किन्तु आचार्यने इस मतका इसी उपनिषद्- के भाष्यमें खण्डन किया है और 'कपिल' शब्दको कनकवर्ण हिरण्य- गर्भका वाचक बताया है।