भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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७० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦

तत्तद्विशेषरूपेणावस्थितत्वात्स्व- | होनेके कारण उन-उन विशेषरूपोंसे रूपेण शक्तिमात्रेणानुपलभ्यमा- | स्थित रहनेके कारण अपने शक्ति- नाम् । तथा च मानान्तरवेद्यां | मात्र शुद्धरूपसे उपलब्ध नहीं हो शक्तिं दर्शयिष्यति— | सकती । इसी प्रकार आगे चलकर “न तस्य कार्यं करणं च विद्यते | श्रुति उस शक्तिको अन्य किन्हीं न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । | प्रमाणोंसे अज्ञेय ही प्रदर्शित करेगी । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते | “उस परमात्माका कोई कार्य स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥” | ( देह ) या करण ( इन्द्रिय ) नहीं (श्वेता० उ० ६ । ८) | है; उसके समान या उससे अधिक इति । समानमन्यत् । | भी कोई नहीं है । उसकी नाना कारणं देवात्मशक्तिमिति | प्रकारकी पराशक्ति और स्वाभाविक प्रश्ने परिहारे च ये ये पक्षभेदाः | ज्ञानके प्रभावसे होनेवाली क्रिया सुनी प्रदर्शितास्ते सर्वे संगृहीताः । | जाती है ।” शेष अर्थ पूर्ववत् है । उत्तरत्र सर्वेषां प्रपञ्चनादप्रस्तुतस्य | ‘किं कारणम्’ और ‘देवात्म- प्रपञ्चनायोगात्प्रश्नोत्तरदर्शनाच्च । | शक्तिम्’ इस प्रश्न और उत्तरमें समासव्यासधारणस्य च विदुषा- | जो-जो पक्षभेद दिखाये गये हैं | उन सबका यहाँ श्रुतिमें संक्षेपसे | संग्रह किया हुआ है; क्योंकि | आगे इन सबका विस्तारसे निरूपण | किया गया है । तथा अप्रस्तुत विषय- | का विस्तार करना उचित नहीं होता | और [इनके विषयमें तो] प्रश्नोत्तर भी | देखे गये हैं ।* इनका संक्षेप और | विस्तारसे जो वर्णन किया गया है


* इससे भी सिद्ध होता है कि पूर्वोक्त पक्ष श्रुतिसम्मत ही है, क्योंकि यहाँ जितने पक्षान्तर दिखाये गये हैं उन सबमें प्रमाणपूर्वक श्रुतिकी भी सहमति दिखायी ही गयी है।

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