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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

सूत्र—(पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) तन्मात्रों के रूपवाले सूक्ष्म और उनके कार्यरूप-

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१५८ स्पन्दकारिका भुङ्क्ते परवशो भोगं तद्भावात् संसरत्यतः । संसृतिप्रलयस्यास्य कारणं संप्रचक्ष्महे ॥५०॥ भुङ्क्ते अश्नाति, अस्वतन्त्रो भोगं सुखदुःखसंवेदनरूपं, तस्य पुर्यष्टकस्य भावात् संसरति संसारशरीरे, अतः संसृति-प्रलयस्य जन्ममरणप्रवाहरूपस्य संसारस्य विनाश- कारणं संप्रचक्ष्महे वक्ष्यामः ॥५०॥ अनुवाद सूत्र—(पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) तन्मात्रों के रूपवाले सूक्ष्म और उनके कार्यरूप- स्थूल, तथा मनस्, अहंकार और बुद्धि इनके द्वारा परामर्श किये जाने वाले, पुर्यष्टक के बन्धन में पड़ा है। पुर्यष्टक से ही 'प्रत्ययोद्भव' को जन्म मिलता है। फलतः ॥४९॥ (वह) परवश बनकर सांसारिक भोगों को भोगता है। पुर्यष्टक की विद्यमानता से ही बार बार जन्मता और मरता है। इसलिये संसृति के बखेड़े को एक बार ही मिटा देने वाले कारण (उपाय) का वर्णन (अगले सूत्र में) करेंगे ॥५०॥ वृत्ति—'तन्मात्रोदयः' इस शब्द के दो खण्ड हैं—'(१) तन्मात्र और तन्मात्रोदय (क्रमशः सूक्ष्मपुर्यष्टक और स्थूल-पुर्यष्टक)। इसका अभिप्राय यह कि (पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) शब्द आदि तन्मात्रों की अनुभूति के ही रूपवाले और मनस्, अहंकार और बुद्धि इन तीनों के द्वारा परामर्श किये जाने वाले, पुर्यष्टक के बन्धन-में पड़ा है। पुर्यष्टक से ही सुखात्मक या दुःखात्मक संवेदना को जन्म मिलता है। फलतः—॥४९॥ (वह) अस्वतन्त्र बनकर, सुख और दुःख की संवेदना के रूपवाले भोगों को भोगता है। उस (पुर्यष्टक की विद्यमानता से संसार-शरीर में (पाञ्चभौतिक काया में) संसरण करता है। अतः संसृति के नाश का अर्थात् जन्म-मरण के प्रवाहरूप संसार का नाश करने वाले कारण का वर्णन (अगले सूत्र में) करेंगे ॥५०॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित तन्मात्र, पुर्यष्टक इत्यादि शास्त्रीय शब्दों का आंशिक पर्यालोचन भी कुछेक स्थानों पर किया गया है। कुछ बातें रह गई हैं। अतः यहाँ पर इन बातों का संक्षिप्त परन्तु यथासम्भव सर्वाङ्गीण विवेचन प्रस्तुत करना आवश्यक है क्योंकि तभी सूत्र का अभिप्राय समझने में सुगमता होगी। संसार में प्रत्येक प्राणी की काया के दो रूप होते हैं-(१) सूक्ष्म शरीर और (२) स्थूल शरीर। इनमें से सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर का कारणरूप और स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर का कार्यरूप होता है। सूक्ष्म-शरीर त्रिगुणमय मनस्, बुद्धि और अहंकार इन तीन अन्तःकरणों और इनके द्वारा १संवेद्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच सूक्ष्म तन्मात्रों के योग १. एषां ग्राह्यो विषयः सूक्ष्मः प्रविभागवर्जितो यः स्यात् । तन्मात्रपञ्चकं तत् शब्दः स्पर्शो महो रसो गन्धः । (द्र० सा०, २१)

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CC-0.In Public Domain Digitization by eGangotri पुर्यष्टक १५९ से बना होता है । तन्मात्र अवस्था, शब्द आदि पाँच ज्ञेय विषयों की मूलभूत सामान्य अवस्था को कहते हैं । इस अवस्था में उनमें किसी प्रकार की १विशेषता उत्पन्न नहीं हुई है । उदाहर- णार्थ २'गन्धतन्मात्र' गन्ध की उस सामान्य-अवस्था को कहते हैं जिसमें अभी सुगन्ध, दुर्गन्ध, तीव्रगन्ध, मन्दगन्ध, तेल का गन्ध, इत्र का गन्ध, सड़ी लाश का गन्ध इत्यादि विशेषतायें प्रकट न हुई हों, अपितु सामान्य रूप में मात्र गन्धत्व की वर्तमानता हो । 'रस' इत्यादि के विषय में भी यही सिद्धान्त है । तन्मात्ररूप में वर्तमान शब्द आदि विषयों का बाह्य स्थूल इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता है जब कि विशिष्टरूप में विकसित होने पर; बाह्य इन्द्रियों के द्वारा, इनका ग्रहण सहजरूपों में किया जा सकता है । ऐसे ही बने तन्मात्ररूप शब्द आदि पाँच ज्ञेय-विषयों और मनस् इत्यादि तीन अन्तःकरणों से बने हुये, सूक्ष्म शरीर को पारिभा- षिक शब्दों में 'सूक्ष्म-पुर्यष्टक' कहते हैं । दूसरे शब्दों में इसको 'वासना-पिण्ड' भी कहते हैं । स्थूल-शरीर भी त्रिगुणमय मनस्, बुद्धि, अहंकार इन तीन अन्तःकरणों और इनके संवेद्यविषय तन्मात्रों के ही कार्यरूप आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी इन पाँच स्थूल- महाभूतों के मिश्रण से बना हुआ होता है । सूक्ष्म तन्मात्र ही जब अपनी सामान्य-अवस्था को छोड़ कर विशिष्ट-अवस्था में अभिव्यक्त होते हैं तब स्थूल, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध कहलाते हैं और इन्हीं के कार्य स्थूल पञ्चमहाभूत होते हैं । फलतः स्थूलभूतों की मूलावस्था भी तन्मात्र ही होते हैं । ३स्थूलभूतों का रूप धारण करते समय, ये तन्मात्र आपस में एक निश्चित क्रम के अनुसार मिल जाते हैं । वह क्रम इस प्रकार है— सामान्य रूप विशेषरूप १. शब्द-तन्मात्र शब्द गुण वाला स्थूल आकाश । २. शब्द-स्पर्श तन्मात्र स्पर्श गुण वाला स्थूल वायु । ३. शब्द-स्पर्श-रूप तन्मात्र रूप गुण वाला स्थूल तेज । ४. शब्द-स्पर्श-रूप-रस तन्मात्र रस गुण वाला स्थूल जल । ५. शब्द-स्पर्श-रूप-रस गन्ध तन्मात्र गन्ध गुण वाली स्थूल पृथिवी । स्थूलशरीर में इन पाँच महाभूतों की अवस्थिति निम्नलिखित प्रकार से मानी जाती है— १. नाड़ियों इत्यादि के पोले भाग जिनके मध्य में शून्य अवकाश होता है; आकाश के रूप में 'शब्द-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है । २. पाँच स्थूल प्राण, वायु के रूप में 'स्पर्श-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है । १. अनुद्भिन्नविशेषतया स गन्धादिरेव केवलस्तन्मात्र इत्युक्तम् । (तं० वि०, ९.२८१) २. पृथिव्यां सौरभान्यादिविचित्रे गन्धमण्डले । यत्सामान्यं हि गन्धत्वं गन्धतन्मात्रनाम तत् ॥ (तं०, ९. २८०-८१) ३. एतत्संसर्गवशात् स्थूलो विषयस्तु भूतपञ्चकताम् । अभ्येति नभः पवनस्तेजः सलिलं च पृथिवी च ॥ (प० सा०, २२) द्रष्टव्य इसी कारिका की विवृति भी । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

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१६० स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri ३. गर्मी चमक और आकार इत्यादि, तेज के रूप में 'रूप-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है। ४. खून पसीना इत्यादि तरल पदार्थ, जल रूप में 'रस-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है। ५. शरीर में पाये जाने वाले विभिन्न गन्धों के अतिरिक्त कठिन हड्डियाँ; मांस के लोथड़े इत्यादि, पृथिवी के रूप में 'गन्ध-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है। अब यह बात स्पष्ट हो गई कि पाञ्चभौतिक काया भी पुर्यष्टक ही है क्योंकि इसके आधार भी वही पाँच तन्मात्र ओर तीन अन्तःकरण हैं। हां सूक्ष्म-तन्मात्रों का स्थूल कार्यरूप होने के कारण इसकी (काया की) स्थूल-पुर्यष्टक की संज्ञा दी गई है। इन्हीं दो प्रकार के शरीरों को दूसरे शब्दों में क्रमशः भावात्मक और भूतात्मक शरीर कहते हैं। इनके विषय में पहले ही उल्लेख हो चुका है। स्थूल-पुर्यष्टक अल्पकालावस्थायी है अतः प्रत्येक मरण के समय सूक्ष्मशरीर इसको छोड़कर दूसरे भूतशरीर को धारण कर लेता है। सूक्ष्मशरीर तब तक आत्मा का पिंड नहीं छोड़ता है जब तक उसको स्वरूप-ज्ञान प्राप्त न हो। संक्षेप में इतना कहना पर्याप्त है कि सूक्ष्म शरीर आठ प्रकार की शलाकाओं से निर्मित एक पिंजरा है जिसमें आत्मा नामक विहङ्गम महती रुचि से बैठा रहता है क्योंकि स्वनिर्मित विषयोपभोग की द्राक्षा का आस्वादन, उसमें मुक्ताकाश की स्वच्छन्दमयी भूमिका की विस्मृति उत्पन्न करा देता है। साथ ही यह शरीररूपी पिंजरा केवल पिंजरा ही नहीं अपितु आत्मा को एक स्थूल-शरीर से दूसरे में पहुँचाने वाला वाहन भी है। उपर्युक्त तथ्यों की पृष्ठभूमि पर, सूत्रकार का यह कथन ठीक ही है कि वास्तव में पुर्यष्टक ही आत्मा का बन्धन है और यही उसको स्वरूप-लाभ होने तक शतशः दुर्गंतियों में डाल देता है ॥४९-५०॥ [ चक्रेश्वरता की उपलब्धि ] अब अगले सूत्र में संसृति के टंटे को सदा-सर्वदा के लिये समाप्त कर देने वाले कारण का वर्णन किया जा रहा है :- यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोदयौ । नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥५१॥ यदा पुनस्त्वेकत्र स्थूले सूक्ष्मे वा संरूढो लीनचित्तः, तदा तस्य प्रत्ययोद्भवस्य लयोद्भवौ ध्वंसप्रादुर्भावौ नियच्छन् कुर्वन् भोक्तृतां प्राप्नोति। ततः चक्रेश्वरो भवेत् सर्वाधिपतिर्भवति ॥५१॥ अनुवाद सूत्र—जब (साधक) इन से (स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से) किसी एक में व्यवस्थित होता हुआ ही चित्त को लीन करके, अन्तःबहि एकाकार स्पन्दतत्त्व की अनुभूति प्राप्त कर लेता है तब स्वतन्त्रतापूर्वक, उसके (प्रत्ययोद्भव के), सृष्टि और संहार को सम्पन्न करता हुआ,

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चक्रेश्वरता की उपलब्धि १६१ (अपनी खोई हुई) भोक्तृभाव की पदवी पर पहुँच जाता है। अन्तर शक्तिचक्र का ईश्वर (पूर्ण- शिव) बन जाता है ॥५१॥ वृत्ति—जब स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से किसी एक में भी अवस्थित होता हुआ ही, अपने चित्त को स्पन्दतत्त्व में लीन कर लेता है तब उस प्रत्ययोद्भव के संहार और सृष्टि को स्वतन्त्रतापूर्वक सम्पन्न करता हुआ, (खोये हुये) भोक्तृभाव को प्राप्त कर लेता है। अनन्तर चक्रेश्वर बन जाता है अर्थात् सारे शक्तिचक्र का अधिपति (संयोजन और वियोजन का स्वतन्त्र कर्ता पूर्ण-शिव) बन जाता है ॥५१॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र जहाँ एक ओर इस सारे स्पन्दशास्त्र का उपसंहार-सूत्र है वहाँ दूसरी ओर इसका संग्रह-सूत्र भी है। सूत्र के साथ साथ इस सारे स्पन्द-प्रकरण का आद्योपान्त मनन एवं अनुसंधानात्मक पर्यालोचन करने पर भी पाठक सहज ही में निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुँच सकता है। १विश्वोत्तीर्ण और विश्वात्मक रूप में केवल एक ही सर्वस्वतन्त्र चेतनसत्ता विद्यमान है। वह सत्ता प्रकाशरूप शिव और उसकी अभिन्न विमर्शशक्ति की समरस-अवस्था है। शक्ति ही शिव है और शिव ही शक्ति है। अहंविमर्शमय स्पन्द ही शक्ति का स्वरूप है। यह सारा नाम- रूपात्मक व्यक्त विश्व शिव की बहिर्मुखीन शाक्त-स्पन्दना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है यद्यपि अभेद भूमिका पर पूर्णाहन्तारूप स्पन्दशक्ति एक ही है तथापि वह बहिर्मुखीन भेद भूमिका के अवभासन करने का शाश्वत स्वभाव होने के कारण, स्वतन्त्रता से, सामान्यभूमिका से विशेष- भूमिका पर उतर कर, अनन्त भावात्मक और भूतात्मक रूपों में स्पन्दायमान है। इसके ये अनन्त विशेष-स्पन्द ही विश्व के अनन्त चेतन और जड़ भाव हैं। इन्हीं अनन्त शाक्त-स्पन्दों को शास्त्रीय शब्दों में 'शक्तिचक्र' कहते हैं। शिव अपनी इच्छात्मक विमर्शना से ही प्रतिसमय इस शक्तिचक्र के २संयोजन और वियोजन (निमेषोन्मेष) के रूप में, सारे भाववर्ग के, सृष्टि स्थिति, संहार, पिधान एवं अनुग्रह, इन पाँच कृत्यों को युगपत् और स्वतन्त्रता से करता रहता है। फलतः वह इस सम्पूर्ण शक्ति-चक्र का स्वतन्त्र अधिपति होने के कारण '३चक्रेश्वर' है। ४शिव और पशु में कोई मौलिक स्वरूपगत भेद नहीं है। शिव अपनी शक्ति के द्वारा उद्भासित पुर्यष्टक में अपने ही आप को बन्दी बनाकर पशु बना है। इस अवस्था में पड़कर वह स्वरूप को पूर्णतया भूल जाने के कारण अविवेकी, असहाय और परवश बना है। उसको

१ ग्रन्थ के प्रारम्भिक सूत्र, विशेषकर पहला सूत्र। २. द्रष्टव्य तन्त्रालोक नवम आह्निक और ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ज्ञानाधिकार में आभासवाद। ३. द्रष्टव्य तंत्रलोक का चौथा आह्निक। ४. ग्रन्थ के मध्यवर्ती सूत्र, विशेषकर निम्नलिखित सूत्र—'निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य', गुणादिस्पन्द- निष्यन्दाः', 'अप्रबुद्धधियः', 'शब्दराशिसमुत्थस्य', 'सम्ग्रामेऽपि प्रवृत्तस्य'।

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१६२ स्पन्दकारिका पुर्यष्टक का भूत इस प्रकार से चिमट गया है कि वह आविष्ट जैसा बन कर, इसी को वास्त- विक स्वरूप समझता हुआ, सांसारिक विषयोपभोग के मधुमिश्रित हलाहल को मजा ले लेकर पी रहा है और इसके जन्ममरणरूप कटु परिणाम को परवश बनकर भोग रहा है । ऊपर से ब्राह्मी इत्यादि पशुशक्तियों का वर्ग इसको, स्थूल एवं सूक्ष्म अभिलाषात्मक विकल्प परम्पराओं में पग-पग पर उलझा कर, स्वरूप-चिन्तन से दूर रखने पर तुला हुआ है । संक्षेप में तात्पर्य यह है कि इसने अपने भोक्तृभाव के चिन्तामणि को भोग्यभाव की कौड़ियों के दाम बेच डाला है । कितना दुःख, कितना अज्ञान और कितनी विडम्बना है ? १पशुशक्तियों से अधिष्ठित पुर्यष्टक (वासनापिंड) से पिंड छुड़ाकर अपनी इच्छा से ही खोई हुई चक्रेश्वरता को प्राप्त कर लेना ही मानवजन्म का मुख्य उद्देश्य है । इस प्रकार की अर्थसिद्धि संसार के आघात-प्रतिघातों से भागकर, दिन रात केवल पुर्यष्टक का दुःखड़ा रोते रहने से ही सम्भव नहीं हो सकती है, अपितु जीवनक्षेत्र में सारे व्यवहार करते करते और पुर्यष्टक में रहते रहते ही लगातार अहंविमर्शात्मक अनुसन्धान के द्वारा, संसार, पुर्यष्टक, मल, अज्ञान, बन्धन, संकोच इत्यादि सारे जड़-चेतन भावों में, केवल और केवल, शाश्वत, स्पन्दमयी स्वरूपसत्ता की व्यापकता की यथार्थ अनुभूति प्राप्त करने से ही सम्भव हो सकती है । निर्मल एवं चिद्रूप विश्वात्मभाव प्राप्त कर लेने पर कोई भी तथाकथित बन्धन, २बन्धन नहीं रहता है । इस भाव को प्राप्त करने के लिए संकल्प-विकल्पात्मक चित्त को 'चित्-शक्ति' में ही विलीन करना आवश्यक है । निरन्तर तीव्र-अनुसन्धान के द्वारा स्वरूप-अनुभूति को प्राप्त करनेवाले सुप्रबुद्ध योगी, अपनी स्वतन्त्र इच्छा के अनुसार कितने ही पुर्यष्टकों, प्रत्ययोद्भवो या दूसरे द्वन्द्वात्मक भावों के सृष्टि-संहार की क्रीडा स्वयं सम्पन्न करने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं अतः वे इनके भोग्य न बन भोक्ता बन जाते हैं । भोक्तृभाव की स्थिर उपलब्धि ही 'चक्रेश्वरता' की उपलब्धि है । यही शिवत्व की प्राप्ति है । यही जन्म-मरणरूप संसृति का अंत है ॥५१॥ शैवशास्त्रों में गुरुशक्ति का महत्व मुक्तकंठ से स्वीकारा गया है । स्वरूप-अनुभूति के विषय में बड़ी पोथियां पढ़ने अथवा लम्बे व्याख्यान सुनने पर भी, मानव-पशु के संशय- ग्रस्त मन को तब तक संतोष प्राप्त नहीं हो सकता है जब तक अनुग्रहमूर्ति गुरुरूप में अवतीर्ण होकर, स्वयं, उसके अन्धकारावृत हृदय को लोकोत्तर प्रकाश-पुञ्ज से प्रकाशित न करे । अतः उस महामहिमामयी गुरुशक्ति के सामने नतमस्तक होना आवश्यक है :- १. प्रस्तुत सूत्र में वर्णित उद्देश्य । २. यो निश्चयः पशुजनस्य जडोऽस्मि कर्म संपाशितोऽस्मि मलिनोऽस्मि परेरितोऽस्मि । इत्येतदन्यदृढ़निश्चयलाभसिद्धा सद्यः पतिर्भवति विश्ववपुश्चिदात्मा ॥ (तं० सा०, ४ आह्निक )

सूत्र— मैं उस, विचित्र शब्दों और अर्थों से युक्त एवं अतीव अद्भुत, गुरु-वाणी की

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CC-0.In Public न्मेश्वरान् की उपलब्धि by eGangotri १६३ [ गुरुभारती की वन्दना ] अगाधसंशयाम्भोधि समुत्तरणतारिणीम् । वन्दे विचित्रार्थपदां चित्रां तां गुरुभारतीम् ॥५२॥ अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः ॥५२॥ अनुवाद सूत्र— मैं उस, विचित्र शब्दों और अर्थों से युक्त एवं अतीव अद्भुत, गुरु-वाणी की वन्दना करता हूँ जो कि गहरे और अपार संशय-सागर के पार उतारने वाली नैया है ॥५२॥ वृत्ति—अगाध अर्थात् स्वतः निराधार होने पर भी, अंतहीन ॥५२॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में वृत्तिकार ने 'अगाध' शब्द के 'अप्रतिष्ठ' और 'अनन्त' ये पर्याय देकर यह आशय अभिव्यक्त किया है कि वास्तव में संशय नामक किसी वस्तु का सद्भाव ही नहीं है। कारण यह कि अज्ञान ही दूसरे शब्दों में संशय है और गुरु-कृपा से मन में शुद्ध-विद्या का उदय होते ही सारे संशय स्वयं निवृत्त हो जाते हैं। पशु-भूमिका पर जब तक मन में सद्-ज्ञान का उदय न हो तब तक ही संशय सागर का अन्तहीन विस्तार मानवों को दिग्भ्रम में डाल देता है। फलतः इसकी अन्तहीनता केवल तथाकथित है, वास्तविक नहीं। ऐसा लगता है कि वृत्तिकार को 'अगाध' शब्द से ऐसे दो अर्थ लिखने की प्रेरणा इसके दो प्रकार के विग्रहों से मिली है जैसा कि निम्नलिखित पंक्तियों में स्पष्ट किया जा रहा है। १. अगाध— (न अस्ति गाधो विश्रान्ति-भूमिका यस्य ) जिसकी अपनी कोई आधारभूत टिकान नहीं है। २. अगाध— (न अस्ति गाधो विश्रान्ति-भूमिका यस्मिन्) जिसमें कहीं भी दम भरने के लिये कूल-किनारा नहीं है। ऐसे दुष्पार संशय-सागर को पार करने के प्रति उत्सुक व्यक्तियों के लिये, सारे अभिमानों को छोड़ कर, केवल सद्-गुरुओं के चरण-कमलों की सेवा करना प्रथम कर्त्तव्य है। इति श्रीभट्टकल्लट विरचितायां स्पन्दकारिकावृत्तौ 'विभूतिस्पन्दः' तृतीयो निःष्यन्दः ॥ श्रीमान् भट्टकल्लट के द्वारा विरचित स्पन्दकारिका वृत्ति का 'विभूति-स्पन्द' नामक तीसरा निःष्यन्द समाप्त हुआ।

१. ईश्वर आश्रम ( इशबर कश्मीर ) में पढ़ी जाने वाली गुरुस्तुति । रचना वाराणसीय श्रीरामेश्वर...

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१६४ स्पन्दकारिका १गुरुशक्तिर्जयत्येका सद्रूपप्रविकासिका । स्वरूपगोपनव्यग्रा शिवशक्तिर्जिता यया ॥ —इति शिवम्— परिपूर्णेयं 'स्पन्दवृत्तिः' कृतिस्तत्रभवन्महामाहेश्वराचार्य भट्टश्रीकल्लटपादानाम् ॥ परम आदरणीय, महामाहेश्वराचार्य श्रीमान् भट्टकल्लटपाद की प्रस्तुत 'स्पन्दवृत्ति' पूर्ण हो गई ।

सूत्रों की अनुक्रमणिका

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परिशिष्ट I सूत्रों की अनुक्रमणिका संख्या सूत्रार्ध पृष्ठांक १. अगाधसंशयाम्भोधिसमुत्तरणतारिणीम् । १६३ २. अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् । १०४ ३. अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत्सदा । ७७ ४. अतो बिन्दुरतो नादो रूपमस्मादतो रसः । १३८ ५. अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये । १०१ ६. अनेनाधिष्ठिते देहे यथा सर्वज्ञतादयः । १३३ ७. अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात्सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः । १२७ ८. अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्यगनोद्यताः । ९५ ९. अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि । १२१ १०. अवस्थायुगलञ्चात्र कार्यकर्तृत्वशब्दितम् । ८० ११. अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः । ३४ १२. इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । ११८ १३. इयमेवामृतप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः । १२२ १४. एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । १३६ १५. कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । ८१ १६. गुणादिस्पन्दनैःष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । ९२ १७. ग्लानिर्विलुम्पिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः । १३६ १८. जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति । ३० १९. तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः । ११२ २०. तथा यत्परमार्थेन यदा यत्र यथास्थितम् । १३२ २१. तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान् प्रणयस्यानतिक्रमात् । १२६ २२. तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । ११२ २३. तदा तस्मिन्महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे । १०७ २४. तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणः । ६३ २५. तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना । १५७ २६. तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् । ६६ २७. तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदान्यभिचारिणी । ८४ २८. तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि । १०७

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१६६ स्पन्दकारिका संख्या सूत्रार्ध पृष्ठांक २९. तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः । .११८ ३०. दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । १४० ३१. दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते । १३३ ३२. न तु योन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् । ८२ ३३. न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च । ४२ ३४. न हीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते । ५० ३५. नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता । ७१ ३६. निजाशुद्धासामर्थ्यस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः । ५४ ३७. परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः । १५० ३८. प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत् ज्ञानेनालोच्य गोचरम् । १४२ ३९. भुंक्ते परवशो भोगं तद्भावात्संसरत्यतः । १५८ ४०. यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् । २५ ४१. यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत् स्वयम् । ४५ ४२. यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि । १३२ ४३. यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् हृदि स्थितान् । १२६ ४४. यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ । १६० ४५. यस्मात्सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् । ११८ ४६. यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ । १५ ४७. यामवस्थां समालम्ब्य यदयं मम वक्ष्यति । १०७ ४८. लभते तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात् । ४५ ४९. शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । १४५ ५०. स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः । १५१ ५१. सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी । १५१ ५२. ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः । ८९

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परिशिष्ट II पारिभाषिक शब्दों की अनुक्रमणिका अ अभाव-भावना ७४ अख्याति ५५, ५८, ६०, ७८, ८० अभाव-समाधि ७१, ७२, ७३, ७४, ७७ अघोरा १५० अभिमानन ४६ अचित् ३७ अभेद-व्याप्ति ५५, ५८ अणु ४५, ४६, ६२, ६६, ८४ अभेद-सम्बन्ध ५३ अतृप्ति ९८ अमूढ़ता ७१ अधिष्ठान-अवस्था ९१ अमृतत्व १२२ अधिष्ठेय-अवस्था ९० अल्पकर्तृता ६१ अनन्त भट्टारक ८७ अल्प-ज्ञातृता ६१ अनन्यमुखापेक्षो } ५६, ५७, ६४ अलंग्रास-युक्ति १०७, १२४ (कर्तृत्व) } अवभासन १८, २०, २३, २५, २६, २७, अनात्मवादी ३८ ३९, ७५ अनात्मवादी बौद्ध ३७ अवधानात्मक-शक्ति १२७ अनित्यता ९८ अव्यापकता ९९ अनित्यत्व ६२ अव्यापकत्व ६२ अनुग्रहात्मक कृत्य १६ अवरोह-क्रम ११० अनुत्तर-तत्त्व १७, २७, २८, ४०, ४९, ५८, अवस्थाता ३४ ६२, ६४ अशुद्धाध्व ६०, ६१ अनुभव-काल ४० अशुद्धि (मल) ५५, ५८, ५९ अनुभविता ७१ अशून्य ७६ अनुभूति ३४, ३५, ४४, ५५, ५८, ५९, ६९, असत्-रूप ७२ ७८, ७९ असमवायि-कारण २८ अनुसंधानात्मक } १८ अहन्ता ५९, ६१, ७० अहंरूपता } अहं-अभिनिवेश ४४ अनुस्यूत ३४, ४५, ४६, ६७, ८५ अहंकार ३९, ४४, ४६ अनेकाकारता २८, ४० अहं-प्रत्यवमर्शात्मक ४९, ६५ अपूर्णत्व ६२ अहं-प्रत्यवमर्शात्मक } ५७ अप्रतिष्ठित-स्पन्द ९३ (सामान्य-स्पन्द) } अप्रबुद्ध ९५ अहं-प्रतीति ३४ अभाव-ब्रह्मवादी ७०, ७१, ७२, ७३ अहम्-रूप २५, २७, १३४, १४७

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१६८ स्पन्दकारिका अहं-विमर्श १७, २५, ६७, ८०, १४४, ई १४७, १५६ ईश्वर ११७ अहं-विमर्शात्मक १७, २३, ३०, ५४, ८०, ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा ५६ ८४ ईश्वर-स्वरूप ८६ अहं-विमर्शमयी } ५६, ६६ (विश्वात्मक-स्फुरणा) } उ अहं-स्फुरणामय २३ उच्छलनात्मक १७ आ उत्पलदेव २८ आकार २३, २४, २८, ५५, ५६, ६६ उदय १५ आकाश-पुष्प १९ उन्मीलन-समाधि ७० आणव-मल ५९, ९९, १०० उन्मुखता १७, ६१, ६५ आत्मा १७, ३८, ४०, ४१, ७३ उन्मेष-निमेष १७, २१, २४, १५७ आत्म-बल ५०, ५४, ६३, ६६, १३५, १३७ उपस्थ ४६ आधिभौतिक सुखवाद ४१ उपाधियां ४१, ४३, ४४ आन्तर २६, ३०, १३९ उपाधिविशिष्ट } ३६, ३७ आन्तर-चक्र ४८ आत्मवाद } आनन्दात्मक स्वातन्त्र्य २ ऊ आनन्द-शक्ति १९, २६, ५५, ५९ ऊर्ध्व-मार्ग १११ आनन्द-स्वरूप २३ ऊर्मि १७, ६५ आवरण २५, २८, ४८, ५३, ८०, ८७, ९५, अं ९९, १०२ अंतर्मुख-स्पन्द २१, ६५, ८३ आवागमन ६७, ६९ अंतर्विमर्श २६ आश्चर्यमानता ६९ क आश्चर्य-स्पन्दरूपता ६९ करण-वर्ग ४६, ५५ आश्यानता २९ करणेश्वरी-चक्र ४५, ४६, ५५ कर्तृता ५६, ६३, ६४, ६५, ७५, ८०, ८१ इ कर्तृत्व २२, २५, २८, ६७, ८०, ८४ इच्छा-शक्ति २०, २१, २२, ५०, ५३, ५८, क्रम २९ ६४, ८६, ९७ क्रम-मुद्रा ६९, ७० इदन्ता ६१, ७१ कला २२, ६२, ८८, ९६ इदम् १८, २१, ९७ कला-समूह १४५, १४६, १५० इदं-रूपता २५ कार्म-मल ५९ इन्द्रिय-वर्ग ४७ कार्यता २८, ८०, ८१ इष्यमाण-विश्वकल्पना २०

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परिशिष्ट II १६९ कार्यत्व २२, २५, २८, ६९, ८१, ८४ कार्यरूप-जगत् २८ काल २४, २८, ६३, ६५, ६७, ८१, ९७ किञ्चित्-कर्तृत्व ६५, ९७ किञ्चित्-चलन १७, १८, ६५, ६६ किञ्चित्-ज्ञत्व ६५, ९८ क्रिया ५३, ५६, ५८, ५९, ६४ क्रिया-शक्ति २०, २३, २९, ४३, ५५, ९४ कुमारिल ३७ कूर्मांग-संकोच १०६ ख खेचरी २३, ४७, ४८ ग गति-निरोध १०५ गतिमयता २२ गुण २८, ४१ गुणस्पन्द ९३ गुणी २८, ४१ गोचरी २३, ४७, ४८ गन्ध २४, ३२, ४८, ६५, ६९ ग्राहक ४२, ५२, ५७ ग्राहकता ४२, ५३, ७८ ग्राहक-भूमिका ३९ ग्राह्य ४२, ४९, ५१-५२ ग्राह्यता ४२, ७८ ग्राह्य-भूमिका ३९ ग्राह्य-वर्ग ५३, ६२ ग्लानि १३५ घ घनता २९ घोरा १४९ घोरतरा १४९ च चक्रेश्वर १२६, १६०, १६१, १६२ चन्द्रमा १०८ चार्वाक ३४, ३८, ४० चित्-चमत्कार १३६, १३७ चित्-शक्ति २०, ५५, ९६ चिति ५७ चिति-क्रिया ५७ चिति-शक्ति १६, ४८, ४९ चित्त ४४, ७०, १०१, १०२, १०३, १०४, १०९, ११२, ११४, १२८ चिद्-गगनचरी ४८ चिद्-घन १७, ३१ चिद्-दर्पण २९ चिद्-रूप २८, ५३, ६७, ६९, ८१, ८५, ९१, ११३ चिदात्मा २८ चिदाकाश १०९, १११ चिन्मात्ररूप ९१ चेतन १५, २९, ३१, ३४, ४०, ४५, ४७, ५७, ९० चेतना-शक्ति १६, ४७ चैतन्य १६, १७, २९, ३८, ४०, ५०, ५५, ५६, ५७, ५९, ६५-६६, ७९, ९० चैतन्यात्मक-स्वभाव ३४ चैतन्य-विशिष्ट ४१ चैतन्य-सत्ता २९, ३५ चैतन्य-सत्तारूप २८ ज जड़ १८, ७६, ८०, ८४ जड़-प्रमेयवर्ग ५१ जड़-वर्ग ४५ जड़-स्वभाव ३२, ३३, ८५, ८९

धारणा ३१ पशु-दशा २०

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१७० स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri जाग्रत्-अवस्था ८९, ९०, ९१, ९८ निमीलन-समाधि ७० जाग्रत्-स्वातन्त्र्य १३० निमेष १५, २१ जीव २८ निरंजन ११३, ११४ जीव-कला १५२ निर्वाण ७३, ७५ जीवात्मा ६५ निर्वाण-दीक्षा १२२, १२३, १२४, १२५ त निर्विकल्पाभास १४१ तन्मात्र ३९ निर्विकल्प-ज्ञानक्षण ३५, ४० तमोगुण ३२, ४३, ७८, ९३ निस्तिमित-बुद्धिदशा १०५ तुरीय-दशा ६७, ६८, ७० निस्तरंगमहोदधिकल्प ६४ तुरीयदशारूप प स्वच्छन्दभूमिका ६७, ६८ तुरीय-भूमिका ६८, ८२ पति-दशा १९, २० तुर्या ३०, ८८, ८९, ९१ पति-प्रमाता ४८, ५०, ५१, ५३, ५४, ५५, तुर्यातीत ३० ५६, ५७, ६२ तुर्यातीत-दशा ६८ पतिप्रमातृभाव ५४, ६६ द परप्रकाशबिन्दु १२४ दर्पण-नगर २९ पर-प्रतिभा १०१ दिक्-चरी २३, ४७, ४८ परब्रह्म ६३ दुःख ३४, ३५, ३६, ४०, ४२, ४३, परमार्थसत् ४२, ४३, ७२ ५९, ८७ परा ४०, १४६ दुःखिता ३७, ३८, ३९, ९४, ९५, ९६ पराचित्-भूमिका ७० देहात्मवाद ३५, ३८, ४१ परामर्श २७ ध परामृतरस १५१, १५३ धारणा ३१ पशु-दशा २० ध्यान २७ पशु-प्रमाता ४९, ५०, ५१, ५४ पशु-प्रमातृभाव ४८, ५०, ५४, ६६, न पशु-शक्ति १५७ नागार्जुन ७२ पश्यन्ती ४८ नाद ७७, १३८ पिधान ५६, ५९ नाम ३६ पीठेश्वरी १४८ नामरूपात्मक विकल्प ३६ पुरुष-तत्त्व ९७ नित्योदित-समाधि ६९ पुर्यष्टक ३९, ४१, ५१, ८२, ९९, १५८, नित्य-चेतन ४८ १५९, १६२ नित्यत्व ५८ पूर्ण-अहंविमर्श १७ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal नित्य-युक्त ११९ पूर्ण-कर्तृता ५६, ५९, ७०, ७५

प्रकाश ५७ बुद्धि ४६

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परिशिष्ट II १७१ पूर्ण चैतन्य ७५ बिन्दु १३८ पूर्णत्व ५८ बिम्ब ३० पूर्ण-ज्ञातृता ५६, ६४, ७०, ७५ बिम्बग्राही १८ पंच-कृत्य १६, ५८ बीज १४८ पंच-कंचुक ६२, ६९ बुद्ध ८६, ८७, ८८ प्रकाश ५७ बुद्धि ४६ प्रकाशविमर्शमय संघट्ट ९४ बुद्धि-दर्पण ९७ प्रणय १२८ प्रतिविम्ब २९ भ प्रतिष्ठित-स्पन्द ९३ भावराशि ५२ प्रत्ययोद्भव १५०, १५१, १५२, १५३, १६० भाव-वर्ग २७, ७० प्रत्यक्षवाद ४१ भावात्मक १२० प्रथमाभास १४१, १४२ भावनात्मक विश्व ४५ प्रबुद्ध ८४, ८५, ८६, ८७, ८८ भुवन २५, ८८ प्रबुद्ध-प्रमाता ८८ भूतात्मक १२० प्रमा १९, ९१, ९३ भेद-व्याप्ति ४७, ५५, ८६ प्रमाण १९, २७, ३०, ९१, ९३ भैरवी-अवस्था २४ प्रमाता १८, १९, २४, ३२, ३३, ३८, ४३, भौतिक ३७ ४६, ९१, ९२, ९३ भौतिक-वाद ४१ प्रमातृ-भाव ७८ म प्रमेय १८, १९, २१, २४, २७, ३८, ४८, मध्य-धाम १२८, १३० ५१, ९१ मध्य-नाडी १०८, ११०, १११ प्रलय १५ मध्यमा २३, ४८ प्रसार २६ मन्त्र २२, ११२, ११३ प्राण ३२, ४७, ५१, ९३, ९७ मन्त्रदेवता १२१, १२३ प्राणना २१, ९३ मन्त्रवीर्य ११२, १२१, १२२, १२५ प्राणस्पन्द ९४ मन्त्रशक्ति १२५ प्रातिभ-ज्ञान १४२ मल ५९ ब मलत्याग ४६ बहिर्मुख २३, २७, ४२ मलत्रय ५९, ६० बहिर्मुख-प्रसार ६५ महामाया ६० बहिर्मुख-स्पन्द २१, ६५ महासत्ता ८४ बहिष्करण ४७ मातृका (शब्दराशि) २२, ११५, १४७, १४९ बाह्य २६ मातृका १५

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१७२ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri माध्यम्यिक ४४ ल मानसिक विकल्प ३२ लोकायतिक ३८ माया ९६ लोलिका १०० माया-तत्त्व ६०, ६१, ६२, ९६, ९९ माया-शक्ति २१, २७, ४३, ५२, ५५, ६०, व ६१, ६२ वन्ध्या-पुत्र १९ वर्ण २२, ८८ मायीय-आवरण ५४, ६०, ७८, ८८, ९७ वाचक-विश्व २२ मायीय (मल) ५९ वाच्य-विश्व २२ मालिनी ११५ वामेश्वरी ४७ माहेश्वरी २३ विकल्प ३६ मित-प्रमाता ३२, ४९, ५०, ५१, ५५, विकल्प-संस्कार १०२, ११७ ६३ विकल्पात्मक अनुभूति ३४ मुख्य-जाग्रत् ८९ विकास १७ मुख्य-सुषुप्ति ९१ विद्या ६२, ९७, ९८ मुख्य-स्वप्न ९० विनायक १३९ मुद्रा ७० विभव १५, २४ मूढ़ता ४३, ७२, ७४, ७७, ७८, ७९, ९५, विमर्श १६, १८, २६, २७, ४२, ८३ ९६ विमर्श-भूमिका २५ मूढ़-भाव ४२ विमर्श-रूपता २५, २६ मूर्च्छा ३३ विमर्श-शक्ति १५२ मोह ३२, ४२ विमर्शात्मक १५, १८, ५६, ६५ विमर्शात्मक स्फुरणा १४, १८ य विवर्तमात्र ७२ याम्या २३ विशुद्ध-शिवभाव ३१ योगभूमिका ६८ विशेषरूपता ६५ योगेशी २३ विशेष-स्पन्द ९२, ९३, १०३, १०९ योनि १४७ विशेष-स्पन्दशक्ति २०, १६१ विश्व १९, २५, ४७, ५१ र विश्व-चेतना ९२ रजोगुण ३२, ४३, ९३ विश्वमय २३ रस २४, ३२, ४८, ६२, ६८, १३८, विश्वरूप २९ १३९ विश्वरूपता १८, १९, २२ विश्व-वैचित्र्य १५, २२ राग ६२, ९८, ९९, १०० विश्वात्मा ४१ रूप २४, ३२, ३६, ४८, ६२, ६८, १३८

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परिशिष्ट II १७३ विश्वात्मक-शक्तिप्रसर ६५ विश्वात्म-भाव ५२ विश्वोच्छेद ७४ विश्वोत्तीर्णता १९, २१, २३ विस्मय ६८ विज्ञान ३६ विज्ञानदेह १५ विज्ञानवाद ७६ विज्ञप्ति ७६ वृत्ति-प्रत्यस्तमित-दशा १०८ वृत्ति-क्षय-दशा १०५ वेदक ३०, ३१, ३३ वेदना ३६ वेद्यपदार्थ ४४ वेद्यवेदक-संक्षोभ ११८ वैखरी २३, ४८ व्यापकत्व ५८ व्युत्थान-दशा ७०, ७७ श शक्ति २१, २३, २४, ७६ शक्ति-चक्र १५, २२, २३, २४, ४६, ४८, ४९, १६१ शक्तिदरिद्रता ९६, १०० शक्तिपात २१, ४६, ५५, ८८ शक्ति-प्रत्यस्तमित १०५ शक्ति-प्रसार १७, २०, १५२ शक्तिमान् २१, २३, २४ शक्तियुगल २२ शक्तिवर्ग १४५ शङ्कर १६ शब्द २४, ३२, ३३, ४८, ६८ शब्दानुवेध १५४ शब्दराशि १४५, १४६, १४७, १४८ शरीर ३४, ३८ शाक्त-उपाय १०१ शाक्त-बल १३१, १३३, १४९ शाक्त-भूमिका २४, ३१, ६७, ६८, ७०, ८२, ८३, ८६, ८८, ९२, १४२ शाक्त-स्फुरणा १०५, १२९ शाक्त-समावेश ९२ शाक्त-स्वरूप १३५ शाम्भव-समावेश ६९ शाश्वत-स्पन्दमयी } विमर्श-भूमिका } ९२ शाश्वत-स्पन्दमयी } संवित् } ९३ शिव १५, १६, २५, २८ शिवकला १५२ शुद्ध-विद्या ६१, ११२, ११७, १४३ शुद्धाध्व ६०, ६१ शून्य ३२, ७२, ७३, ७५, ७६ शून्यवादी ४४, ७१, ७२, ७५ शून्य-समाधि ७९ शून्यातिशून्यरूप ९४ श्रुत्यन्तविद् ४४, ७०, ७१ ष षट्-कञ्चुक ९९, १५३ स सत् ४४, ७२, ७३ सतत-स्पन्दमयी } संवित् } ५७ सतोगुण ३२, ३३, ९३ सत्तर्क १०३, १२५ सद्-ज्ञान १०३ सबाह्याभ्यन्तर-समावेश ६९ सर्वकर्ता ४८, ५८, १३३ सर्व-वैनाशिक-वाद ७२

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१७४ स्पन्दकारिका सर्वशून्यता ७१ संवित् १६, १९, २२, २३, २५, २९, ६७, सर्वशून्य-वाद ७२ ७७, ८८, ९३, ९४, १०२ सर्वज्ञत्त्व ५८ संवित्-भट्टारिका ३९, ४२, ४९, ५६, ८९ सहजविद्या ११२ संवृति-सत्य ७३ सहज-स्वातन्त्र्य ४५ संवेदन १२० सामरस्य ६५ संसार दशा ४५, ४९, ५६, ५९, ६५, ८७ सामान्य-प्राणना ४१ संस्कार ३६ सामान्य-स्पन्द ९२, ९३, १०१, १०३, १०५, संस्कार-सिद्धान्त ४० १४० संस्कृत-विकल्प १०३ सामान्य स्पन्दमयी } ६९ स्पन्द-तत्त्व ४४, ५०, ७७, १०१ १३४, अहंता १४३ सामान्य-स्पन्दमयी } ७०, ११३, १३९ स्पन्दरूपता ६७ शाक्त-भूमिका स्पन्द-शक्ति १५-१९, २१, ४६, ६७ ९३, सामान्य-स्पन्द-शक्ति २१, २५, ९३, ११०, १०१, १३७ १४१ स्पन्दात्मक-चैतन्य ३५ सुखिता ३७, ३८, ३९, ९४, ९५, ९६ स्पन्दात्मक-स्वभाव ३५, ४५, ११५, १४० सुप्रबुद्ध ८४, ८५, ८६, ८७ स्पन्दात्मक-स्वातन्त्र्य २८, ४५ सुप्रबुद्ध-भाव ८६, ८७ स्पन्दायमान २९, ५६ सुप्रबुद्ध-भूमिका ९५ स्पन्दमयी-पूर्णाहिन्ता ५४ सुषुप्ति ३१, ३२, ३३, ४३, ७४, ७७, ७८, स्पर्श २४, ३३, ४८, ५४, ६२, ६८, ८२, ७९, ९१, ९२ स्फुटतम-विकल्प १०२ सुषुम्णा-मार्ग ११० स्फुरणा १७, १९ सृष्टि ४५, ४८, ५६, ५८, ६४, ७२, स्फुरत्तारूपा संवित् ७५ सोम-सूर्य १०९, १२८ स्मर्यमाण ५५, ६७, ७१, ७७, ७८ सौषुप्त-पद ७७ स्मृति ३०, ३३, ४१, ७८ संकल्प ३२ स्वप्न ३१, ३२, ३३, ३४, ८५, ८९, ९४ संकल्पात्मक } २१ स्वप्न-स्वातन्त्र्य १२९, १३१ गतिमयता स्वभाव २९, ३५, ३९, ५३, ५४, ६३, ६५, संकल्पात्मक } १५, १७, १८ ७१, ७२, १५१ स्फुरण स्वरूपाभास १४१, १४४ संकोच १८, ४८, ५५, ५८ स्वरूप-विश्लेषण १४४ संघट्ट १५६ स्वरूप-ख्याति ७५ संतान १५२ स्वरूप-विकास २५, १४३ संधि-क्षण १०६, १३७ स्वरूप-समावेश ६९

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परिशिष्ट-II १७५ स्वरूप-साक्षात्कार ७० स्वलक्षणाभास ३५, १४१ स्वस्वरूपनिष्ठ ७० स्वस्वरूपभूत ६९, १४४, १५५ सामान्य-स्पन्दात्मकता ६९, १४४, १५५ स्वातन्त्र्य ५६, ५८, ५९, ६० स्वातन्त्र्य-शक्ति १६, १७, १९, २०, २१, ४६, ५१, ५४, ५६, ५७, ६५, ९९ १५३ स्वात्म-विस्मृतिरूप-अख्याति ५५ स्वात्म-संकोच ६५ ह हृदय १६, १७, ६५ क्ष क्षण ९८ क्षणपर्यवसायी ३२ क्षणिक-विज्ञान ३५ क्षोभ ५४, ५५, ६०, ६१, ६३, ६६, १३८, १५० ज्ञ ज्ञाता ६४ ज्ञातृता ५६, ६३, ६४, ७५ ज्ञातृत्व २२, २८, ६७, ज्ञान ४१, ५६, ५८, ६४, ७४, ७५, ८५ ज्ञानेन्द्रियाँ ४६, ४८, ९७ ज्ञान-क्रियात्मक-चैतन्य २९, ७४, ७८ ज्ञान-क्रियात्मक-प्रमातृसत्ता ७७ ज्ञान-क्रियामयी-सत्ता १९ ज्ञानक्रियारूप-वेदकता ७४ ज्ञान-शक्ति २०, ४३, ५५, ५५, ९६ ज्ञान-सन्तान ३५ ज्ञान-क्षण ३५, ४० ज्ञान-ज्ञेयरूपा-शक्ति ७८ ज्ञेय ७५, ९० ज्ञेयरूप ३२, ९०, ९१

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