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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

सूत्र—(दूसरी ओर) वे मन्त्र शान्तरूप अर्थात् शुद्ध संवित्-रूप और निरञ्जन अर्थात्

मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११३ अनुवाद सूत्र—प्रत्येक प्रकार के मन्त्र उस स्पन्दरूप आत्मबल के साथ तादात्म्य प्राप्त करने से ही सर्वज्ञता इत्यादि (छः प्रकार के) माहेश्वर ¹बलों को प्राप्त करके शोभित होने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में वे (मन्त्र) किसी भी मनचाहे कार्य को अधिकार पूर्वक सिद्ध करने के लिये, उसी प्रकार, सहज ही में प्रवृत्त होते हैं जिस प्रकार शरीरधारियों की इन्द्रियां संकल्प- मात्र से ही अपने अपने कार्यों को सिद्ध कर देती हैं ॥ २६ ॥ वृत्ति—सारे मन्त्र उस आवरणहीन चिद्रूपता के साथ एकाकार होने से ही सर्वज्ञता इत्यादि माहेश्वर बलों को प्राप्त करके श्लाघ्य बन जाते हैं और शरीरधारियों की इन्द्रियों की तरह हो, अपने अनुग्रह इत्यादि अधिकारिता के कामों की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। (आत्मबल का स्पर्श प्राप्त करने के बिना) वे किसी दूसरे प्रकार के आकार विशेष अर्थात् अक्षरों और मात्राओं की (किसी पुस्तकादि में अंकित) विशेष रचनामात्र के द्वारा किसी भी कार्य को सिद्ध नहीं कर सकते हैं ॥ २६ ॥ सूत्र—(दूसरी ओर) वे मन्त्र शान्तरूप अर्थात् शुद्ध संवित्-रूप और निरञ्जन अर्थात् मायीय उपराग से रहित होकर, आराधना करने वाले के चित्त के साथ-साथ, चिदाकाश में ही लीन हो जाते हैं। इस कारण सारे मूलतः शिवधर्मा अर्थात् शिवरूप ही हैं ॥२७॥ वृत्ति—ये ही मन्त्र सांसारिक भोगसिद्धि से निवृत्त होकर और माया के उपराग से रहित होकर शान्तरूप बन जाने के कारण, साधक के चित्त के साथ ही उस स्वभाव अर्थात् विशुद्ध चिद्-रूपता या दूसरे शब्दों में सामान्य-स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका के असीम अवकाश में लीन हो जाते हैं। वास्तव में प्रत्येक प्रकार के मन्त्र का पार्यन्तिक एवं अनौपचारिक स्वभाव यही है कि वह (पशुभाव में पड़ी हुई) आत्मा को शिवभाव के साथ एकाकार बना लेता है। इन कारणों से सारे मन्त्रों को शिवात्मक अर्थात् शिवरूप ही कहा जाता है ॥ २७ ॥ विवरण भोगरूप और मोक्षरूप फलों के आधार पर मन्त्र दो प्रकार के हैं—(१) साञ्जन, (२) निरञ्जन । मन्त्रशक्ति का साञ्जनरूप वह है जिसको सांसारिक भोगरूप फलों को प्राप्त करने के अभिप्राय से प्रयोग में लाया जाता है। कई साधक, अपने में मन्त्रवीर्य को विकसित करने के अनन्तर, उसके द्वारा दैनिक जीवव्यवहार के साथ सम्बन्ध रखने वाले कार्यों को सिद्ध करने लगते हैं। उदाहरणार्थ वे किसी पर अनुग्रह, किसी पर निग्रह, किसी का रोगनिवारण, किसी का मारण इत्यादि अवरकोटि के लक्ष्यों को पूरा करने में लग जाते हैं। ऐसे मन्त्र मायीय उपरागों के द्वारा ही रंजित होने के कारण 'साञ्जन-मन्त्र' कहलाते हैं। १. सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि-बोध, अप्रतिहत-स्वातन्त्र्य, शक्ति का निर्वाध प्रसार, विश्वरूप में विकसित अनन्त शक्तियों का ऐश्वर्य, ये छः प्रकार के माहेश्वर बल हैं। ८

सूत्रकार के इस उपरलिखित अभिप्राय को अच्छी प्रकार समझने के लिए मन्त्रशक्ति

११४ स्पन्दकारिका निरञ्जन मन्त्रशक्ति वह है जिसको केवल अपने आप में शिवत्व की अभिव्यक्ति के लिए ही प्रयोग में लाया जाता है। ऐसे मन्त्रों पर किसी भी प्रकार का मायीय रंग चढ़ा हुआ नहीं होता है अतः ये 'निरञ्जन-मन्त्र' कहलाते हैं। यह बात मन्त्रवीर्य के अनुभवी साधकों की रुचि पर निर्भर है कि क्या वे मन्त्रों का साञ्जन उपयोग करें या निरञ्जन ? प्रस्तुत दो सूत्रों में ऐसे लोगों का मुखमुद्रण करने का प्रयास किया गया है जिसके विचार में मन्त्रशक्ति की बातें एक 'ढकोसले' अथवा आज की शब्दावली में 'शोषण' के अति- रिक्त और कुछ नहीं है। सूत्रकार के विचारानुसार ऐसे लोग मन्त्र और मन्त्रवीर्य का वास्त- विक रूप समझने में गलती कर रहे हैं। साधारण रूप में 'मन्त्र' शब्द से पुस्तकों के पन्नों में अंकित अनेक प्रकार की १वर्णरचनाओं का अभिप्राय लिया जाता है परन्तु वह बिल्कुल गलत है क्योंकि उसमें कोई बल नहीं होता है। वास्तव में मन्त्र उच्चतर-भूमिका पर अवस्थित उस निर्मल एवं विकल्पहीन २संवेदन को कहते हैं जिसके द्वारा योगियों को अपनी भौतिक काया में ही छिपी हुई अमोघ और असीम आत्मशक्ति की अनुभूति हो जाती है। फलतः साधारण से साधारण मन्त्र का उच्चारण भी महान् प्रभावोत्पादक बन सकता है परन्तु यदि उसके साथ आत्मशक्ति का सहयोग हो, अन्यथा नहीं। सूत्रकार के इस उपरलिखित अभिप्राय को अच्छी प्रकार समझने के लिए मन्त्रशक्ति के साथ सम्बन्ध रखने वाली कई निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना आवश्यक है। मन्त्र का स्वरूप — ३मन्त्र शब्द अवबोधनार्थक 'मनु' और पालनार्थक 'तृ' इन दो धातुओं के संयोग से बना हुआ है। इस आधार पर मन्त्र का सीधा सम्बन्ध कोरी लिपिबद्ध वर्णरचना से ऊपर उठ कर, आंतरिक संवेदन के साथ जुड़ जाता है क्योंकि मानव में संवे- दनात्मक शक्ति ही ऐसी है जिसके द्वारा वह सामान्य-स्पन्दात्मक स्वरूप का आन्तररूप में मनन करने से, अपनी आत्मा को पशुता के संकुचित स्तर से बहुत ऊपर उठाने के रूप में उसका पालन कर सकता है। शैव शब्दों में संवेदन को 'चित्त' कहते हैं। चित्त के द्वारा ही साधारण व्यवहार से लेकर परमतत्त्व के स्वरूप तक का विमर्श सम्भव हो सकता है। पहले यह बात समझाई गई है कि संवेदन, चित्त, मन्त्र और विमर्श इनका स्वरूप आंतरिक आत्मस्फुरणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है अतः ये सारे शब्द पर्यायवाची होने के कारण एक ही आत्म-स्पन्दना के द्योतक हैं। १. लिपिस्थितस्तु यो मन्त्रो निर्वीर्यः सोऽत्र कल्पितः (तं०, ४.६६ में उदाहृत) २. मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः, न तु विचित्रवर्ण- संघट्टनामात्रम् ............। (शिवसूत्रवि०, २.१) ३. 'मनु अवबोधने', 'तृ पालने' इत्येताभ्यां निष्पन्नतया निर्वचनीयत्वेन निर्णीततया उच्यते। (शिवसूत्र, २.१ की टिप्पणी)

मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११५ शैवदार्शनिकों के विचारानुसार विमर्श या आत्मस्पन्दना ही प्रत्येक भाव का 'हृदय है क्योंकि सारे भाव यहाँ से निकलकर अन्ततोगत्वा इसी में विश्रान्त भी हो जाते हैं। इस बात का उल्लेख हो चुका है कि अभिनवगुप्ताचार्य जी के कथनानुसार जड़ का हृदय चेतन, चेतन का हृदय प्रकाश और प्रकाश का हृदय विमर्श है। विमर्शात्मक आत्म-स्फुरणा ही परमन्त्र है और इसका वास्तविक स्वरूप मात्र 'अहंविमर्श' है। यहाँ तक यह बात स्पष्ट हो गई कि २'मन्त्र' का वास्तविक स्वरूप 'अहंविमर्श' है। अब देखना यह है कि विमर्श किस रूप में कार्यनिरत होता है? विमर्श चाहे जिस किसी भी भूमिका पर अवस्थित हो शब्दना अथवा अभिलाप ही इसका रूप है। शब्दना से रहित विमर्श के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। उच्चतम भूमिका पर अवस्थित विमर्शात्मक शब्दना को शास्त्रीय शब्दों में 'परा-वाणी' कहते हैं। यह परा-वाणी अथवा आन्तर-शब्दना एक ऐसी मात्र स्पन्दनामयी शब्दना है जिसमें अनन्त एवं अतर्क्य स्थूल वाचक और वाच्यरूप शब्दराशि, मोर के अण्डरस के न्याय से, केवल स्फुरणा के रूप में ही अवस्थित है। इस भूमिका पर अवस्थित शब्दना में कोई स्थूल वाच्यवाचकरूप विभाग न होने के कारण यह 'बीजरूप' अर्थात् 'अहंरूप' ही है। सारे मन्त्र मूलतः 'परा-वाणी' रूप ही हैं। 'परा-वाणी' के विषय में पहले भी इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि यही वह सामान्य स्पन्दना है जिसका स्वरूप अगतिमय गति है और जो अचल आत्मा में ३चलता का आभास करा देती है। यह चलता ही परमेश्वर की ज्ञानक्रियात्मक विमर्शना है। परा-शब्दना बहिर्मुख प्रसार की प्रक्रिया में पश्यन्ती और मध्यमा अवस्थाओं में से प्रसृत होती हुई और उत्तरोत्तर स्थूल होती हुई, वैखरी वाणी का रूप धारण करके, ४'अ' से 'क्ष' तक मातृका या 'न' से 'फ' तक मालिनी के रूप में विकसित होती है। इस दृष्टि से यदि देखा जाये तो अनेक शास्त्रों में लिखे गये केवल विशिष्ट वर्ण-रचनात्मक मंत्र ही नहीं १. हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनम्, तस्यापि प्रकाशा- त्मकत्वम्, तस्यापि विमर्शशक्तिः-इति विश्वस्य परमे पदे तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं यत्र-तत्र अभिधीयते । (ई० प्र० वि, १.५.१४) २. मन्त्रश्च विमर्शनात्मा (ई० प्र० वि, १.५.१४) ३. एषैव च किञ्चिद्रूपता यत् अचलमपि चलमाभासते । (ई० प्र० वि०, १.५.१४) - ४. संस्कृत वर्णमाला का 'अ'से 'क्ष' तक का क्रम आज भी प्रचलित है। इस क्रम को शास्त्रीय शब्दों में 'मातृका' या 'पूर्वमालिनी' कहते हैं। स्वच्छन्दतन्त्र में इसी क्रम को स्वीकारा गया है। इसके प्रतिकूल मालिनी-विजयोत्तरतन्त्र में वर्णमाला को 'न' से 'फ' तक के दूसरे क्रम में भी रखा गया है। इसका शास्त्रीय नाम 'मालिनी' है। यह क्रम इस प्रकार है- न, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, थ, च, ध, ई, ण, उ, ऊ, ब, क, ख, ग, घ, ङ, इ, अ, व, भ, य, ड़, ढ़, ठ ज्ञ, ण, ज, र, ट, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष, क्ष, म, श, अं, त, ए, ऐ, ओ, औ, द, फ। (ये कुल पचास अक्षर हैं)

·११६ स्पन्दकारिका प्रत्युत प्रत्येक शब्द, वर्ण, मात्रा अर्थात् मुख से उच्चारण की जाने वाली प्रत्येक ध्वनि 'मन्त्र' कहलाती है। इन वैखरी रूप स्थूल ध्वनियों की पृष्ठभूमि में भी वह आन्तर-विमर्श ही कार्य- निरत होता है। यही कारण है कि साधारण सांसारिक आदान-प्रदानों में भी मुख से उच्चा- रित ध्वनियां विचित्र प्रकार के प्रवाहों को उत्पन्न कर सकती हैं। स्पष्ट है कि जब स्पन्दशक्ति का ही विकासमात्र होने के कारण साधारण से साधारण वर्ण भी कभी कभी कल्पनातीत हलचल को पैदा करने की क्षमता रखता है तो मन्त्र में ऐसी शक्ति क्योंकर नहीं हो सकती है ? १वास्तव में सारे वर्ण पररूप अर्थात् शिवरूप और उनसे बने मन्त्र शक्तिरूप हैं। तन्त्रशास्त्रों में अनेक प्रकार के मन्त्रों का उल्लेख मिलता है। साथ ही वहाँ पर, उनसे विशेष प्रकार के प्रभावों को उत्पन्न करने के लिये, उनके उच्चारणों और जपों की विशेष परिपाटियों और तदनुकूल विशेष वातावरणों एवं देश-कालों का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत किया गया है। अनुभवी गुरुओं का कथन है कि यदि शास्त्रों में वर्णित नियमों का शत-प्रतिशत पालन करते हुये, मन्त्रों का अभ्यास किया जाये तो वे अवश्य मनचाहे प्रभावों को उत्पन्न कर लेते हैं। शर्त केवल इतनी है कि साधक को मन्त्रशक्ति का प्रयोग करने से पहले आत्मशक्ति की अनुभूति हुई होनी चाहिये। गुरुओं का कथन है कि २मन्त्रों में स्पन्दात्मक बल स्वभाव से ही अन्तर्निहित है। कसर इस बात की है कि पशुओं के चित्त की निर्मलता पर कुत्सित विकल्पों की काई जमी होती है अतः उनको अपनी ही शक्ति का परिचय नहीं होता है। आत्मबल की विस्मृति की अवस्था में मन्त्र का वीर्यहीन होना स्वाभाविक है और बार बार उच्चारण करने पर भी पतझड़ की मेघमाला के समान, उससे कोई अभीष्ट फल प्राप्त नहीं हो सकता है। योगियों को मन्त्रशक्ति का अनुभव स्वरूप की स्पन्दमयता का निरन्तर ३अनुसन्धान करने के भगीरथ प्रयत्न से होता है, अन्यथा नहीं। वास्तव में स्वरूप का विकास ही ४मंत्रशक्ति का विकास समझना चाहिये। आन्तर अनुसन्धान के परिपक्व हो जाने पर मन्त्र के उच्चारणमात्र से ही अभीष्ट परिणाम प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ऐसी अवस्था में मन्त्रशक्ति ५स्वात्मरूप में ही स्फुरित होती है। आन्तर अनुसन्धान की क्षमता प्राप्त करने के लिये सबसे पहले अपने चित्त को निर्मल बनाना एक मौलिक आवश्यकता है क्योंकि निर्मल चित्त में ही स्वरूप का प्रकाशपुञ्ज १. सर्वे वर्णात्मिका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये। (तं० स०, शि० सूत्र २.३ में उदाहृत) २. मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरन्वया। तया हीना वरारोहे । निष्फलाः शरदभ्रवत् ॥ (तं० स०, शि० सू० २. १ में उदाहृत) ३. तस्यानुसन्धानम्.......मन्त्रवीर्यस्यानुभवः । (शिवसूत्रवि०, १. २२) ४. शक्तिः मन्त्रवीर्यस्फाररूपा । (शिवसूत्र, २. १ उपक्रमणिका) ५. स्वात्मरूपतया स्फुरणं भवति । (शिवसूत्रवि०, १. २२)

मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११७ अखण्डरूप में प्रतिबिम्बित हो जाता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने लिये पूर्वोक्त 'विकल्पसंस्कार' की युक्ति ही सरलतम हो उपाय है क्योंकि इसमें अन्य उपायों के लिये आवश्यक दुरूह शास्त्रीय विधि-विधानों का पालन करने की माथापच्ची का टंटा नहीं होता है। पहले भी कहा गया है कि उत्सुक व्यक्ति दैनिक आदान-प्रदान करता हुआ भी, अपने मानसिक संतुलन पर दृढ नियन्त्रण रखकर, धीरे धीरे सद्धिमर्श के द्वारा चित्त से कुत्सित विकल्पों का बहिष्कार कर सकता है। विकल्पों का संस्कार करने से भावनायें निर्मल हो जाती हैं और परिणामतः मनमें स्वयं ही शुद्धविद्या का उदय हो जाता है। सावक को, मन में शुद्धविद्या के स्वर्णिम आलोक का उदय होते ही, मन्त्रशक्ति की अनुभूति हो जाती है। इस सम्बन्ध में भगवान् १अभिनवगुप्त ने अपने ग्रन्थ तन्त्रालोक में भावनाओं की स्वच्छता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। उन्होंने इस महान् ग्रंथ में एक स्थान पर श्री-मालिनी- विजय के प्रमाणवाक्य को उद्धृत करके 'तदाक्रम्य' इत्यादि प्रस्तुत सूत्रों का यही अभिप्राय निकाला है कि आत्मोद्धार करने के दुर्गम मार्ग को पार करने के लिये भावनाओं की निर्मलता से बढ़कर और कोई भी सहायक सामग्री उपयुक्त नहीं बन सकती है। फलतः मन्त्रवीर्य की अनुभूति प्राप्त करने का सरलतम और प्रभावोत्पादक उपाय 'विकल्प संस्कार' ही है। अभी ऊपर जिस शुद्धविद्या का उल्लेख किया गया है उसके सम्बन्ध में यहाँ पर थोड़ा सा स्पष्टीकरण आवश्यक है। छत्तीस तत्त्वों में ईश्वरतत्त्व से नीचे और मायातत्त्व से ऊपर एक अन्तरालवर्ती तत्त्व है। उसको 'शुद्धविद्या-तत्त्व' कहते हैं। प्रस्तुत प्रकरण में शुद्धविद्या शब्द से उसका अभिप्राय नहीं है, अपितु यहाँ पर यह शब्द उसी पूर्वोक्त शुद्धविमर्श का द्योतक है जिसके उदय में आते ही योगी के हृदय में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता इत्यादि छः माहेश्वर धर्म स्वयं ही निखर उठते हैं। शैवशास्त्रियों ने, प्रस्तुत २'विद्या' शब्द की व्युत्पत्ति लाभार्थक 'विद्लृ' धातु, विचारार्थक 'विद्' धातु और ज्ञानार्थक 'विद्' धातु इन तीन धातुओं से मानकर, इसका निर्वचन निम्नलिखित तीन प्रकार से किया है। १. विद्या (लाभार्थक 'विद्लृ' धातु)—विमर्श की वह उच्चत्तम भूमिका जिसके विकसित हो जाने पर, योगी को सर्वज्ञता इत्यादि शिवधर्मों का लाभ सहज ही में हो जाता है। १. नियतिप्राणतायोगात् सामग्रीतस्तु यद्यपि। सिद्धयो भाववैमल्यं तथापि निखिलोत्तम् ॥ उक्तं श्रीसारशास्त्रे च निर्विकल्पो हि सिद्ध्यति । क्लिश्यन्ते सविकल्पास्तु कल्पोक्तेऽपि कृते सति ॥ 'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा'—'अयमेवोदयः स्फुटः' । इत्यादिभिः स्पन्दवाक्यैरैतदेव निरूपितम् ॥—(तं०, ३.११०-१४) २. द्रष्टव्य—स्वच्छन्दोद्योत (४. ३९५-९६)

११८ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri २. विद्या (विचारार्थक 'विद्' धातु)—विमर्श की वह उच्चतम भूमिका जिसके विकसित हो जाने पर, योगी में अकस्मात् यह विचार उत्पन्न हो जाता है कि मैं अनादिधर्मा हूँ अर्थात् स्वातन्त्र्यशक्ति ही मेरा वास्तविक स्वभाव है। ३. विद्या (ज्ञानार्थक 'विद्' धातु)—योगिसंवेदन की वह अवस्था जिस पर पहुँचकर योगी को, स्वयं ऐसा ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में मैं स्वयं ही शक्ति-केन्द्र शिव हूँ और यह समूचा विश्व मेरे ही स्वरूप की स्पन्दनामात्र है। संवेदन की ऐसी तीव्र अवस्था को शास्त्रीय शब्दों में 'उन्मना' अवस्था भी कहते हैं। फलतः सूत्रकार के मन्तव्य का निष्कर्ष यह कि योगी का संवेदन जब इतना परिपक्व हो जाता है कि मन्त्र का उच्चारण करते ही उसके चित्त, मन्त्र और मन्त्रदेवता की सघन संवेदनात्मक एकाकारता हो जाती है तब मन्त्र, लिखित वर्णों की विशेष रचनामात्र न रह कर, एक ऐसी अमोघ शक्ति बन जाता है कि उससे कोई भी अभीष्ट फल अवश्य प्राप्त किया जा सकता है ॥२६-२७॥ [ आत्मसत्ता और संवेद्यविषय ] अगले तीन सूत्रों में यह समझाया जा रहा है कि वेदकरूप आत्मसत्ता की व्यापकता केवल मन्त्रसमुदाय तक ही सीमित नहीं, प्रत्युत सारा वेद्यवेदक संक्षोभ ही स्वरूप का विकास है। फलतः जब भगवान् शिव सर्वमय है तो उसी का पशुरूप जीव भी वास्तव में सर्वमय ही है। योगी लोग अपने विशुद्ध संवेदन के द्वारा इस बात की अनुभूति प्राप्त करके जीवनमुक्त बन जाते हैं :— यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् । तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥२८॥ सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात् बाह्यार्थमनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिरःपाण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य शरीरम् ॥२८॥ तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥२९॥ तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो, न त्वन्यत् भोग्यमस्ति ॥२९॥ इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥३०॥ एवंस्वभावं यस्य चित्तं, यथा—'मन्मयमेव जगत् सर्वम् इति', स सर्वं क्रीडा- त्वेन पश्यन् नित्ययुक्तत्वात् जीवन्नेव ईश्वरवत् मुक्तो, न त्वस्य शरीरादि बन्धकत्वेन वर्तते ॥३०॥

सूत्र- जीव (पशुप्रमाता) सर्वमय ही है क्योंकि यह भी (पतिप्रमाता की तरह) संसार

आत्मसत्ता और संवेद्य विषय ११६ अनुवाद सूत्र- जीव (पशुप्रमाता) सर्वमय ही है क्योंकि यह भी (पतिप्रमाता की तरह) संसार के सारे (घट, सुख इत्यादि) भावों के साथ संवेदनात्मक तादात्म्य प्राप्त करके उनकी १सर्जना करता रहता है ॥ २८ ॥ वृत्ति- यह जीवात्मा सर्वमय है क्योंकि यह निजी संवेदन के द्वारा संसार के प्रत्येक भाव की सर्जना करता रहता है। जो ही पदार्थ अनुभव में आता है वही संवेदन का विषय बन जाता है। यह (जीवात्मा) किसी भी बाह्य पदार्थ का अनुभव करने के बाद तत्काल ही, उसको अपने शरीर के रूप में ग्रहण कर लेता है। अतः इसका वही एक शरीर नहीं होता है जिसके साथ सिर, पैर इत्यादि अंगों के चिह्न लगे हुये हों ॥ २८ ॥ सूत्र- अतः सारे वाचक और वाच्यरूप पदार्थों की संवेदनाओं की कोई भी ऐसी अवस्था नहीं जो शिवरूप नहीं है। वास्तविक स्थिति यह कि प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (आत्मा) ही भोग्य (प्रमेय) पदार्थों के रूप में उल्लसित होकर शाश्वतरूप में वर्तमान है ॥ २९ ॥ वृत्ति- आत्मा का वैसा सर्वमय स्वभाव होने के कारण, शब्दों और अर्थों की संवे- दनाओं की कोई भी ऐसी अवस्था नहीं जो शिवमम स्वभाव को अभिव्यक्त करने वाली नहीं है। अतः वस्तुस्थिति यही है कि प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (वेदक सत्ता) ही भोग्य पदार्थों (वेद्यसत्ता) के रूप में आभासमान है। भोग्य पदार्थ चेतन भोक्ता से इतर नहीं हैं ॥ २९ ॥ सूत्र- जिस योगी के संवेदन का ऐसा रूप विकास में आया हो, वह सारे विश्व को केवल अपनी खिलकौरी के रूप में देखता हुआ, नित्ययुक्त (स्वरूप के साथ तन्मय) हो जाता है। अतः इस बात में कोई संशय नहीं कि वही पुरुष जीवन्मुक्त है ॥ ३० ॥ वृत्ति- जिस योगी के चित्त का ऐसा स्वभाव विकास में आया हो कि 'यह समूचा विश्व मेरा ही स्वरूप है', वह समूचे प्रमेयविश्व को अपने खिलौने के रूप में देखता हुआ, २नित्ययुक्त होने के कारण, पाञ्चभौतिक काया में रहता हुआ भी ईश्वर की तरह मुक्त है। ऐसे व्यक्ति के लिये शरीर इत्यादि की वर्तमानता बन्धक के रूप में नहीं होती है ॥ ३० ॥ विवरण प्रस्तुत सूत्रों में आत्मसत्ता की वास्तविक सर्वमयता का मन्तव्य प्रस्तुत किया गया है। इस मन्तव्य के अनुसार संसारी जीव भी वैसा ही विश्वशरीरी है जैसा कि स्वयं भगवान् शिव है। जिसप्रकार भगवान् अपनी नित्यस्पन्दमयी विमर्शशक्ति के द्वारा अनन्त प्रकार के वेदकों और वेद्योँ से परिपूर्ण विश्व को सत्ता देकर, उसको अपने शरीर के रूप में धारण करके अव- स्थित है, उसी प्रकार जीव भी पग पग पर अपने संवेदन के द्वारा प्रत्येक प्रकार के भूतात्मक या भावात्मक पदार्थों को सत्ता देकर, उनको अपने शरीर के रूप में ग्रहण करता हुआ अव- १. स्पन्दशास्त्र में 'सृष्टि' शब्द से सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँचों कृत्यों का अभिप्राय लिया जाता है। २. प्रतिसमय स्वरूपसत्ता के साथ आंतरिक रूप में जुड़ा हुआ।

१२० स्पन्दकारिका स्थित रहता है। आत्मसत्ता चाहे शिवभाव पर अवस्थित हो या पशुभाव पर, स्वभावतः वेदक सत्ता है क्योंकि ज्ञान-क्रियामयी स्पन्दना ही इसका मात्र स्वरूप है। सारे वेद्य पदार्थों का अस्तित्व या अनस्तित्व मौलिक वेदक-सत्ता पर ही निर्भर है क्योंकि वही चेतन होने के कारण अपने स्वतन्त्र संवेदन के द्वारा उनको १ सत्ता प्रदान करती है। फलतः विशेष आकार- प्रकार वाला और सिर पैर इत्यादि अङ्गों की सहकारिता से उपलक्षित, पाञ्चभौतिक शरीर ही जीवात्मा का मात्र २ शरीर नहीं होता है अपितु उससे इतर जिन जिन पदार्थों के साथ उसकी संवेदनात्मक एकाकारता होती रहती है, उन उन में संवेदन के ही रूप में अनुप्रविष्ट होकर, उनको अपना शरीर बनाता रहता है। अतः इस दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि पर यदि दृढ़ अनुसंधान किया जाये तो स्वयं यह तथ्य अनुभव में आ जाता है कि जीवात्मा भी वास्तव में विश्वशरीरी (सर्वमय) है। संसार के सारे संवेद्य विषय, जिनको जीवात्मा संवेदन के द्वारा शरीर रूप में स्वीकारता या नकारता रहता है, दो प्रकार के हैं—'भूतात्मक विषय' और 'भावात्मक विषय'। इनकी परिभाषा इस प्रकार है— १. भूतात्मक विषय—वे विषय, जो पाँच महाभूतों के मिश्रण से बने हुए, विचित्र एवं अनेक आकार-प्रकारों वाले, बाह्य इन्द्रियों से ग्राह्य, निश्चत सिर, पैर, हाथ इत्यादि अङ्गों से युक्त और स्थूल हैं। इनमें प्रत्येक प्रकार के स्थूल शरीर अन्तर्भूत हो जाते हैं। २. भावात्मक विषय—वे विषय, जिनका कोई अङ्गों और उपाङ्गों वाला और स्थूल आकार-प्रकार वाला मूर्त शरीर नहीं है और केवल संवेदनात्मक अनुभूति से ही गम्य हैं, इनमें सुख, दुःख, धर्म, अधर्म इत्यादि अनन्त प्रकार के विषय अन्तर्भूत हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त संवेद्य विषयों के और भी दो रूप होते हैं 'भावरूप विषय' और 'अभावरूप विषय'। भावरूप विषय—वे विषय, जिनका संसार में भावरूप में अस्तित्व विद्यमान है जैसे घट, पट, सुख, दुःख, इत्यादि। अभावरूप विषय—वे विषय, जिसका अस्तित्व तो है परन्तु अभावरूप में जैसे— आकाशपुष्प, खरगोश के सींग, बांझ का बेटा, साप के कान इत्यादि। ऊपर की यह विभागकल्पना मात्र औपचारिक है क्योंकि संवेदन में प्रत्येक प्रकार के विषय की स्थिति में कोई अन्तर नहीं है। संवेदन में मूर्त घट की जैसी अनुभूति होती है वैसी ही अमूर्त सुख-दुःखादि की भी। दूसरी बात यह है कि संवेदन में प्रत्येक प्रकार के विषय की १. यावन्न वेदका एते तावद्वेद्याः कथं प्रिये । वेदकं वेद्यमेकं तु...................॥ (उ० भै०, शिवसूत्र १.१ में उदाहृत) २. एवञ्च यद् यदयं जीवः संवेत्ति तत्तदस्य शरीरमेव संपद्यते, न तु नियतशिरःपाण्याद्यव- यवसंनिवेश एव । (स्प० का० वि०, ३.३)

मन्त्रदेवता और चित्त १२१ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri अनुभूति हमेशा भावरूप में ही होती है, अभावरूप में नहीं। उदाहरणार्थ संवेदन में आकाशपुष्प इत्यादि अभावरूप पदर्थों का अस्तित्व भी घट-पट इत्यादि भावरूप पदार्थों का जैसा ही होता है। वास्तव में यह बात निर्विवाद है कि संवेदन में जो कुछ है उसी का अस्तित्व है, अन्य का नहीं। १जीवात्मा को जिस समय किसी विषय की ओर संवेदनात्मक उन्मुखता हो जाती है उस संवेद्यमानता के समय में वही विषय उसका शरीर बन जाता है क्योंकि उस समय संवेदन तद्-रूप ही बन जाता है। वास्तव में संवेद्यमानता२ शब्द का अभिप्रायः ही यह है कि उस समय संवेदन उसी विषय के रूप में प्रकाशमान होने लगता है। संवेद्यमानता के किसी विषय को शरीर के रूप में ग्रहण करने का ही अर्थ यह है कि उस समय जीवात्मा स्वतन्त्र संवेदन के द्वारा उस विषय को सत्ता देकर उसकी सृष्टि करता है। दूसरे ही क्षण किसी दूसरे विषय की ओर संवेदनात्मक उन्मुखता हो जाने पर पहले विषय का संहार और दूसरे की सृष्टि का कार्य सम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार जीवात्मा भी विश्वात्मा की तरह ही क्षण क्षण अन्यान्य शरीरों को स्वीकारता या नकारता हुआ, उनकी सृष्टि और संहार३ आदि करता रहता है। वस्तुस्थिति तो यही है, जिसका ऊपर उल्लेख किया जा चुका है। परन्तु शोक इस बात का है कि पशुभाव के कारागार का बन्दी अपनी पाञ्चभौतिक काया की दृढ प्राचीरों के बाहर भी फैले हुये अपने रूपविस्तार को देखता हुआ भी देख नहीं पाता है। यही शक्ति- दरिद्रता की विडम्बना है ।।२८-२९-३०।। [ अन्त्रदेवता और चित्त ] अगले दो सूत्रों में यह समझाया जा रहा है कि आत्मसत्ता की ऐसी ही पूर्वोक्त व्यापकता का बार बार अनुसन्धान करने से योगी का संवेदन इतना तीव्र हो जाता है कि मन्त्र का उच्चारण करने से तत्काल ही उसका चित्त मन्त्र के देवता के साथ एकाकार हो जाता है। यह तीव्र एकाग्रता ही उसको अन्ततोगत्वा शिवभाव पर पहुँचा देती है— अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि । तदात्मतासमापत्तिरिच्छतः साधकस्य या ॥३१॥ तत्संवेदनद्वारेण यः तदात्मग्रहो मन्त्रन्यासात्मकः स एवोदयः तस्य ध्येयस्य मन्त्रात्मनः साधकचेतसि, तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चारणेच्छया संपादिता ।।३१।। १. एवञ्च...............संवेद्यमानतावस्थायामेव शरीरी भवति । ( स्प० का० वि०, ३.३ ) २. संवेद्यमानता च तेन तेन रूपेण प्रकाशमानता (तत्रैव)। ३. शेष तीन कृत्यों की प्रक्रिया को समझने के लिये विशेषरूप से द्रष्टव्य—'स्पन्दसंदोह' क्षेमराजाचार्यकृत । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूत्र—ध्यान करने वाले (योगी) के चित्त में, ध्येय (ध्यान का विषय बने हुये देवता)

१२२ स्पन्दकारिका इयमेवामृतप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः । इयं निर्वाणदीक्षा च शिवसद्भावदायिनी ॥३२॥ इयमेव सा मिथ्याज्ञानशून्यस्य साधकस्य निरावरणस्वस्वरूपसंवित्तिः अमृतत्व- प्राप्तिः न तु रसास्वादरूपस्य धातुसारस्य स्थूलस्यास्वादनम् अमृतप्राप्तिरुक्ता, यैव मन्त्रो- च्चारणमात्रेणैव मन्त्रस्वरूपावस्थिति प्राप्तिः सैवात्मनो ग्रहणमित्युक्ता । यस्मात् 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षाकाले गुरुर्धिया' इति । न पुनर्लोष्टादिवत् हस्तेन तस्यामूर्तस्य ग्रहणं भवति, अत एव चेयमेव सा निर्वाणदीक्षा शिवसद्भावदायिनी, परमशिवस्वरूपाभिव्य- ञ्जिका ॥३२॥ अनुवाद सूत्र—ध्यान करने वाले (योगी) के चित्त में, ध्येय (ध्यान का विषय बने हुये देवता) का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना इसी को कहते हैं कि उसके चित्त की (मन्त्र का उच्चारण करने की) इच्छा होने के तत्काल ही उसके साथ (देवता के साथ) तादात्म्य हो जाता है ॥३१॥ वृत्ति—संवेदन के द्वारा जो उस ध्येय अर्थात् मन्त्रस्वरूप अथवा मन्त्र के द्वारा ध्येय देवता का, मन्त्रात्मक या न्यासात्मक अर्थात् मन्त्र पढ़ने या न्यास करने के साथ ही, आत्मरूप में ग्रहण अर्थात् तादात्म्य हो जाता है, उसी को साधक के चित्त में उस देवता का उदय होना अर्थात् प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना कहते हैं। तादात्म्य हो जाने का अभिप्राय यह है कि साधक उस देवता के स्वभाव को ही प्राप्त कर लेता है। साधक का उस मन्त्रदेवता के साथ ऐसा तादात्म्य मन्त्र का उच्चारण करने की इच्छामात्र से ही सम्पन्न हो जाता है ॥३१॥ सूत्र—यही अमृत को प्राप्त करना होता है; इसी को आत्मा का ग्रहण१ कहते हैं, यही वास्तविक निर्वाण-दीक्षा होती है और यही (साधक को) शिवभाव की प्राप्ति करवा लेती है ॥३२॥ वृत्ति—ज्ञानी होने की ढोंगबाजी से रहित योगी का ऐसा आवरणहीन और निर्मल स्वात्मसंवेदन ही उसके लिये वास्तव में अमृतत्व अर्थात् अविनश्वर शिवभाव को प्राप्त करना होता है। इसके प्रतिकूल किसी स्थूल और २धातुओं के संमिश्रण से बनाये गये, शरीर के अन्तर्वर्ती धातुओं को पुष्टि देने वाले और स्वादिष्ट (केवल जीभ को मीठा लगने वाले) ३रस का आस्वाद लेना अमृतत्व को प्राप्त करना नहीं होता है। (साधनामार्ग में) आत्मग्रह १. शांभव और शाक्त उपायों के अधिकारी योगियों के लिए 'आत्मग्रह' आत्मज्ञान या स्वरूपविकास होता है और आणव उपाय पर अवस्थित अवर अधिकारियों के लिये इस शब्द का अर्थ 'मानसिक-निग्रह' होता है। २. यहाँ पर 'धातुओं' से वैद्यक के अनुसार धातुओं को फूँक कर बनाये गये भस्मों का अभिप्राय है। ३. वैद्यक के अनुसार धातुओं के भस्मों को मिलाकर बनाई गई स्वादिष्ट एवं पौष्टिक औषधियों को रस कहते हैं। यद्यपि वैद्यक में कहा गया है कि रस मनुष्य को अमर बना लेते हैं तथापि वह तो दीर्घायु को सूचित करने के लिये केवल एक औपचारिक प्रयोग है।

सूत्र संख्या ३१ में मन्त्र देवता का ध्यान करने वाले साधक के चित्त में उस देवता

मन्त्रदेवता और चित्त १२३ अर्थात् आत्मा की अनुभूति प्राप्त करना ऐसी स्थिति को कहते हैं जब मन्त्र का उच्चारणमात्र करने से ही मन्त्रस्वरूप में अवस्थिति अर्थात् मन्त्रदेवता के साथ स्वरूपतादात्म्य की स्थिति प्राप्त होती है, क्योंकि :- 'दीक्षा के समय गुरु आत्मा का ग्रहण करे अर्थात् अन्तर्विमर्श के द्वारा, शिष्य को दिये जाने वाले मन्त्र की देवता के स्वरूप में स्वयं अवस्थित रहे।' ऐसा कहा गया है। निराकार आत्मा को मिट्टी के ढेले या दूसरे किसी स्थूल पदार्थ की तरह (हाथ से) पकड़ा नहीं जाता है। इस कारण से यह आत्म-अनुभूति ही वास्तविक 'निर्वाण-दीक्षा' होती है जो कि (साधक के अन्तर में ही) अनुत्तर शिवभाव को अभिव्यक्त कर देती है ॥३२॥ विवरण प्रस्तुत सूत्रों का भाव अच्छी प्रकार समझने के लिये निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना परम आवश्यक है— सूत्र संख्या ३१ में मन्त्र देवता का ध्यान करने वाले साधक के चित्त में उस देवता के उदय होने की अथवा दूसरे शब्दों में उसका साक्षात्कार होने की चर्चा की गई है। इस सम्बन्ध में यह बात उल्लेखनीय है कि विकल्प-संस्कार के उपाय से योगी के संवेदन की विशुद्धता और एकाग्रता इतनी तीव्र हो जाती है कि वह इन्द्रियों के द्वारों से बाहर की ओर स्पन्दित होती हुई संवित् की धारा को पूर्वोक्त अलंग्रास की युक्ति से अन्तर्हृदय के अवकाश में केन्द्रित कर सकता है। ऐसी अवस्था में उसको किसी भी मन्त्र का विमर्श करने के बाद तत्काल ही उस मन्त्रदेवता के साथ चित्त की एकाकारता हो जाती है। साधना के क्षेत्र में इसी को मन्त्रदेवता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना कहा जाता है। यह साक्षात्कार बिल्कुल संवेदनात्मक होता है क्योंकि देवता, स्वरूप से व्यतिरिक्त और किसी विशेष कायिक आकार- प्रकार को धारण करके सामने नहीं आता है। स्मरण रहे कि यह शाक्त-उपाय की उच्चतर भूमिका है और इसपर परमेश्वर के तीव्र शक्तिपात से पवित्र बने हुए अन्तःकरणों वाले कुछ इने गिने व्यक्ति ही पहुँच सकते हैं। भगवान् अभिनवगुप्त ने ऐसे सौभाग्यशाली साधकों की महत्ता का वर्णन करते हुए कहा है कि—"जिस प्रकार १केतकीपुष्प के सौरभ का रसिक भौंरा ही होता है, मक्खी नहीं, उसी प्रकार किसी विरले ही व्यक्ति के मन में भैरवीय अभेदभूमिका को प्राप्त करने के प्रति अतिशय रुचि होती है। ऐसे रुचिसम्पन्न योगी के लिये २संसार का आडम्बर स्वयं ही उसी प्रकार गलता जाता है जिस प्रकार ग्रीष्म की चिलचिलाती धूप में सुदृढ़ हिमानियां स्वयं ही गलकर बह जाती हैं। १. केतकीकुसुमसौरभे भृशं भृङ्ग एव रसिको न मक्षिका । भैरवीयपरमाद्वयार्चने कोऽपि रज्यति महेशचोदितः ।। (तं०, ४. २७६) २. अस्मिंश्च यागे विश्रान्तिं कुर्वतां भवडम्बरः । हिमानीव महाग्रीष्मे स्वयमेव विलीयते ।। (तत्रैव, ४.२७७)

सूत्र संख्या ३२ में 'निर्वाण दीक्षा' का उल्लेख किया गया है । इस सम्बन्ध में

१२४ स्पन्दकारिका इसके अतिरिक्त भट्टकल्लट ने इसी सूत्र में उल्लिखित 'इच्छतः' शब्द का अर्थ मन्त्र का उच्चारण करने की इच्छा लगाया है । इस सम्बन्ध में यह समझना आवश्यक है कि किसी भी शब्द का उच्चारण करते समय उच्चारण की दो स्थितियाँ सक्रिय होती हैं । एक अव्यक्त ध्वनिरूपा आन्तरिक विमर्शमयी और दूसरी उसकी अनुगामिनी व्यक्त ध्वनिरूपा बाह्य वैखरीमयी स्थिति । इनमें से पहली विमर्शमयी स्थिति मूलभूत इच्छारूपा स्थिति होती है । यद्यपि यह स्थिति प्रतिसमय प्रत्येक प्राणी के अन्तस् में क्रियाशील रहती है परन्तु बहिर्मुख होने के कारण वह उससे सचेत नहीं होता है । प्रस्तुत प्रकरण में मन्त्रोच्चारण के सम्बन्ध में, मन्त्रोच्चारण की इसी पहली 'विमर्शमयी अथवा इच्छारूपा स्थिति का ही अभिप्राय है क्योंकि शाक्त-उपाय पर चलने वाले साधकों की सारी क्रियायें विमर्शमयी ही होती हैं। वैखरीवाणी के द्वारा ऊँची आवाज़ में मन्त्रों का उच्चारण करना आणव उपाय पर चलने वाले अवर अधिकारियों के लिये ही लाभप्रद सिद्ध हो सकता है । मन्त्रों के विमर्शमय उच्चारण में इतनी शक्ति होती है कि साधक का चित्त और परप्रकाशरूप २बिन्दु, उसी प्रकार तीव्रगति से एक दूसरे की ओर आकर एकाकार हो जाते हैं, जिस प्रकार धनुष के प्रचण्ड आघात से धकेला गया तीर अतिस्वनिक वेग में दौड़ कर लक्ष्य के साथ मिल जाता है । सूत्र संख्या ३२ में 'निर्वाण दीक्षा' का उल्लेख किया गया है । इस सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना आवश्यक है । आध्यात्मिक जगत् में 'दीक्षा' शब्द से ऐसे विशेष प्रकार के संस्कारों का अभिप्राय लिया जाता है जिनके द्वारा सिद्ध गुरु अपने शिष्यों में, उनकी मानसिक योग्यताओं के अनु- सार, अनेक प्रकार की योग सम्बन्धी अनुभूतियों को संक्रमित करके, पलक भर में उनका उद्धार कर लेते हैं । शास्त्रों के अनुसार ३'दीक्षा' शब्द के 'दी' वर्ण में ज्ञान के संक्रमण और 'क्षा' वर्ण में कर्मवासनाओं का नाश किये जाने का अभिप्राय अन्तर्निहित है । तन्त्रशास्त्रों में अनेक प्रकार की दीक्षाओं और उनके साथ सम्बन्धित शास्त्रीय विधि- विधानों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । शिष्यों की मानसिक योग्यताओं को अच्छी प्रकार जांचने के अनन्तर ही गुरु यह निर्णय कर लेता है कि किस शिष्य को कैसी दीक्षा देना उचित है । सारी दीक्षाओं में 'निर्वाण-४दीक्षा' असामान्य और दुर्लभ मानी जाती है क्योंकि जिस १. उच्चारेण विमर्शरूपेण न तु स्थानकरणप्रयत्नरूपबीजाक्षरोच्चारेण, तस्याणवोपायपर्यव- सायित्वात् । (शिवसूत्रवि०, २.२ की टिप्पणी) २. यथा शरो धनुःसंस्थो यत्नेनाताड्य धावति । तथा बिन्दुर्वरारोहे! उच्चारेणैव धावति ।। (तं० सं०, शिवसूत्र, २.२ में उदाहृत) ३. दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयन्ते कर्मवासनाः । दानक्षपणसंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता ।। (तं० वि०, १.४३) ४. तथा इयमेव निर्वाणदीक्षा.........संस्कारविशेषः । (स्प० का०, ४२)

मन्त्रदेवता और चित्त १२५ सौभाग्यशाली को यह मिले, उसके मन में, युगयुगों से संचित और पिंड न छोड़ने वाली वासनायें, क्षणभर में विगलित हो जाती हैं और वह सहसा पुर्यष्टक के बन्धन से मुक्त होकर स्वरूप में अवस्थित हो जाता है। अब प्रश्न यह है कि क्या आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिये 'निर्वाण-दीक्षा' संस्कार का और उसके शास्त्रीय विधि-विधानों का पूरा किया जाना एक अनिवार्य आवश्यकता है ? सूत्रकार ने इस शङ्का का समाधान मूलसूत्र में शब्दों को एक विशेष ढंग में रखने से ही किया है। उसने सूत्र के पहले और दूसरे चरण में जहाँ 'अमृतप्राप्तिः' और 'आत्मनो ग्रहः' इन दो शब्दों के साथ निश्चित रूप से 'एव' शब्द का प्रयोग किया है वहाँ तीसरे चरण में 'निर्वाण दीक्षा' शब्द के साथ जानबूझ कर 'एव' के बदले 'च' का प्रयोग किया है। ऐसा किये जाने का विशेष अभिप्राय यह है कि 'निर्वाण-दीक्षा' नामक संस्कार के आश्चर्यजनक महत्त्व की उपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती है परन्तु ईश्वरीय अनुग्रह के लोकोत्तर तौरतरीके मात्र शास्त्रीय विधि-विधानों के वशवर्ती भी नहीं हैं। जिन महान् आत्माओं पर परमेश्वर का दृढ़ शक्तिपात हो उनको १देवियों ने अर्थात् पारमेश्वरी शक्तियों ने स्वयं अज्ञातरूप में दीक्षित किया होता है जिसके फलस्वरूप उनके मन में सांसिद्धिक रूप में सत्-तर्क (शुद्धविद्या) का उदय होता है। फलतः जिन व्यक्तियों को किसी भी अचिन्त्य या अज्ञात प्रकार से मन्त्रवीर्य की अनुभूति हो जाये तो वही उनके लिये निर्वाण-दीक्षा होती है, भले ही २घी के दीये जलाकर और सामग्री के भण्डार जला कर संस्कार के शास्त्रीय विधि-विधानों को पूरा करने का आडम्बर न भी रचाया गया हो। श्रीमत् सोमानन्दाचार्य, श्रीमद् उत्पलाचार्य या श्रीमद् अभिनवगुप्ताचार्य जैसे शैवदर्शन के उद्भट और वरिष्ठ सिद्धों का इस बात पर मतैक्य है कि आत्मशक्ति का प्रत्यभिज्ञान चाहे किसी भी ३प्रमाण से, शास्त्रों के अध्ययन, गुरुओं के उपदेश से या अन्य किसी अदृश्य प्रकार से यदि हो गया तो हो गया, फिर सारे उपायजालों या निर्वाणदीक्षा जैसे संस्कारों के शास्त्रीय विधि-विधानों का काई प्रयोजन अवशिष्ट नहीं रहता है। एक बार यह ज्ञान हो गया कि अमुक पदार्थ खरा सोना है तो उसको परखने के लिये कसौटियों पर घिसने की आवश्यकता नहीं रहती है ॥३१-३२॥ इति श्रीकल्लटाचार्यविरचितायां स्पन्दकारिकावृत्तौ 'सहजविद्योदयो' नाम द्वितीयो निःष्यन्दः ॥२॥ श्रीमान् कल्लटाचार्य के द्वारा विरचित 'स्पन्दकारिकावृत्ति' का 'सहजविद्योदय' नामक दूसरा निःष्यन्द समाप्त हुआ ॥ १. तत्र आयातदृढशक्तिपाताविद्धस्य स्वयमेव सांसिद्धिकतया सत्तर्क उदेति, योऽसौ देवीभिः दीक्षित इति उच्यते। (तं० सा०, २३ पृष्ठ) २. एवं यो वेद तत्त्वेन तस्य निर्वाणदायिनी । दीक्षा भवत्यसंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ॥ (प० त्रि०, २५) ३. द्रष्टव्य शिवदृष्टि आह्निक ७ और तंत्रालोक आह्निक २.

तीसरा निःष्यन्द ‘विभूतिस्पन्द’ नामक तीसरा निःष्यन्द यहाँ तक के दो निःष्यन्दों में सामान्य स्पन्द-तत्त्व के स्वरूप का और उसमें समाविष्ट होकर सुप्रबुद्ध प्रमातृभाव पर आरूढ़ होने की प्रक्रिया का यथावत् वर्णन किया गया । अब प्रस्तुत निःष्यन्द में इस विषय की चर्चा की जा रही है कि उल्लिखित शाक्त-भूमिका की अनुभूति प्राप्त करके, अभ्यास की दृढ़ता से इस भाव पर स्थिर रहने के लिये सक्षम योगीश्वर में, अनेक प्रकार की पर एवं अपर सिद्धियाँ सहज ही में विकसित हो जाती हैं । इन सिद्धियों को दूसरे शास्त्रीय शब्दों में क्रमशः अमितसिद्धियाँ और मितसिद्धियाँ भी कहते हैं । अमित- सिद्धियाँ तो उत्कृष्ट योगियों में अभिव्यक्त होने वाले सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्ता इत्यादि माहेश्वर धर्म ही होती हैं । परन्तु जहाँ तक मितसिद्धियों का सम्बन्ध है वे तो साधारण सांसारिक फलों को देनेवाली तुच्छातितुच्छ सिद्धियाँ होती हैं । असावधान योगी उनके चक्कर में पड़कर निःसंशय अपने लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाते हैं । सांसारिक आसक्तियों में आकर्षण होता है, अतः सच्चे मुमुक्षु साधकों को, असाधारण कुशलता से, उनसे बच कर निकलना पड़ता है । पहुँचे हुये अनुभवी योगियों में भी विरले ही इतने धीर होते हैं जो तीव्र आत्मशक्ति से सांसारिक आसक्तियों को कुचल कर आगे बढ़ते हुये, अन्ततोगत्वा; ‘चक्रेश्वर पदवी’१ पर पहुँच कर ही विश्रान्त हो जाते हैं । [ योगियों का स्तर और स्वातन्त्र्य ] योगसिद्धियों का वर्णन करने के प्रसङ्ग में अब अगले तीन सूत्रों में जाग्रत्-स्वातन्त्र्य और स्वप्न-स्वातन्त्र्य नामक सिद्धियों का और असावधान योगियों में पाई जानेवाली स्वातन्त्र्य की हानि का वर्णन किया जा रहा है— २यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् हृदि स्थितान् । सोमसूर्योदयं कृत्वा संपादयति देहिनः ॥३३॥ तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान् प्रणयस्यानतिक्रमात् । नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितोऽवश्यं प्रकाशयेत् ॥३४॥ १. द्रष्टव्य सूत्र सं० ५१ का विवरण. २. इन तीनों सूत्रों और इनकी वृत्तियों में भी भावों को अत्यधिक सूत्रात्मक भाषा के आवरण में रखा गया है । अतः, पाठकों के सुभीते के लिये, इनका भाषानुवाद करने में कुछ मात्रा तक स्वतन्त्रता बरती गई है ॥

सूत्र—जिस प्रकार—१धाता, अभी २देहाभिमान में ही अवस्थित परन्तु नियमित

योगियों का स्तर और स्वातन्त्र्य १२७ अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात् सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः । सततं लौकिकस्येव जाग्रत्स्वप्नपदद्वये ॥३५॥ यथास्यानभिव्यक्तस्वस्वरूपस्य योगिनो जाग्रदवस्थायां यथा यथा इच्छा भवति, तथैव तस्यानेकार्थसंनिधानेऽभिमतस्यैव कस्यचिदर्थस्य दर्शनं भवति नटमल्ल- प्रेक्षादिषु सोमसूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन ॥३३॥ तथा स्वप्नेऽपि अभीष्टार्थानिव पश्यति, प्रणयस्यानतिक्रमात् इच्छाभ्यर्थनाया अनतिक्रमात्, यच्च तन्मध्ये हृदयं स्फुटतरम् अभिव्यक्तम् नित्यं तदेतत् 'स्वप्न-स्वा- तन्त्र्यम्' इत्युच्यते, अयमेव तमोवरणनिर्भेद इत्यर्थः ॥३४॥ अन्यथा तु स्वरूपस्थित्यभावे स्वतन्त्रा स्यात् स्वप्ने आलविडालदर्शनरूपा सृष्टिः, यस्मात् तत्तत्त्वं सृ ष्टिस्र्वभावं प्रसवधर्मत्वात्; यथा सततं सर्वस्य लोकस्य जाग्रद्- वृत्तौ स्वप्नावस्थायां च संबन्धासंबन्धविकल्पाः ॥३५॥ अनुवाद सूत्र—जिस प्रकार—१धाता, अभी २देहाभिमान में ही अवस्थित परन्तु नियमित रूप में योगाभ्यास करनेवाले योगी के द्वारा, (संकल्पात्मक) इच्छा के रूप में ३अभ्यर्थना किये जाने पर, उसके ४नेत्रों में अत्यन्त तीव्र अवधानात्मक शक्ति का उदय करके, उसको जाग्रत्- अवस्था में उन्हीं पदार्थों का दर्शन करवाता है जिनको देखने की इच्छा उसके हृदय में हो ॥३३॥ उसी प्रकार— सूत्र—(परिपक्व योगियों को) स्वप्न-अवस्था में भी अवश्य अभिलषित पदार्थों का ही साक्षात्कार करवाता है। इसका कारण यह है कि (वह धाता इस स्तर पर अवस्थित योगियों १. प्रत्येक प्राणी के अन्तर्हृदय में विद्यमान चित्-शक्ति। २. सूत्र में उल्लिखित 'देहिनः' शब्द से भट्टकल्लट ने यही अभिप्राय लिया है यद्यपि अन्य कतिपय टीकाकारों ने इस शब्द का अर्थ 'सर्वसाधारण देहधारी' ही लगाया है। ३. प्रस्तुत प्रकरण में योगी की आन्तरिक इच्छारूप अभ्यर्थना से उसके संकल्पमात्र का अभिप्राय है। इस स्तर के योगियों का योगिसंकल्पात्मक अभ्यर्थना को पारिभाषिक शब्दों में 'दिदृक्षारूपा अभ्यर्थना' कहा जाता है। ४. सूत्र में उल्लिखित 'सोमसूर्य' शब्द से भट्टकल्लट ने दो नेत्रों का अभिप्राय लिया है। साथ ही इसी से नेत्रों के अतिरिक्त अन्य अवशिष्ट चार ज्ञानेन्द्रियों का भी ग्रहण करके यह अभिप्राय निकाला है कि योगी को जिस किसी भी ज्ञानेन्द्रिय के ग्राह्य विषयों में से किसी मनोनीत विषय का साक्षात्कार करने की इच्छा हो तो धाता उसकी उसी ज्ञानेन्द्रिय में तदनुकूल अवधानात्मक शक्ति का उदय कर देता है।

सूत्र—यदि योगी, स्वरूप-साक्षात्कार प्राप्त कर लेने पर भी उस भाव पर निश्चलता

१२८ स्पन्दकारिका के) मध्यधाम१ (सुषुम्णाधाम) में प्रतिसमय स्फुटतर-रूप में प्रकाशमान रहता है और उनके२ प्रणय का कभी भी अतिक्रमण नहीं करता है ॥३४॥ इसके विपरीत— सूत्र—यदि योगी, स्वरूप-साक्षात्कार प्राप्त कर लेने पर भी उस भाव पर निश्चलता से अवस्थित रहने के प्रति सावधान न रहे, तो उसके लिये जाग्रत् और स्वप्न दोनों पदों में भावों की सृष्टि उसी प्रकार स्वतन्त्ररूप में चलती रहती है जिस प्रकार वह सर्वसाधारण लौकिक प्राणियों के लिए चलती रहती है । स्वतन्त्र रूप में भावों की उत्तरोत्तर सर्जना करते रहना तो स्पन्द-शक्ति का अकाट्य स्वभाव ही है ॥३५॥ जिस प्रकार— वृत्ति—एक ऐसे योगी को, जिसमें अभी स्वस्वरूप की पूर्ण अभिव्यक्ति न भी हुई हो, जाग्रत्-अवस्था में अपनी इच्छा के अनुसार, कोई खास अभिलषित पदार्थ ही दिखाई देता है चाहे उसके सामने दूसरे अनेकों पदार्थ भी वर्तमान क्यों न हों । इसका कारण यह है कि ऐसे अवसरों पर धाता उस योगी में सोम-सूर्य का उदय कर देता है, अर्थात् उसकी नेत्र इत्यादि ज्ञानेन्द्रियों में (उस अभिलषित ग्राह्य-विषय के प्रति) तीव्र अवधानात्मक शक्ति का उदय करता है । (साधारण जीव-व्यवहार में भी किन्हीं अवसरों पर ज्ञानेन्द्रियों में पाई जाने वाली इस तीव्र अवधानात्मक स्थिति का आभास)३ नटों या पहलवानों के सार्वजनिक प्रेक्षणों में मिलता है ॥३३॥ उसी प्रकार— वृत्ति—(एक परिपक्व) योगी स्वप्न-अवस्था में भी अभिलषित पदार्थों का ही दर्शन कर लेता है । इसका कारण यह है कि धाता उसके प्रणय को अर्थात् आन्तरिक इच्छारूप- १. प्राणाभ्यास की दृष्टि से इसका अभिप्राय यह है कि मध्यनाड़ी का विकास हो जाने पर जिन योगियों के प्राण एवं अपान दोनों ऊर्ध्व-मार्ग में लय हुए हों उनको 'स्वप्न- स्वातन्त्र्य' प्राप्त हुआ होता है । २. इस स्तर पर अवस्थित योगियों की योगिसंकल्पात्मक अभ्यर्थना को 'प्रणय-रूपा अभ्य- र्थना' की संज्ञा दी गई है । आगे विवरण को पढ़ने का कष्ट करें । ३. यहाँ पर वृत्तिकार ने ज्ञानेन्द्रियों में उदित होने वाली तीव्र अवधानात्मक स्थिति का अनुभव कराने के लिए नटों एवं पहलवानों के प्रेक्षण का उदाहरण प्रस्तुत किया है । इस उदाहरण की व्याख्या दो प्रकार से हो सकती है । एक यह कि साधारण जीव-व्यवहार में भी, ऐसे प्रेक्षणों के अवसरों पर दर्शकों की ज्ञानेन्द्रियों में एक खास अवधानात्मक वृत्ति का उदय हो जाता है जिससे वे, प्रेक्षास्थलों पर दूसरी शतशः वस्तुओं के विद्यमान होने पर भी, केवल अभिलषित प्रेक्षण को ही देख लेते हैं । दूसरी यह कि योगाभ्यासी पुरुषों की ज्ञानेन्द्रियों में किसी खास अवधानात्मक शक्ति का उदय हो जाता है जिससे वे, नटों या पहलवानों के सार्वजनिक प्रेक्षणों के जैसे कोलाहलपूर्ण एवं मानसिक विकारों को उपजाने वाले अवसरों पर भी अभिलषित स्वस्वरूप का ही साक्षात्कार कर सकते हैं ।

योगियों का स्तर और स्वातन्त्र्य १२९ अभ्यर्थना को कभी भी नहीं टालता है । ऐसे योगी के मध्य अर्थात् सुषुम्णाधाम में प्रतिसमय हृदय अर्थात् चित्-शक्ति की अनुभूति स्फुटतर रूप में विद्यमान रहती है । इस अवस्था को (पारिभाषिक शब्दों में) 'स्वप्न-स्वातन्त्र्य' कहते हैं । इसका अभिप्राय यह कि 'स्वप्न- स्वातन्त्र्य' की अवस्था ही इस बात की सूचिका होती है कि योगी के हृदय पर विद्यमान तामसिक आवरण फट गया है ॥३४॥ इसके विपरीत— वृत्ति—यदि योगी स्वस्वरूप में पूर्णतया अवस्थित रहने में सावधानी न बरते तो उसके लिये स्वप्न-अवस्था में ऊल-जलूल भावों की ही सृष्टि स्वतन्त्ररूप में चलती रहती है। इसका कारण यह है कि स्पन्द-शक्ति प्रसवधर्मा है अर्थात् उत्तरोत्तर भावों की सर्जना करते रहना उसका स्वभाव है। असावधान योगी को, जाग्रत् और स्वप्न दोनों अवस्थाओं में, आम लौकिक प्राणियों की तरह, ऊटपटाङ्ग विकल्पों का ही साक्षात्कार होता रहता है ॥३५॥ विवरण प्रस्तुत सूत्रों के व्याख्यान में, स्पन्द-सूत्रों के प्राचीन टीकाकारों में मतैक्य नहीं पाया जाता है। वास्तव में इन सूत्रों की शब्दावलि के प्रयोग का ढंग ही कुछ इस प्रकार का है कि किसी भी व्याख्याकार के मन में, सूत्रों के अर्थ के विषय में, अनेक शंकायें उत्पन्न हो सकती हैं। अस्तु इन टीकाकारों के पारस्परिक मतभेद के झमेले में पड़ना प्रस्तुत प्रयास का लक्ष्य नहीं है। यहाँ पर केवल इतना ही समझना पर्याप्त है कि प्रस्तुत संदर्भ में हमारे वृत्तिकार भट्टकल्लट का दृष्टिकोण क्या रहा है ? भट्टकल्लट की वृत्ति का सूक्ष्म अध्ययन और गम्भीर मनन करने के उपरान्त, पाठक सहज ही में इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि मूल सूत्रकार ने प्रस्तुत सूत्रों में, योगियों को, आध्यात्मिक योग्यता के आधार पर 'अपरिपक्व', 'परिपक्व' और 'असावधान' इन तीन श्रेणियों में बांट दिया है। इस अभिप्राय को अभिव्यक्त करने के लिये, उसने पहले सूत्र में 'जाग्रतो देहिनः', दूसरे में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' और तीसरे में 'अन्यथा' शब्दों का प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त इन तीन सूत्रों में, तीनों प्रकार के योगियों की संकल्पशक्ति की व्यापकता की परिधि भी निश्चित की है। सूत्रकार के इस सारे अभिप्राय को वृत्ति में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है— १. पहले सूत्र में उल्लिखित 'जाग्रतो देहिनः' शब्दों का अर्थ वृत्ति में 'अनभिव्यक्त- स्वरूपस्य योगिनः' इस प्रकार लगाया गया है। इसका अभिप्राय यह कि प्रस्तुत प्रकरण में जाग्रतो देहिनः' इन शब्दों से संसार के सर्वसाधारण देहधारियों का नहीं, अपितु ऐसे योगियों का अभिप्राय है जो जाग्रत् अर्थात् अभ्यास के विषय में सावधान तो रहते हों परन्तु अभी 'देहाभिमान के पूर्णतया गल न पाने के कारण स्वरूप पर अवस्थित भी न हों। इस स्तर के योगियों को अपरिपक्व योगियों के वर्ग में रखा जा सकता है। १. द्रष्टव्य—शिवसूत्र १.१९ की १५७वीं टिप्पणी । ९

सूत्र १, १८ में थोड़ा-बहुत प्रकाश डाला गया है।

१३० स्पन्दकारिका २. वृत्तिकार ने, दूसरे सूत्र में उल्लिखित 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' इन शब्दों का अर्थ—'यच्च तन्मध्ये हृदयं स्फुटतरम् अभिव्यक्तं नित्यम्' इस प्रकार लगाया है : इसके अनुसार उसका अभिप्राय यह कि जिस योगी को पाञ्चभौतिक काया में रहते हुए और जीवन का प्रत्येक आदान-प्रदान करते हुए भी, प्रतिक्षण, 'मध्य' में अर्थात् सुषुम्णाधाम में 'हृदय' की अर्थात् स्वरूपभूत शाक्तस्पन्दना की अनुभूति स्फुटतर रूप में होती रहती हो, उसको जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों पदों में समानरूप से, भावमण्डल के सृष्टि एवं संहार की स्वतन्त्र अधिकारिता प्राप्त हुई होती है। इस कारण से इस स्तर के योगियों को परिपक्व योगियों का वर्ग कहा जा सकता है। इस सम्बन्ध में प्राणाभ्यास की दृष्टि से मध्यनाडी के विकास और ज्ञानमार्ग की दृष्टि से प्रमाणपद और प्रमेयपद के मध्यवर्ती प्रमातृपद पर अवस्थिति इत्यादि बातों पर पहले ही सूत्र १, १८ में थोड़ा-बहुत प्रकाश डाला गया है। ३. तीसरे सूत्र में 'अन्यथा' शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ भट्टकल्लट ने 'स्वरूपस्थित्यभावे' लिखा है। इसका अभिप्राय यह कि किसी योगी को स्वरूप की अनुभूति तो हुई होती है परन्तु, अभी उस पर स्थिर रहने की क्षमता प्राप्त करने से पहले ही वह संसार के शब्द आदि विषयों से आकृष्ट होकर अखण्ड आत्म-अनुसंधान की बात को सर्वथा भूल जाता है। ऐसे योगी और संसार के इतर सर्वसाधारण लोगों में कोई अन्तर नहीं है। इस स्तर के योगियों को असावधान योगियों के वर्ग में रखना युक्तियुक्त प्रतीत होता है। उल्लिखित योगियों में स्वातन्त्र्य का तारतम्य—इनमें से पहले प्रकार के योगियों को केवल जाग्रत् अवस्था पर स्वतन्त्र अधिकार होता है अर्थात् वे केवल इसी अवस्था में मनोनीत भाववर्ग का साक्षात्कार करने में समर्थ होते हैं। इस स्तर के स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में 'जाग्रत्-स्वातन्त्र्य' कहते हैं। दूसरे प्रकार के योगी जाग्रत् ओर ¹स्वप्न दोनों अवस्थाओं में, समानरूप से, अभि- लषित भावों का अनुभव करने में स्वतन्त्र होते हैं। स्मरण रहे कि प्रस्तुत सन्दर्भ में 'स्वप्न' से स्वप्न और सुषुप्ति² इन दोनों अवस्थाओं का ग्रहण किया जाता है। जहाँ तक जाग्रत् अवस्था का सम्बन्ध है, इन योगियों को उसकी स्वतन्त्र अधिकारिता पहले से ही सिद्ध होती है। फलतः परिपक्व योगियों की संकल्पशक्ति इतनी दृढ़ और तीव्र होती है कि वे तीनों पदों में समानरूप से स्वरूप पर अवस्थित रह सकने के कारण, प्रत्येक पद में मनोनीत विषयों का ही अनुभव करते रहते हैं। इस स्तर के स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में 'स्वप्न-स्वातन्त्र्य' कहते हैं। १. स्वप्नपद में बाह्य इन्द्रियों का कार्यकलाप बन्द रहने के कारण केवल मन से ही भावों का ग्रहण होता है। (द्रष्टव्य—स्प० का०, ४. ३-४) २. स्वप्नेन परात्मप्रपञ्चेक्षितम् । (स्व० त्रि०, ३. १-२)

संवित् स्पर्श से सर्वज्ञता १३१ तीसरे प्रकार के योगी नित्ययुक्त होकर स्वरूप का अखण्ड अनुसन्धान करने में आनाकानी बरतने के कारण किसी भी अवस्था के साथ सम्बन्धित स्वतन्त्र अधिकारिता से हाथ धो बैठते हैं। वे तो संसार के सर्वसाधारण प्राणियों की तरह, अपनी इच्छा के प्रतिकूल उन्हीं ऊटपटांग विषयों का प्रति समय अनुभव करते हैं जिनका अनुभव त्रिगुणात्मिका प्रकृति उनको हठात् करवाती है। अपरिपक्व और परिपक्व योगियों की इच्छा का रूप—अपरिपक्व योगियों की आन्तरिक इच्छा का रूप 'दिदृक्षारूपा अभ्यर्थना' अर्थात् मनचाहे विषयों को ही देखने की इच्छारूपा अभ्यर्थना बतलाया गया है। इस सम्बन्ध में स्वभावतः मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या योगी की आत्मा और सूत्र में निर्दिष्ट 'धाता' दो भिन्न सत्तायें हैं जिनमें एक प्रार्थी और दूसरी प्रार्थना का आलम्बन है? इस शङ्का का समाधान प्राप्त करने के लिये यह समझना आवश्यक है कि प्रस्तुत प्रकरण में न तो योगी की आत्मा और धाता दो भिन्न सत्तायें हैं और न 'अभ्यर्थना' शब्द का; किसी के द्वारा किसी को प्रार्थना किये जाने का ही अभिप्राय है। यहाँ पर 'अभ्यर्थना' शब्द का अभिप्राय केवल तीव्र संवेदनात्मक एकाकारता है। इसका भाव यह कि योगी की आत्मा अपनी तीव्र संकल्पशक्ति के द्वारा अभिलषित पदार्थों के साथ इस प्रकार एकाकार हो जाती है कि उसकी ज्ञानेन्द्रियां दूसरे अनन्त पदार्थों के सामने होते हुये भी केवल उन्हीं पदार्थों का ग्रहण कर लेती हैं। फलतः प्रस्तुत संदर्भ में योगी की आत्मा स्वयं ही प्रार्थी और प्रार्थना का आलम्बन भी है। परिपक्व योगियों की इच्छा का रूप 'तादात्म्य-प्रतिपत्तिरूप-प्रणय' बतलाया गया है। 'तादात्म्यप्रतिपत्तिः' शब्द विशुद्ध संवेदन की उस उच्चतर अवस्था का द्योतक है जिस पर पहुँचे हुये योगी को प्रतिसमय संसार के अनन्त भावमण्डल में केवल अपने ही रूपविस्तार की अखण्ड अनुभूति होती रहती है। ऐसे योगी के स्वातन्त्र्य की व्यापकता अपरिमित होती है। उसकी इच्छा साधारण इच्छामात्र नहीं अपितु स्वतन्त्र इच्छाशक्ति होने के कारण कभी अन्यथा हो ही नहीं सकती है। यही कारण है कि सूत्रकार ने ऐसे तीव्रतर योगिसंकल्प को प्रणय का नाम दिया है। अभ्यर्थना का पूरा होना कभी कभी संदेहास्पद हो सकता है परन्तु 'प्रणय' में टाल- मटोल के लिये स्थान ही नहीं है ।। ३३-३५ ।। [ संवित् स्पर्श से सर्वज्ञता ] अगले दो सूत्रों में इस तथ्य को प्रस्तुत किया जा रहा है कि शाक्त-बल का अनुभव हो जाने से योगी में सर्वज्ञता का विकास हो जाता है। उसको २अतीत, व्यवहित और विप्रकृष्ट १. संवेदनात्मक एकाकारता को शास्त्रीय शब्दों में 'यथाभिमतशरीरोत्पत्तिः' कहते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि आत्मा निजी संवेदन के द्वारा जिन विषयों की ओर उन्मुख हो जाती है उनको तावत्कालपर्यन्त अपना शरीर ही बना लेती है। २. 'अतीत'—बीता हुआ। 'व्यवहित'—भविष्य में होने वाला; किसी आड़ के पीछे छिपा हुआ। 'विप्रकृष्ट'—बहुत दूर होने के कारण साधारण इन्द्रियबोध से ओझल।

सूत्र—जिस प्रकार, किसी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ, चित्त के सावधान होने

१३२ स्पन्दकारिका विषयों या घटनाओं का ऐसा स्वतःसिद्ध ज्ञान हो जाता है कि मानो वह उनका प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रहा हो। इन दो सूत्रों में से पहला दृष्टान्त और दूसरा दाष्टान्तिक हैः— यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि । भूयः स्फुटतरो भाति स्वबलोद्योगभावितः ॥३६॥ यथा किल दूरस्थितः कश्चिदर्थः पुरुषेण पूर्वं सावधानेनापि न लक्ष्यते स एव स्फुटतरो भवति, प्रयत्नविशेषेण निरूप्यमाणस्तत्रैव स्थितस्य ॥३६॥ तथा यत्परमार्थेन यदा यत्र यथा स्थितम् । तत्तथा बलमाक्रम्य न चिरात् संप्रवर्तते ॥३७॥ तथा तेनैव प्रयत्नविशेषेण यत् वस्तु येन रूपेण यदा यस्मिन् काले, यत्र देशे, यथा येनाकारेण संस्थितं, तद् वस्तु तथा स्वबलं स्वस्वरूपमाश्रितस्याचिरेणैव कालेन प्रतिभाति निरावरणस्वरूपत्वात् तेनातीतानागतं ज्ञानं परिमितविषयं न किञ्चिदाश्चर्यम् ॥३७॥ अनुवाद सूत्र—जिस प्रकार, किसी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ, चित्त के सावधान होने पर भी, पहली नज़र में स्पष्टरूप में दिखाई नहीं देता है, परन्तु तत्काल ही आत्मबल का प्रयोग करके देखे जाने पर, उसको, वही पदार्थ स्पष्टतर रूप में दिखने लगता है ॥३६॥ उसी प्रकार योगी को, स्पन्दात्मक आत्मबल पर आरूढ़ होने की दशा में, थोड़े समय में ही वे सारे पदार्थ, जो जिस समय, जिस देश और जिस आकार-प्रकार में वर्तमान हों, ठीक उसी अवस्था में बोध का विषय बन जाते हैं ॥३७॥ वृत्ति—जिस प्रकार, किसी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ, सावधानता से देखे जाने पर भी, पहले स्पष्टरूप मे परिलक्षित नहीं होता है, परन्तु अनन्तर उसी स्थान पर खड़ा रहते हुये ही, विशेष प्रयत्न के द्वारा देखे जाने पर उसको, वही पदार्थ बिलकुल स्पष्टरूप में दिखाई देता है उसी प्रकार स्पन्दात्मक स्वरूप में अवस्थित योगी को, वैसा ही विशेष प्रकार का प्रयत्न काम में लाने पर, थोड़े समय में, सारे पदार्थों के ठीक उसी रूप का बोध हो जाता है जिस रूप में वे जिस किसी देश, जिस किसी काल और जिस किसी आकार-प्रकार में वर्तमान हों। इसका कारण केवल यही है कि उस योगी के स्वरूप पर से तामसिक आवरण हटा हुआ होता है फलतः योगियों के लिये अतीत एवं अनागत पदार्थों का सही रूप में बोध होना एक छोटी सी बात है। इसको कोई महान् आश्चर्य समझने की आवश्यकता नहीं है ॥३६-३७॥ विवरण शैवशास्त्रियों का विचार है कि साधारण जीवन व्यवहार में भी जिस समय किसी प्राणी को, अपने नेत्रों और इसलिये ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा स्पष्टतर रूप में ग्रहण किये जाने के