भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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३४ के हेतु से तत्संबंधी जगत् नित्यता की संभावना का ज्ञापन। रूप रस आदि गुण संबद्ध होने से परमाणु में अनित्यता, स्थूलता आदि दोषों की संभावना की विज्ञप्ति। परमाणुगत, रूप रस आदि की स्वीकृति और अस्वीकृति दोनों में दोष प्रदर्शन। शिष्टों से अपरिगृहीत परमाणु कारणवाद की उपेक्षणीयता।—पृ०७६६-७३. ३. समुदायाधिकरण [सूत्र १७-२६] १. चार प्रकार के बौद्धों के अभिमत सिद्धान्तों का वर्णन २. परमाणुजात और पृथिव्यादि जात संघातों की उत्पत्ति की अनुपपत्ति अविद्या आदि परस्पर कारण कार्य भाव से समुदायों की उत्पत्ति सिद्धांत का स्वमतानुसार निराकरण । ३. क्षणिकवाद में पूर्ववर्त्ती और परवर्त्ती क्षण के कारण कार्यवाद की असंभावना का प्रदर्शन, तथा कारण के बिना कार्योत्पत्ति की स्वीकृति में प्रतिज्ञा हानि का वर्णन । प्रतिसंख्या निरोध और अप्रतिसंख्या निरोध की अनुपपत्ति का प्रदर्शन । तुच्छ कारण से कार्योत्पत्ति तथा उत्पन्न पदार्थ की तुच्छता के सिद्धान्त का खण्डन । आकाश की तुच्छता का खण्डन । प्रतिभिज्ञा प्रमाण का खण्डन । ४. सौतांत्रिकाभिमत विज्ञानवाद का खण्डन तथा प्रयत्न के अभाव में कार्योत्पत्ति की संभावना का समर्थन । —पृ० ७७३-८८, ४. उपलब्ध्यधिकरण [सूत्र २७-२६] १. योगाचार मत से विज्ञानातिरिक्त बाह्यवस्तु मात्र के असद् भाव का समर्थन । विज्ञानमात्रास्तित्ववाद का खंडन । २. स्वप्न दृष्ट पदार्थ के साथ बाह्य पदार्थ की विलक्षणता का प्रदर्शन । बाह्य पदार्थ के असद्भाव का खंडन ।