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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

३४ के हेतु से तत्संबंधी जगत् नित्यता की संभावना का ज्ञापन। रूप रस आदि गुण संबद्ध होने से परमाणु में अनित्यता, स्थूलता आदि दोषों की संभावना की विज्ञप्ति। परमाणुगत, रूप रस आदि की स्वीकृति और अस्वीकृति दोनों में दोष प्रदर्शन। शिष्टों से अपरिगृहीत परमाणु कारणवाद की उपेक्षणीयता।—पृ०७६६-७३. ३. समुदायाधिकरण [सूत्र १७-२६] १. चार प्रकार के बौद्धों के अभिमत सिद्धान्तों का वर्णन २. परमाणुजात और पृथिव्यादि जात संघातों की उत्पत्ति की अनुपपत्ति अविद्या आदि परस्पर कारण कार्य भाव से समुदायों की उत्पत्ति सिद्धांत का स्वमतानुसार निराकरण । ३. क्षणिकवाद में पूर्ववर्त्ती और परवर्त्ती क्षण के कारण कार्यवाद की असंभावना का प्रदर्शन, तथा कारण के बिना कार्योत्पत्ति की स्वीकृति में प्रतिज्ञा हानि का वर्णन । प्रतिसंख्या निरोध और अप्रतिसंख्या निरोध की अनुपपत्ति का प्रदर्शन । तुच्छ कारण से कार्योत्पत्ति तथा उत्पन्न पदार्थ की तुच्छता के सिद्धान्त का खण्डन । आकाश की तुच्छता का खण्डन । प्रतिभिज्ञा प्रमाण का खण्डन । ४. सौतांत्रिकाभिमत विज्ञानवाद का खण्डन तथा प्रयत्न के अभाव में कार्योत्पत्ति की संभावना का समर्थन । —पृ० ७७३-८८, ४. उपलब्ध्यधिकरण [सूत्र २७-२६] १. योगाचार मत से विज्ञानातिरिक्त बाह्यवस्तु मात्र के असद् भाव का समर्थन । विज्ञानमात्रास्तित्ववाद का खंडन । २. स्वप्न दृष्ट पदार्थ के साथ बाह्य पदार्थ की विलक्षणता का प्रदर्शन । बाह्य पदार्थ के असद्भाव का खंडन ।

२६ ५. सर्वथानुपपत्त्यधिकरण [सूत्र ३०] सर्वशून्यवादी माध्यमिक सिद्धान्त का वर्णन । स्वमतानुसार सर्वशून्यत्ववाद का निराकरण । —पृ० ७८६-९३, ६. एकस्मिन्नसम्भवाधिकरण [सूत्र ३१-३३] १ जैनाभिमत सिद्धान्त का निरूपण । सप्तभंगी न्याय की असंगति । २ आत्मा की देह परिमितता, तथा संकोच विकास स्वभाव का खंडन । आत्मा की मोक्ष कालीन परिणाम की स्थिरता के आधार पर उक्त स्वभाव का निराकरण । —पृ० ७९३-८०२, ७. पशुपत्यधिकरण [सूत्र ३४-३८] पाशुपत मत का वर्णन । पाशुपत की असमंजसता का विवेचन अशरीर ईश्वर के प्राकृतिक अधिष्ठान की असंभवता प्रदर्शन । अशरीर जीव के इन्द्रियाधिष्ठान की तरह परमेश्वराधिष्ठान की स्वीकृति से ईश्वर में सुखदुःखादि भोग प्रसक्ति की संभावना प्रदर्शन । पशु- पति में पुण्य पाप की स्वीकृति से अनित्यतादि दोषों की संभावना का दिग्दर्शन । —पृ० ८०२-८, उत्पत्त्यसंभवाधिकरण [सूत्र ३९-४२] १. पांचरात्र सात्वतदर्शन के सिद्धान्त का विवेचन । २. पूर्वपक्ष-कर्त्तास्वरूप संकर्षण से कारणरूप प्रद्युम्न की उत्पत्ति का विरोध प्रदर्शन । ३. उत्तरपक्ष-संकर्षण आदि की विज्ञानमय ब्रह्मस्वरूपता हेतुक जीवोत्पत्ति के विवेचक पांचरात्र मत की प्रामाणिकता ज्ञापन । पांचरात्र शास्त्रानुसार ही जीव की स्वरूपतः उत्पत्ति का निषेध तथा पांचरात्र शास्त्र की वेद सम्मतता का प्रतिपादन । ४. (सिद्धान्त)— “न च कर्त्तुः करणम्” इत्यादि सूत्रों की शंकराचार्य कृत व्याख्या का निराकरण । सांख्य

३० आदि शास्त्रों के साथ पांचरात्र शास्त्र का अविरोध ज्ञापन। उक्त शास्त्र की स्वाभिमत स्वीकृति । —पृ० ८०८-१६, (तृतीय पाद) १. वियदधिकरण [सूत्र १-६] १. पूर्वपक्ष-आकाश की अनुत्पत्ति का संशय । २. (सिद्धान्त)-आकाश की उत्पत्ति का समर्थन तथा आकाशोत्पत्ति बोधक श्रुति की गौणार्थता के संशय का निराकरण । ३. पूर्वपक्ष-ब्रह्म शब्द की तरह “संभूत” शब्द के गौण मुख्य दोनों ही अर्थों का समर्थन । ४. (सिद्धान्त)-एक विज्ञान से समस्त विज्ञान की प्रतिज्ञा के आधार पर आकाशोत्पत्ति के सिद्धान्त का श्रौत शब्दों से ही समर्थन । जन्य पदार्थ मात्र की ब्रह्म कार्यता का समर्थन । आकाशोत्पत्ति से वायु की उत्पत्ति का वर्णन तथा सद्ब्रह्म की अनुपपत्ति का निरूपण । —पृ० ८११-२६, २. तेजोधिकरण (सूत्र १०-१७) १. पूर्वपक्ष-शुद्ध वायु से तेजोत्पत्ति की शंका, तेज से जलोत्पत्ति की शंका, जल से पृथिवी उत्पत्ति की शंका श्रौत “अन्न” शब्द के पृथिवी परक अर्थ का हेतु प्रदर्शन । १. (सिद्धान्त)-आकाशादि शरीरधारी ब्रह्म से वायु आदि की उत्पत्ति का समर्थन, ब्रह्म से साक्षात् आकाश आदि की उत्पत्ति का प्रतिपादन । इन्द्रिय और मन की उत्पत्ति के आधार पर ब्रह्म की साक्षात् कारणता का समर्थन । स्थावर जंगम सभी पदार्थों की ब्रह्म शब्द की मुख्यार्थता प्रदर्शन । —पृ० ८२६-३२, ३. आत्माधिकरण (सूत्र १८) १. पूर्वपक्ष-आकाश आदि की तरह जीवोत्पत्ति की शंका

३३ २. (सिद्धान्त)-श्रुति और युक्ति के आधार पर जीव की नित्यता का समर्थन तथा एक विज्ञान से सर्व विज्ञान का उपपादन। —पृ० ८३३-३६, ४. ज्ञाधिकरण सूत्र (१६-३२) १. जीवात्मा का स्वरूप निरूपण । २, पूर्वपक्ष—जीवात्मा की चैतन्य रूपता का समर्थन । ३. (सिद्धान्त]—आत्मा की ज्ञानरूपता का निराकरण तथा ज्ञान विशिष्टता का प्रतिपादन । जीव की लोकान्तर गमनागमना बोधक श्रुति के आधार परसर्वव्यापकता का खंडन । जीव की अणु परिमाणता का प्रतिपादन लोकान्तर गमनागमन में जीव के कर्त्तृत्व का समर्थन । ४ विज्ञानमय शब्द से जीव एवं उसकी सर्वव्यापकता मानने वाले सिद्धान्त का निराकरण, उसकी ब्रह्मा- र्थता का निरूपण । अणु परिमाण बोधक शब्द तथा दृष्टान्त के आधार पर जीव की अणुता का समर्थन । अणु जीव की सर्वांगीण उपलब्धि का समर्थन । जीव की हृदयस्थिति का समर्थन । एक स्थित प्रदीपादि की तरह जीव की भी सर्वांगीण ज्ञानरूप अनुभूति का प्रतिपादन । आत्म गुण ज्ञान की आत्मातिरिक्तता का प्रदर्शन । ज्ञान और आत्मा के पृथक निर्देश का समर्थन । ज्ञान प्राधान्यता के आधार पर ही, आत्मा में ज्ञान शब्द की व्यवहार्यता का सम्मोदन । ज्ञान और आत्मा के नित्य साहचर्य के कारण आत्मा के लिए प्रयुक्त विज्ञान शब्द के प्रयोग का उपपादन । सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में ज्ञान की अप्रतीति होते हुए भी ज्ञान की आत्मगुणता का समर्थन । आत्मा की सर्वव्यापकता और ज्ञानमयता में दोष प्रदर्शन ।—पृ० ८३६-५०, ५. कर्त्ताधिकरण (सूत्र ३३-३६) जीवात्मा के कर्त्तृत्व का निरूपण । इन्द्रियग्रहण और परिभ्रमण में आत्मा के कर्त्तृत्व का निरूपण ankurnagpal108@gmail.com

३३ बुद्धि की कर्तृता स्वीकारने में दोष प्रदर्शन। बुद्धि की कर्तृता में भोगशांकर्य का उपपादन बुद्धिकर्तृता में समाधिसाधन की असंभवता तथा उसकी भोगकर्तृता का समर्थन। जीव की कर्तृता होते हुए भी सामयिक कर्मानुष्ठान का उपपादन। —पृ० ८५०-५६, ६. परायत्ताधिकरण (सूत्र ४०-४१) जीव की ब्रह्माधीन कर्तृता का तथा जीव की चेष्टानुसार ईश्वर प्रेरणा का निरूपण। —पृ० ८५६-६०, ७ अंशाधिकरण (सूत्र ४२-५३) १. पूर्वपक्ष—ब्रह्म से जीव की अत्यन्त भिन्नता की शंका। २. (सिद्धान्त)—जीव की ब्रह्मांशता का प्रतिपादन। श्रुति और स्मृति प्रमाणों से अंशता का उपपादन। ब्रह्म में जीवगत दोष संसर्गता संभावना के प्रसंग में आदित्य आदि दृष्टान्तों की प्रस्तुति देहभेद से जीवों के अधिकार भेदों का प्रतिपादन। देहभेद और जीव भेद के कारण एक के भोग का दूसरे में अभाव प्रदर्शन। जीव और ब्रह्म की अभेद समर्थक आभासता का उपपादन। अदृष्ट की भोग नियामकता का वर्णन। भोगाभिसंधि से जीव की अनियामकता का वर्णन। अंशभेद के अनुसार भोगादि व्यवस्था का खंडन। —पृ० ८६०-७१, [चतुर्थ पाद] १. प्राणोत्पत्ति अधिकरण [सूत्र १-३] १. पूर्वपक्ष—इन्द्रियों की उत्पत्ति की शंका। २. (सिद्धान्त)—इन्द्रियों की उत्पत्ति का समर्थन, तथा अनुत्पत्ति बोधक श्रुतियों की गौणार्थता निरूपण। आकाशादि से भिन्न वायु आदि की सृष्टि का उपपादन। —पृ० ८७१-७५, ankurnagpal108@gmail.com

३३ २. सप्तगत्यधिकरण [सूत्र ४-५] १. पूर्वपक्ष—इन्द्रियों की सप्त संख्या का प्रतिपादन। १. (सिद्धान्त)—इन्द्रियों की एकादश संख्या का निरूपण।—पृ० ५७५-७८ ३. प्राणाणुत्वाधिकरण [सूत्र ६-७] एकादश इन्द्रियों की अणुता का प्रतिपादन तथा मुख्य प्राण की अणुता का उपपादन। —पृ० ५७८-७९, ४ वायुक्रियाधिकरण [सूत्र ८ ११] मुख्य प्राण की वायुरूपता तथा वायु की क्रियारूपता का खंडन। मुख्य प्राण की जीवोपकरणता का निरूपण। प्राण की पंचवृत्त्यात्मकता का निरूपण।—पृ० ५७९-८३ ५ श्रेष्ठाणुत्वाधिकरण [सूत्र १२] मुख्य प्राण की अणुता का निरूपण। —पृ० ५८३, ६ ज्योत्याद्यधिष्ठानाधिकरण सूत्र [१३-१४] १. पूर्वपक्ष—इन्द्रिय, जीवात्मा तथा अग्नि आदि देवताओं की स्वतंत्र अधिक्रामता की शंका। २. (सिद्धान्त)—परमेश्वरेच्छाधीन अनुष्ठान का निरूपण तथा परमेश्वर के सार्वभौम अधिष्ठान का वर्णन।—पृ० ५८४-८६ ७ इन्द्रियाधिकरण [सूत्र १५-१६] प्राणपद वाच्य चक्षु आदि की इन्द्रियता का भेद श्रुति और स्वभाव वैलक्षण्य के आधार पर मुख्य प्राण की अनिन्द्रियता का निरूपण। —पृ० ५८६-८७, ८ संज्ञामूर्त्तिक्लृप्ति अधिकरण [सूत्र १७-१९] १. पूर्वपक्ष—व्यष्टि जागतिक सृष्टि की हिरण्यगर्भ कर्त्तृता पर शंका। २. (सिद्धान्त)—व्यष्टि जगत सृष्टि की परमात्मकत्तृता का निरूपण। १. पूर्वपक्ष—व्यष्टि सृष्टि की जीव कर्त्तृता की शंका। २. (सिद्धान्त)—ब्रह्माण्ड सृष्टि प्रकरणीय "त्रिवृत्करण" का अर्थान्तर निरूपण।

१४ १. पूर्वपक्ष--त्रिवृत्कृत आकाश आदि भूत समुदाय के पृथक् पृथक् व्यवहार की संभावना की शंका। २. (सिद्धान्त)—अधिकता के अनुसार आकाश आदि नाम की व्यवहारिकता का उपपादन। —पृ० ८८७-६६, [तृतीय अध्याय] [प्रथम पाद] १ तदन्तर प्रतिपत्त्यधिकरण [सूत्र १-७] शरीर त्याग करते समय जीव भावी देह के उपादान भूतसूक्ष्म को ले जाता है या नहीं, इस पर विचार १. पूर्वपक्ष—भूतसूक्ष्म को न ले जाने की शंका। २. (सिद्धान्त)—जीव के साथ भूतसूक्ष्म के गमन का प्रतिपादन प्रयाण काल में वागादि इन्द्रियो की अग्नि आदि में लीनता बतलाने वाली श्रुति के आधार पर उक्त शंका का समाधान। पंचाग्निविद्या के प्रकरण में जल होम का उल्लेख न होने से सूक्ष्मभूतों के सहगमन पर उद्भूत संशय का समाधान। जीवो- ल्लेख संबंधी संशय का समाधान। —पृ०८६६-१०६, २. कृतात्ययाधिकरण (सूत्र ८-११) कर्मयोगी जीवों के चन्द्रमण्डल से लौटते समय प्राक्तन कर्म अवशिष्ट रहते हैं या नहीं, इस पर विचार। १: पूर्वपक्ष—जो कर्म फलभोग के लिए जीव के साथ जाते हैं, उनका चन्द्रमण्डल में ही भोग समाप्त हो जाता है। २. (सिद्धान्त)—कर्म के अवशिष्ट फलभोग के लिए ही पृथिवी में पुनरागमन होता है, इस मत का प्रतिपादन। १. पूर्वपक्ष— संचित शुभाशुभ कर्मानुसार जीव के जन्म का समर्थन

३५ ४. (सिद्धान्त)—वैदिक “चरण” शब्द के आधार पर अवशिष्ट कर्मानुसार ही जन्म का समर्थन । ५. पूर्वपक्ष—स्मृतिशास्त्र विहित आचार की व्यर्थता ज्ञापन । ६. (सिद्धान्त)—स्मृति शास्त्रोक्त आचार की कारणता का प्रतिपादन बादरि आचार्य के मतानुसार “चरण” शब्द की पुण्य पापार्थता का निरूपण । —पृ० ६०६-११, ३. अनिष्टादिकार्याधिकरण (सूत्र १२-२१) १. यागादिकर्म विहीन पापी जीवों की भी चान्द्रमसी गति की संभावना का निरूपण । प्रथम यमालय में पापफल का भोग बाद में चान्द्रमसी गति की संभावना प्रदर्शन । २. सात प्रकार के प्रधान नरकों का ज्ञापन । नरक में यम की प्रधानता वर्णन । कर्मी और कर्मांग विद्या संपन्न व्यक्तियों की चान्द्रमसी गति का निरूपण । पापपुण्य रहित अज्ञ जीवों की दंशमशकादि गति का वर्णन । स्वेदज में उद्भिज का अन्तर्भाव । —पृ० ६११-१६, ४. तत्स्वाभाव्यापत्ति अधिकरण (सूत्र २२) चन्द्रमंडल से लौटते समय कर्मयोगियों की आका- शादि स्वभाव प्राप्ति का निरूपण । —पृ० ६१६-१७, ५. नातिचिराधिकरण (सूत्र २३) आकाश आदि स्वभाव के परित्याग की त्वरा का विवेचन । —पृ० ६१७-१८, ६. अन्याधिष्ठिताधिकरण (सूत्र २४-२७) अन्य जीवों से अधिष्ठत जीव का शस्य प्रवेश वर्णन । यज्ञीय हिंसा में निष्पापता का प्रतिपादन । जीव का शस्य से, रेत सेचनक्षम शरीर में प्रवेश वर्णन । स्त्री देह में रेत सिंचन द्वारा जीव का गर्भ प्रवेश तथा योनि द्वारा जन्म वर्णन । —पृ० ६१८-२१, ankurnagpal108@gmail.com

३६ (द्वितीय पाद) १. संध्यधिकरण (सूत्र १-६) १. पूर्वपक्ष—स्वप्नदृष्ट पदार्थों की जीवकर्त्तृता का श्रौत प्रमाणों से समर्थन। २. (सिद्धान्त) स्वप्नदृश्य की मायिकता का वर्णन। परमेश्वर की इच्छानुसार ही जीव की ज्ञानैश्वर्यादि शक्ति के तिरोधान और बंधन मुक्ति का प्रतिपादन। देह संबंध को जीव की शक्ति तिरोधान का कारण ज्ञापन। स्वप्नदर्शन की शुभाशुभ सूचकता का वर्णन। —पृ० ६२४-२६, २. तमसाधिकरण (सूत्र ७ ८) १. पूर्वपक्ष—हित नामक नाड़ी और आत्मा इन दोनों स्थानों में यथा संभव सुषुप्ति की संभावना का संशय। २. (सिद्धान्त)—नाड़ी, पुरीतत और आत्मा तीनों स्थानों में सुषुप्ति का निरूपण। सुषुप्ति भंग के समय ब्रह्म से जीव के उत्थान का वर्णन। —पृ० ६२६-३१, ३. कर्मानुस्मृतिशब्दविध्यधिकरण (सूत्र ६) जागरण के समय जीव के पुनरुत्थान का निरूपण। ४. मुग्धाधिकरण (सूत्र १०) मुग्धावस्था का स्वरूप निरूपण। —पृ० ६३१-३४, ५. उभयलिंगाधिकरण (सूत्र ११-२५) १. पूर्वपक्ष—जाग्रत आदि अवस्थाओं से संबद्ध ब्रह्म में दोष प्रसक्ति संभावना की शंका। २. (सिद्धान्त)—तीनों अवस्थाओं से संबद्ध होते हुए भी ब्रह्म की निर्दोषता तथा उसकी उभयलिंगता का निरूपण। कठशाखीय मत से एकस्थानस्थित ब्रह्म की निर्दोषता तथा शरीर स्थित होते हुए भी उसकी निराकारता का उपपादन। ankurnagpal108@gmail.com

३७ ३. ब्रह्म की स्व-प्रकाशता एवं ज्ञान स्वभावता का उपपादन उक्त विषय में जलसूर्यादि प्रतिबिम्ब का दृष्टान्त प्रस्तुत । ४. पूर्वपक्ष—जल सूर्यादि के साथ देहस्थ परमात्मा की विषम दृष्टान्तता का दिग्दर्शन । ५. (सिद्धान्त)—वृद्धि ह्रास आदि दृष्टान्त द्वारा उक्त आपत्ति का परिहार । ६. 'नेति नेति' श्रुति का तात्पर्य निरूपण ब्रह्म के अव्यक्त भाव का वर्णन। भक्ति स्वरूप निदिध्यासन की अवस्था में ब्रह्म की अभिव्यक्ति का विवेचन। प्रकाश आदि की तरह ब्रह्म के मूर्त्तामूर्त्तरूप का वर्णन। ब्रह्म के कल्याणमय अनन्त गुणों के सद्भाव का निरूपण । —पृ० ६३४-५१, ६. अहिकुण्डलाधिकरण (सूत्र २६-२६) अहिकुण्डल के दृष्टान्त से ब्रह्म के भेदाभेद रूप का प्रतिपादन । तेज के दृष्टान्त एवं प्रकारान्तर से भी भेदाभेद का उपपादन । जड़धर्म विधेयक श्रुति के आधार पर ब्रह्म के अंशांशी भाव का निरूपण ।—पृ० ६५१-५५, ७. पराधिकरण (सूत्र ३० ३६) १. पूर्वपक्ष-श्रुति में ब्रह्म को सेतु और परिमित कहे जाने से, उससे अतिरिक्त तत्त्व के अस्तित्व की आशंका । २. (सिद्धान्त)—सादृश्यता बोधकरूप से सेतु शब्द का प्रतिपादन । उपासना के द्वैविध्य से सेतु शब्द के प्रयोग का उपपादन । स्थान विशेष से संबद्ध होने से ब्रह्म के परिमाण निर्देश का सयुक्ति प्रतिपादन । ब्रह्म के अतिरिक्त किसी अन्य वृहत् पदार्थ की सत्ता का निराकरण । ब्रह्म की सर्वव्यापकता का समर्थन । —६५५-६२, ankurnagpal108@gmail.com

३७ ८ फलाधिकरण [सूत्र ३७-४०] १. हर प्रकार के फल प्रदान में ब्रह्म की कत्तृं ता का वर्णन। २. जैमिनि के मत से धर्म से फलप्राप्ति का वर्णन। ३. बादरायण के मतानुसार परमेश्वर की फल प्रदानता का उपपादन। —पृ० ६६२-६६, (तृतीय पाद) १. सर्ववेदांत प्रत्ययाधिकरण [सूत्र १-५] विभिन्न वैदिक शाखाओं में विहित एक जातीय ब्रह्मोपासना की एकता का वर्णन। उपासना की एकता के संबंध में की गई शंका का समाधान। यज्ञांग स्नान के दृष्टान्त से शिरोव्रत की अध्ययनांगता का निरूपण। श्रुति के आधार पर विद्या की एकता का समर्थन। एक उपासना में कथित गुणों का तत्समान जातीय उपासना में उपसंहार के प्रयोजन का निरूपण। —पृ० ६६७-७२, २. अन्यथात्वाधिकरण [सूत्र ६-६] १. पूर्वपक्ष—छांदोग्य और बृहदारण्यक में वर्णित उद्गीथ विद्या की भिन्नता का संशय। २. (सिद्धान्त)—छांदोग्य और बृहदारण्योक्त उद्गीथो- पासना के स्वरूपगत भेद के आधार पर दोनों की पृथकता और विद्याभेद का प्रतिपादन। उद्गीथ की प्रणवार्थता का निरूपण। —पृ० ६७२-७६, ३. सर्वभेदाधिकरण [सूत्र १०] ज्येष्ठ श्रेष्ठ आदि गुणों के योग से प्राणोपासना की एकता प्रतिपादन। —पृ० ६७६-८३, ४. आनन्दाधिकरण [सूत्र ११-१७] आनन्द आदि ब्राह्म गुणों का सभी उपासनाओं में चिन्तन का उपदेश। प्रियशिर आदि गुणों का सभी ankurnagpal108@gmail.com

३६ जगह उपसंहार किये जाने का निराकरण । प्रिय- शिर आदि गुणों की अपेक्षा आनन्द आदि गुणों की विलक्षणता का निरूपण । प्रियशिर आदि गुणों का प्रयोजन वर्णन । प्रियशिर आदि गुणों की अब्रह्मता का वर्णन । परमात्मा के आनन्द गुण का वर्णन । आनन्द आदि गुणों की परमार्थधर्मता का निरूपण । —पृ० ६८३-८६, ५. कार्याख्यानाधिकरण [सूत्र १८] भोजन के पूर्व और उत्तर काल में आचमनीय जल की प्राणवासना का निरूपण । —पृ० ६८६-६१, ६. समानाधिकरण [सूत्र १६] अग्नि रहस्य और बृहदारण्य की शाण्डिल्य विद्या की एकता का निरूपण । —पृ० ६६१-६२, ७. संबंधाधिकरण [सूत्र २०-२२] ब्रह्मोपासना के अंग "अहः और अहम्" इन दो नामों की प्रयोजनीयता निरूपण । स्थान भेद से उक्त दोनों के पृथक प्रयोग का निरूपण । श्रुति द्वारा स्वाभिमत [

४० १२. साम्परायाधिकरण (सूत्र २७-३१) ज्ञानी के पुण्यपाप त्याग काल का निरूपण । पुण्यपाप त्याग सपंर्क। वाक्य समन्वय का निर्देश । कर्मानुसार कार्याधिकार विशेष प्राप्त जीवों की अधिकार पर्यन्त अवस्थिति का विवेचन । —पृ० १००४-६, १३. अनियमाधिकरण (सूत्र ३२) उपासक मात्र की देवयान गति ब्रह्मलोक प्राप्ति का निरूपण । —पृ० १००६-१२, १४. अक्षर धी अधिकरण (सूत्र ३३-३४) अक्षर ब्रह्म संबंधी अस्थूलता आदि गुणों का सभी विद्याओं में उपसंहार निर्देश, उक्त गुणों के उपसंहार की आवश्यकता का निरूपण । —१०१२-१५, १५. अन्तरत्वाधिकरण (सूत्र ३५-३७) सर्वान्तरपद की परमार्थता का निरूपण । उषस्त और कहोल के प्रश्नार्थ के परस्पर विनिमय का प्रदर्शन । छांदोग्य में एक ही परादेवता के पूर्वापर कीर्त्तन का निरूपण । —पृ० १०१५-२६, १६. कामाद्यधिकरण (सूत्र ३८-४०) छांदोग्य और वाजसनेयोक्त सत्यकामता आदि ब्राह्म गुणों का अभेद निरूपण । नेति नेति श्रुति से सत्यकामता आदि गुणों की अप्रतिषिद्धता ज्ञापन । सगुणोपासना की मोक्षसाधकता का निरूपण ।— पृ० १०२६-३४ १७.तन्निर्धारण नियमाधिकरण (सूत्र ४१) कर्मकाल में कर्मांग उपासना की अवश्यकर्त्तव्यता का खंडन । —पृ० १०३४, १८. प्रदानाधिकरण (सूत्र ४२) अपहतपाप्मता आदि गुणों के साथ गुणी परमात्मा के चिन्तन की आवश्यकता ज्ञापन । —पृ० १०३४-३६, ankurnagpal108@gmail.com

. शरीरभावाधिकरण (सूत्र ५१-५२) Wait, in line 15:(सूत्र १-५२)or(सूत्र ५१-५२)? Look at (सूत्र १-५२): there is a digit before? No, there is a space, but wait, look really closely at the space between and: Wait, सूत्रends withत्र. Then a space. Then ? No, wait! There is no , it just says १-५२or is it५१-५२with themissing? Wait, look at the space: betweenत्रand१-५२: the space is the width of one digit! The was either broken or dropped out of the composing stick! Wait, or did it print a faint mark? No, it's blank. But wait, in Devanagari Brahma Sutra, Sharirabhava is सूत्र ५१-५२ (or 1-52? No sutras go up to 52 without being in the 50s here, since the previous is 44-50 and the next is 53-54!). Wait, should we transcribe५१-५२or१-५२? Usually, if the is missing in print, do we transcribe१-५२

४१ एक या अनेक के अनुष्ठान की कर्त्तव्यता निरूपण । १. पूर्वपक्ष—कर्मांगाश्रित उपासना में कर्मांग के साथ उपासनानुष्ठान की आवश्यकता का शास्त्र सम्मत युक्तिपूर्ण प्रतिपादन । —पृ०१०५७-६१ २६. यथाश्रयभावाधिकरण (सूत्र ५८-६४) २. (सिद्धान्त)—कर्मांगानुष्ठान के साथ तदाश्रित उपासना की अवश्य कर्त्तव्यता का खंडन, उक्त मत की पुष्टि में शास्त्र समर्थन । —पृ०१०६१-६६ (चतुर्थ पाद) १. पुरुषार्थाधिकरण (सूत्र १-२०) १. बादरायण के मतानुसार विद्या से मुक्ति लाभ का निरूपण । २. जैमिनि के मतानुसार विद्या की मुक्ति साधनता की अर्थवादिता का प्रदर्शन, उक्त मत में शिष्ट सम्मति प्रदर्शन । प्रकारान्तर से विद्या की कर्मांगता का समर्थन । ३. बादरायण मत से सिद्धान्त निरूपण । विद्या की कर्मांगता के विरुद्ध प्रमाण प्रदर्शन । विद्या की कर्मांगता का खंडन मृत व्यक्ति के साथ विद्या और कर्म के पृथक गमन का वर्णन विद्या की कर्मांगता विषयक जैमिनि की युक्ति का सतर्क खंडन जैमिनि प्रदर्शित नियम श्रुति का अर्थान्तर कथन, प्रकारान्तर से नियम श्रुति का प्रतिपादन । वैराग्य सम्पन्न व्यक्ति के गृह त्याग विषय में श्रुति प्रमाण प्रस्तुति । विद्या की कर्मोपमर्दकता प्रदर्शन । कर्मत्यागी संन्यासी के विद्यानुशीलन का समर्थन । ४. आचार्य जैमिनि के मतानुसार संन्यासाश्रम की अवैधता । ५. बादरायणाचार्य के मत से संन्यासाश्रम का सद्भाव तथा वैधता प्रतिपादन । —पृ०१०६७-८६ ankurnagpal108@gmail.com

४३ २. स्तुतिमात्राधिकरण (सूत्र २१-२२) १. पूर्वपक्ष—यज्ञांग उद्गीथ आदि के विषय में उपदिष्ट रसतमत्व आदि के प्रशंसामात्र तात्पर्य का निरूपण। २. (सिद्धान्त)—यज्ञांग उद्गीथादि के विषय में रसतमत्वादि दृष्टि की विधेयता का प्रतिपादन। —पृ० १०८६-८८ ३. पारिप्लवाधिकरण (सूत्र २३-२४) १. पूर्वपक्ष—उपनिषदुक्त सभी आख्यायिकाओं की पारिप्लव प्रयोगांगता का प्रदर्शन। २. (सिद्धान्त)—आख्यायिकाओं के विद्यामाहात्म्य प्रकाशन तात्पर्य का समर्थन, एकवाक्यता द्वारा सिद्धान्त प्रतिपादन। —पृ० १०८८-८९ ४. अग्नीन्धनाद्यधिकरण (सूत्र २५) ऊर्ध्वरेताओं का यज्ञांग विद्या में अधिकार प्रतिपादन पृ० १०८९-९० ५. सर्वापेक्षाधिकरण (सूत्र २६) कर्म निरत गृहस्थों की विद्योपासना में अग्निहोत्र कर्मानुष्ठान की आवश्यकता प्रतिपादन। पृ० १०९०-९२ ६. शमाद्यधिकरण (सूत्र २६) गृहस्थों के लिए शमदमादि आवश्यकता का प्रतिपादन। —पृ० १०९२-९४ ७. सर्वान्नानुमत्यधिकरण (सूत्र २८-३१) आपत् काल में प्राणात्मदर्शी के लिए सर्वान्नभक्षण की शास्त्रानुमति समर्थन। विशुद्ध आचार से चित्त शुद्धि निरूपण। यथेच्छ आहार निषेध। —पृ० १०९४-९७ ८. विहितत्वाधिकरण (सूत्र ३२-३५) मुक्ति की अभिलाषा से रहित गृही के लिए आश्रमो- चित कर्मानुष्ठान की अनिवार्यता का निर्देश। विद्या के सहकारी साधन के रूप में कर्मानुष्ठान की कर्तव्यता का निरूपण। यज्ञांग और आश्रमांग कर्मों ankurnagpal108@gmail.com

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की एकरूपता का विश्लेषण। आश्रमोचित कर्म के साथ विद्या के अविरोध का प्रतिपादन। —पृ०१०६७-६६ ६. विधुराधिकरण (सूत्र ३६-३६) अनाश्रमी व्यक्तियों के लिए भी ब्रह्मविद्या में अधिकार प्रदर्शन प्रकारान्तर से उक्त मत का प्रतिपादन। अनाश्रमी की अपेक्षा आश्रमी की श्रेष्ठता प्रतिपादन। —पृ०१०६६-११०२ १०. तद्भूताधिकरण (सूत्र ४०-४३) ब्रह्मचर्य आदि नैष्ठिकों के लिए निज आश्रम परित्या- ज्यता का निषेध, नैष्ठिकों के स्वधर्माच्युत होने पर प्रायश्चित्ताभाव का निरूपण। स्वधर्माच्युत नैष्ठिकों का विद्या में अनधिकार प्रदर्शन। —पृ०११०२-५ ११. स्वाम्यधिकरण (सूत्र ४४-४५) १. आत्रेय के मतानुसार कर्मांग उपासना में यजमान कर्त्तृता का निरूपण। २. औडुलोमि के मत से ऋत्वित्वक् कर्त्तृत्व निरूपण —पृ०११०

४५ (चतुर्थ अध्याय) (प्रथम पाद) १. आवृत्त्यधिकरण (सूत्र १-२) १. ब्रह्म प्राप्ति की उपाय उपासना के एक बार अनुष्ठान मात्र से फलप्राप्ति संभावना प्रदर्शन। २. जीवन पर्यन्त उपासना की कर्त्तव्यता निरूपण, अनुकूल प्रमाणों के आधार पर उक्तसिद्धान्त का निरूपण। —पृ०१११७-२० २. आत्मत्वोपासनाधिकरण (सूत्र ३) १. पूर्वपक्ष—आत्मरूप से ब्रह्म की उपासना का निषेध। २. (सिद्धान्त)—आत्मभाव से उपासना की कर्त्तव्यता का निरूपण। —पृ०११२०-२३ ३. प्रतीकाधिकरण (सूत्र ४-५) १. पूर्वपक्ष--मन आदि प्रतीक की आत्मारूप से उपासना का समर्थन। २. (सिद्धान्त) मन आदि प्रतीक की आत्मारूप से उपासना का खंडन मन आदि प्रतीक में ब्रह्मदृष्टि की कर्त्तव्यता का प्रतिपादन। —पृ०११२३-२४ ४. आदित्यादिमत्याधिकरण (सूत्र ६) १. पूर्वपक्ष—कर्मांग उद्गीथ आदि की उपासना में आदित्य आदि में उद्गीथादि दृष्टि कर्त्तव्यता का निरूपण। २. (सिद्धान्त)—कर्मांग उद्गीथ आदि में आदित्य दृष्टि का समर्थन। —पृ०११२४-२५ ५. आसीनाधिकरण (सूत्र ७-११) आसनविशेष में ही उपासना करने का उपपादन। ध्यानात्मक उपासना में आसन की अनिवार्यता ज्ञापन। उपासना की स्थिरतासापेक्षता का प्रतिपादन। उपासना में एकाग्रता के अनुकूल देश, काल की प्रयोजनीयता का समर्थन। —पृ०११२५-२७ ankurnagpal108@gmail.com

४६ ६. आप्रायणाधिकरण (सूत्र १२) मृत्युकाल पर्यन्त उपासना की प्रयोजनीयता का प्रतिपादन । —पृ० ११२८- ७. तदधिगमाधिकरण (सूत्र १३) १. पूर्वपक्ष—ब्रह्म विद्या अभ्यास से पूर्वोत्तरपापों के विनाश का अस्वीकरण । २. (सिद्धान्त)—ब्रह्मविद्या अभ्यास से पूर्वोत्तर पापों का विनाश तथा उत्तरीय पापपुण्यों के असंस्पर्श का प्रतिपादन । —पृ० ११२८–३२ ८. इतराधिकरण (सूत्र १४) ब्रह्मविद्या के उदय से पूर्वोत्तर पुण्य के विनाश और असंस्पर्श का प्रतिपादन । —पृ० ११३२–३३ ९. अनारब्धकार्याधिकरण (सूत्र १५) १. पूर्वपक्ष—ब्रह्मविद्या प्राप्ति से प्रारब्धकर्म के विनाश का प्रतिपादन । २. (सिद्धान्त)—प्रारब्धकर्म रहित अन्य कर्मों के क्षय का प्रतिपादन । —पृ० २१३३–३४ १०. अग्निहोत्राद्यधिकरण (सूत्र १६-१८) १. पूर्वपक्ष—अग्निहोत्र आदि नित्यकर्मों की अनुष्ठेयता का प्रदर्शन । २. सिद्धान्त—अग्निहोत्र आदि की अवश्य कर्त्तव्यता का प्रतिपादन विद्या सहकारी कृत कर्मों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन । —पृ० ११३४–३६ ११. इतरक्षपणाधिकरण (सूत्र १९) भोगद्वारा ही प्रारब्ध कर्मों के क्षय का प्रतिपादन । पृ० ११३६–३७ (द्वितीय पाद) १. वागाद्यधिकरण (सूत्र १-२) १. पूर्वपक्ष—वाक् आदि इन्द्रियों की वृत्तिलय का प्रदर्शन । ankurnagpal108@gmail.com

४७ २. सिद्धान्त- उत्क्रमण काल में इन्द्रियों का मन से मिलने का प्रतिपादन तथा इन्द्रियों की अणुता का उपपादन। —पृ०११३६-४१ २. मनोधिकरण (सूत्र ३) मरण काल में इन्द्रियों सहित मन का प्राण से मिलने का वर्णन। —पृ०११४१-४२ ३. अध्यक्षाधिकरण (सूत्र ४) देहाध्यक्ष जीव की प्राण संबद्धता का निरूपण। —पृ०११४२-४३ ४. भूताधिकरण (सूत्र ५-६) जीव समन्वित प्राण की भूतसंबद्धता का निरूपण। भूतों से प्राण संयोग का समर्थन। —पृ०११४३-४५ ५. आसृत्युपक्रमाधिकरण (सूत्र ७-१३) १. पूर्वपक्ष—विद्वान और अविद्वान के भेद से उपक्रमण के पार्थक्य की संभावना का संशय। २ सिद्धान्त—उपक्रमण में विद्वान अविद्वान की समानता का प्रतिपादन। ब्रह्म प्राप्ति न होने तक संसारगति का समर्थन। देह त्याग के उपरान्त भी जीव का सूक्ष्म शरीर से संबन्ध निरूपण। सूक्ष्म शरीर के सद्भाव से ही दैहिक उष्णता की उपलब्धि ज्ञापन। पृ०११४५-५३ ६. पर संपत्त्यधिकरण (सूत्र १४) जीव समन्वित भूतों की परमात्म लीनता का वर्णन। —पृ०११५३-५४ ७. अविभागाधिकरण (सूत्र १५) जीव समन्वित भूतों की परमात्मा से अविभक्त स्थिति का निरूपण —पृ०११५४-५५ ८. तदोकोधिकरण (सूत्र १६) मृत्युकाल में उपासक के हृदयाग्रभाग में ज्वलन का वर्णन। —पृ०११५५-५७ ankurnagpal108@gmail.com