श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३ बुद्धि की कर्तृता स्वीकारने में दोष प्रदर्शन। बुद्धि की कर्तृता में भोगशांकर्य का उपपादन बुद्धिकर्तृता में समाधिसाधन की असंभवता तथा उसकी भोगकर्तृता का समर्थन। जीव की कर्तृता होते हुए भी सामयिक कर्मानुष्ठान का उपपादन। —पृ० ८५०-५६, ६. परायत्ताधिकरण (सूत्र ४०-४१) जीव की ब्रह्माधीन कर्तृता का तथा जीव की चेष्टानुसार ईश्वर प्रेरणा का निरूपण। —पृ० ८५६-६०, ७ अंशाधिकरण (सूत्र ४२-५३) १. पूर्वपक्ष—ब्रह्म से जीव की अत्यन्त भिन्नता की शंका। २. (सिद्धान्त)—जीव की ब्रह्मांशता का प्रतिपादन। श्रुति और स्मृति प्रमाणों से अंशता का उपपादन। ब्रह्म में जीवगत दोष संसर्गता संभावना के प्रसंग में आदित्य आदि दृष्टान्तों की प्रस्तुति देहभेद से जीवों के अधिकार भेदों का प्रतिपादन। देहभेद और जीव भेद के कारण एक के भोग का दूसरे में अभाव प्रदर्शन। जीव और ब्रह्म की अभेद समर्थक आभासता का उपपादन। अदृष्ट की भोग नियामकता का वर्णन। भोगाभिसंधि से जीव की अनियामकता का वर्णन। अंशभेद के अनुसार भोगादि व्यवस्था का खंडन। —पृ० ८६०-७१, [चतुर्थ पाद] १. प्राणोत्पत्ति अधिकरण [सूत्र १-३] १. पूर्वपक्ष—इन्द्रियों की उत्पत्ति की शंका। २. (सिद्धान्त)—इन्द्रियों की उत्पत्ति का समर्थन, तथा अनुत्पत्ति बोधक श्रुतियों की गौणार्थता निरूपण। आकाशादि से भिन्न वायु आदि की सृष्टि का उपपादन। —पृ० ८७१-७५, ankurnagpal108@gmail.com