भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४७७ ) समस्त की उत्पत्ति होती है। जीवात्मा, परमात्मा का शरीर है, इस ज्ञान को दृढ़ करने के लिए अहं ज्ञान पूर्वक उपासना करना आवश्यक है। इससे सिद्ध होता है कि-भूमगुण विशिष्ट परमात्मा ही है। ३ अक्षराधिकरण अक्षरमम्बरान्त धृतेः ।१।३।१०॥ वाजसनेमिनो गार्गीप्रश्ने समामनंति “सहोवाचैतद्वैतदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदति अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेह- मच्छायम्” इत्यादि तत्र संशयः, किमेतदक्षरं प्रधानम्-जीवो वा - परमात्मा-इति, किं युक्तम् ? प्रधानमिति कुतः ? “अक्षरात्^परतः परः” इत्यादिष्वक्षर शब्दस्य प्रधाने प्रयोग दर्शनात् अस्थूलत्वा^देः च तत्र समन्वयात् । “ययातदक्षरमधिगम्यते” इत्यादिषु परस्मिन्न- प्यक्षरशब्दो दृश्यत इति चेत्-न, प्रमाणान्तर प्रसिद्ध श्रुति प्रसिद्धयोः प्रमाणान्तर प्रसिद्धस्य प्रथम प्रतीतेः, प्रतीत परिग्रहे विरोधा भावात् । वाजसनेय के गार्गी के प्रश्न के प्रसंग में-“उन्होंने कहा-हे गार्गि ! ब्राह्मण इस अक्षर को सूक्ष्म, स्थूल, दीर्घ, ह्रस्व, अलोहित, स्नेह और छाया रहित बतलाते हैं ।” इत्यादि जो कहा गया उस पर संशय होता है कि-उक्त गुणों वाला अक्षर कौन है ? प्रधान, जीव, या परमात्मा ? कह सकते हैं कि-प्रधान है, क्योंकि-“अक्षरात् परतः परः” इत्यादि स्थलों में अक्षर शब्द का प्रधान के अर्थ में प्रयोग देखा जाता है तथा स्थूल सूक्ष्म आदि विषम गुणों का समन्वय भी उसी में हो सकता है ।” ययातदक्षर- मधिगम्यते” इत्यादि में, परमात्मा के लिए भी, अक्षर शब्द का प्रयोग देखा जाता है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि-प्रमाणान्तर प्रसिद्ध और श्रुति प्रसिद्ध में प्रमाणान्तर प्रसिद्ध की, प्रथम प्रतीति होती है; प्रथम प्रतीत अर्थ के ग्रहण में किसी प्रकार के विरोध की संभावना नहीं रहती । “यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्पृथिव्याः” इत्यारभ्य सर्वस्य कालत्रितय वर्तिनः कारणभूताकाशाधारत्वे प्रतिपादिते “कस्मिन्नु ankurnagpal108@gmail.com