श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६० ) यदि कहें कि-दहराकाश की परमात्मता मान लेने पर, ब्रह्माकाश की उपमेयता संभव नहीं है, "वह पृथिवी से श्रेष्ठ आकाश से श्रेष्ठ है" इत्यादि वाक्यों में अनुपम बतलाया है अतः वह कैसे उपमेय हो सकता है ? बात ऐसी नहीं है-दहराकाश के हृदयपुंडरीक की अल्पता का निवारण ही उक्त वाक्य का प्रयोजन है-जैसे कि-अधिक वेगवान सूर्य के होते हुए भी "सूर्य तीर की तरह जाता है ।" इत्यादि में उसकी मंदगति का निवारण किया गया है । अथस्यात्-"एष आत्माऽपहतपाप्मा" इत्यादिना दहराकाशो न निर्दिश्यते "दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्" इति दहराकाशान्तर्वर्तिनस्ततोऽन्यस्यान्वेष्टव्यत्वेन प्रकृतत्त्वादिह 'एष आत्माऽपहतपाप्मा" इति तस्यैवान्वेष्टव्यस्य निर्देष्टुं युक्तत्वात् । आपत्ति की जाती है कि-"यह आत्मा निष्पाप है" इत्यादि में दहराकाश का निर्देश नहीं है "दहर आकाश में जो आकाश है उसके अन्तर्वर्त्ती का अन्वेषण करना चाहिए' इत्यादि में, दहराकाशान्तर्वर्त्ती किसी अन्य के अन्वेषण का उल्लेख मिलता है, इसलिए 'यह आत्मा निष्पाप है" इत्यादि में उसी के अन्बेषण का निर्देश मानना संगत है। [L1