भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 152

${\Hugeश्रीलिङ्गमहापुराण}$ १५० | [ पूर्वभाग


कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहो दम्भ उपद्रवः।<br>यानि चान्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ १२<br><br>दह्यन्ते प्राणिनस्ते तु त्वत्समुत्थेन वह्निना।<br>अस्माकं दह्यमानानां त्राता भव सुरेश्वर॥ १३सभी ओरसे आच्छादित हो गये। इसीलिये ये काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ आदि विक्षोभात्मक विकृत अग्नियाँ अग्नितुल्य ही हैं। इस जगत्में जो भी स्थावर-जंगम जीव एवं पदार्थ हैं, वे सब आपद्वारा उत्पादित अग्निसे दग्ध हो रहे हैं। अतएव हे सुरेश्वर! उस अग्निसे दग्ध हो रहे हम सभीकी आप रक्षा कीजिये॥ ११-१३॥
त्वं च लोकहितार्थाय भूतानि परिषिञ्चसि।<br>महेश्वर महाभाग प्रभो शुभनिरीक्षक॥ १४<br><br>आज्ञापय वयं नाथ कर्तारो वचनं तव।<br>भूतकोटिसहस्रेषु रूपकोटिशतेषु च॥ १५<br><br>अनन्तं गन्तुं न शक्ताः स्म देवदेव नमोऽस्तु ते॥ १६हे महेश्वर! हे महाभाग! हे प्रभो! हे शुभ निरीक्षक! आप लोक-कल्याणके लिये जीवोंको अमृतरूपी जलसे सींचते हैं। हे नाथ! आज्ञा दीजिये; हमलोग आपके वचनोंका पालन करनेके लिये तत्पर हैं। अनन्त पदार्थों एवं उनके नाम-रूपोंके मध्य आप व्याप्त हैं, आपका पार हम पा नहीं सके हैं। हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार है॥ १४-१६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे 'शिवस्तुतिवर्णनं' नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवस्तुतिवर्णन' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३२॥


तैंतीसवाँ अध्याय

मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश

नन्द्युवाच<br>ततस्तुतोष भगवाननुगृह्य महेश्वरः।<br>स्तुतिं श्रुत्वा स्तुतस्तेषामिदं वचनमब्रवीत्॥ १नन्दीश्वर बोले— उन मुनियोंके द्वारा संस्तुत भगवान् महेश्वर उनकी स्तुति सुनकर उनके प्रति अनुग्रहशील होकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनसे यह वचन बोले॥ १॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि युष्माभिः कीर्तितं स्तवम्।<br>श्रावयेद्वा द्विजान् विप्रो गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ २जो विप्र आप लोगोंद्वारा की गयी स्तुतिको पढ़ेगा अथवा सुनेगा अथवा द्विजोंको सुनायेगा, वह मेरे गणोंमें मुख्य स्थान प्राप्त करेगा॥ २॥
वक्ष्यामि वो हितं पुण्यं भक्तानां मुनिपुङ्गवाः।<br>स्त्रीलिङ्गमखिलं देवी प्रकृतिर्मम देहजा॥ ३<br><br>पुंल्लिङ्गं पुरुषो विप्रा मम देहसमुद्भवः।<br>उभाभ्यामेव वै सृष्टिर्मम विप्रा न संशयः॥ ४हे मुनिश्रेष्ठो! आप भक्तोंके हितार्थ अब मैं शुभ उपदेश करता हूँ। इस जगत्में समस्त स्त्रीलिङ्ग-समुदाय मेरे शरीरसे उत्पन्न प्रकृतिदेवीका ही रूप है और हे विप्रो! सभी पुंल्लिङ्ग-समुदाय मेरी देहसे उत्पन्न पुरुषका रूप है। हे विप्रो! यह सृष्टि मुझसे प्रादुर्भूत पुरुष-प्रकृति (नर-नारी) इन्हीं दोनोंसे हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है॥ ३-४॥
न निन्देद्यतिनं तस्माद्दिग्वाससमनुत्तमम्।<br>बालोन्मत्तविचेष्टं तु मत्परं ब्रह्मवादिनम्॥ ५सभी शिवरूप हैं, अतएव किसीकी भी निन्दा न
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