श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| | करनेके कारण चन्द्रमाका नाम बहुल भी है। [इसके अतिरिक्त] यह शुक्लत्व, अमृतत्व तथा शीतत्वको भी प्रकट करता है॥ ३-५॥ | | सूर्याचन्द्रमसोर्दिव्ये मण्डले भास्वरे खगे।<br>जलतेजोमये शुक्ले वृत्तकुम्भनिभे शुभे॥ ६<br><br>घनतोयात्मकं तत्र मण्डलं शशिनः स्मृतम्।<br>घनतेजोमयं शुक्लं मण्डलं भास्करस्य तु॥ ७ | सूर्य तथा चन्द्रमाके मण्डल दिव्य, प्रकाशमान्, आकाशगामी, जल-तेजसे युक्त, शुक्लवर्णवाले, गोल घड़ेके समान तथा शुभ हैं। उनमें चन्द्रमाका मण्डल घने जलके स्वरूपवाला तथा सूर्यका मण्डल घने तेजके स्वरूपवाला शुक्लवर्णका कहा गया है॥ ६-७॥ | | वसन्ति सर्वदेवाश्च स्थानान्येतानि सर्वशः।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु ऋक्षसूर्यग्रहाश्रयाः॥ ८<br><br>तेन ग्रहा गृहाण्येव तदाख्यास्ते भवन्ति च।<br>सौरं सूर्योऽविशत्स्थानं सौम्यं सोमस्तथैव च॥ ९<br><br>शौक्रं शुक्लोऽविशत्स्थानं षोडशार्चिः प्रतापवान्।<br>बृहद् बृहस्पतिश्चैव लोहितश्चैव लोहितम्॥ १०<br><br>शनैश्चरं तथा स्थानं देवश्चापि शनैश्चरः।<br>बौधं बुधस्तु स्वर्भानुः स्वर्भानुस्थानमाश्रितः॥ ११<br><br>नक्षत्राणि च सर्वाणि नक्षत्राणि विशन्ति च।<br>गृहाण्येतानि सर्वाणि ज्योतींषि सुकृतात्मनाम्॥ १२<br><br>कल्पादौ सम्प्रवृत्तानि निर्मितानि स्वयम्भुवा।<br>स्थानान्येतानि तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १३<br><br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु देवस्थानानि तानि वै।<br>अभिमानिनोऽवतिष्ठन्ते देवाः स्थानं पुनः पुनः॥ १४<br><br>अतीतैस्तु सहैतानि भाव्याभाव्यैः सुरैः सह।<br>वर्तन्ते वर्तमानैश्च स्थानिभिस्तैः सुरैः सह॥ १५ | सभी देवता इन स्थानोंमें भलीभाँति निवास करते हैं। वे सभी मन्वन्तरोंमें नक्षत्रों, सूर्य तथा ग्रहोंका आश्रय ग्रहण करते हैं। इसलिये ग्रह [एक तरहसे] गृह ही हैं, और वे उन्हींके नामवाले होते हैं। सूर्यने सौरस्थानमें प्रवेश किया एवं सोम (चन्द्रमा)-ने सौम्यस्थानमें प्रवेश किया। सोलह किरणोंवाला प्रतापी शुक्र शौक्रस्थानमें प्रविष्ट हुआ। बृहस्पति बृहत् स्थानमें तथा लोहित (भौम) लोहितस्थानमें स्थित हुए। शनैश्चरदेव शनैश्चरस्थानमें, बुध बौधस्थानमें तथा स्वर्भानु (राहु) स्वर्भानुस्थानमें स्थित हुए। सभी नक्षत्र (अपने-अपने) नक्षत्र-स्थानोंमें प्रवेश करते हैं। ये सब ज्योतिस्थान पुण्यात्माओंके गृह हैं। ब्रह्माने इन स्थानोंको निर्मित किया है। ये कल्पके आदिमें प्रवृत्त हुए और प्रलयपर्यन्त बने रहते हैं। वे सभी मन्वन्तरोंमें देवताओंके निवासस्थान हुआ करते हैं। अभिमानी देवतालोग उनमें बार-बार निवास करते हैं। ये स्थान अतीत, भाव्य तथा अभाव्य देवताओंके साथ और वर्तमान स्थानी देवताओंके साथ विद्यमान रहते हैं॥ ८-१५॥ | | अस्मिन् मन्वन्तरे चैव ग्रहा वैमानिकाः स्मृताः।<br>विवस्वानदितेः पुत्रः सूर्यो वैवस्वतेऽन्तरे॥ १६<br><br>द्युतिमानृषिपुत्रस्तु सोमो देवो वसुः स्मृतः।<br>शुक्रो देवस्तु विज्ञेयो भार्गवोऽसुरयाजकः॥ १७<br><br>बृहत्तेजाः स्मृतो देवो देवाचार्योऽङ्गिरासुतः।<br>बुधो मनोहरश्चैव ऋषिपुत्रस्तु स स्मृतः॥ १८<br><br>शनैश्चरो विरूपस्तु संज्ञापुत्रो विवस्वतः।<br>अग्निर्विकेश्यां जज्ञे तु युवासौ लोहितार्चिषः॥ १९ | इस मन्वन्तरमें ग्रहोंको वैमानिक कहा गया है। वैवस्वत मन्वन्तरमें अदितिका पुत्र विवस्वान् सूर्य है। ऋषिपुत्र द्युतिमान् देवता वसुको सोम (चन्द्र) कहा गया है। असुरोंके याजक शुक्रदेवको भृगुका पुत्र जानना चाहिये। महातेजस्वी देवाचार्य बृहस्पतिको अंगिरारृषिका पुत्र कहा गया है। जो सुन्दर बुध है, उसे ऋषिपुत्र कहा गया है। विकृतरूपवाला शनैश्चर संज्ञाका पुत्र है; वह विवस्वान्से उत्पन्न हुआ है। लोहित आभावाला यह युवा भौम अग्निरूप रुद्रके द्वारा उनकी पत्नी विकेशीसे उत्पन्न |