भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ६५ ] सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम २७५


| उपसंहृतवान् सत्रं सद्यस्तद्वाक्यगौरवात्।<br>ततः प्रीतश्च भगवान् वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ ११३<br>सम्प्राप्तश्च तदा सत्रं पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः।<br>वसिष्ठेन तु दत्तार्घ्यः कृतासनपरिग्रहः ॥ ११४<br>पराशरमुवाचेदं प्रणिपत्य स्थितं मुनिः।<br>वैरे महति यद्वाक्याद् गुरोर्द्याश्रिता क्षमा ॥ ११५<br>त्वया तस्मात्समस्तानि भवाञ्छास्त्राणि वेत्स्यति।<br>सन्ततेर्मम न च्छेदः क्रुद्धेनापि यतः कृतः ॥ ११६<br>त्वया तस्मान्महाभाग ददाम्यन्यं महावरम्।<br>पुराणसंहिताकर्ता भवान् वत्स भविष्यति ॥ ११७<br>देवतापरमार्थं च यथावद्वेत्स्यते भवान्।<br>प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा कर्मणस्तेऽमला मतिः ॥ ११८<br>मत्प्रसादादसन्दिग्धा तव वत्स भविष्यति।<br>ततश्च प्राह भगवान् वसिष्ठो वदतां वरः ॥ ११९<br>पुलस्त्येन यदुक्तं ते सर्वमेतद्भविष्यति।<br>अथ तस्य पुलस्त्यस्य वसिष्ठस्य च धीमतः ॥ १२०<br>प्रसादाद्वैष्णवं चक्रे पुराणं वै पराशरः।<br>षट्प्रकारं समस्तार्थसाधकं ज्ञानसञ्चयम् ॥ १२१<br>षट्सहस्रमितं सर्वं वेदार्थेन च संयुतम्।<br>चतुर्थं हि पुराणानां संहितासु सुशोभनम् ॥ १२२<br>एष वः कथितः सर्वो वासिष्ठानां समासतः।<br>प्रभवः शक्तिसूनोश्च प्रभावो मुनिपुङ्गवाः ॥ १२३ | गरिमाके कारण मुनिश्रेष्ठ पराशरने शीघ्र ही यज्ञको बन्द कर दिया। तब मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठ प्रसन्न हो गये ॥ ११२-११३ ॥<br>उसी समय ब्रह्माके पुत्र [ऋषि] पुलस्त्य यज्ञमें आये। वसिष्ठने उन्हें अर्घ्य प्रदान किया तथा आसन देकर बैठाया; तत्पश्चात् प्रणाम करके [सम्मुख] खड़े पराशरसे मुनि [पुलस्त्य]-ने कहा—'तुमने गुरुकी आज्ञासे आज महान् वैरमें क्षमाको आश्रित किया है, अतः तुम सभी शास्त्रोंको जान जाओगे और कुपित होनेपर भी तुमने मेरे वंशका नाश नहीं किया, अतः हे महाभाग! मैं तुम्हें अन्य महान् वर भी प्रदान करता हूँ—हे वत्स ! तुम पुराणसंहिताके कर्ता होओगे और देवताओंके परम रहस्यको वास्तविकरूपमें जानोगे। हे वत्स! मेरी कृपासे प्रवृत्ति तथा निवृत्तिके कर्मोंसे तुम्हारी बुद्धि विशुद्ध एवं सन्देहरहित होगी' ॥ ११४–११८ १/२ ॥<br>तदनन्तर वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठने कहा—'[हे वत्स!] ऋषि पुलस्त्यने तुम्हारे लिये जो कुछ कहा है, यह सब होकर रहेगा।' तब उन पुलस्त्य तथा बुद्धिमान् वसिष्ठकी कृपासे पराशरने विष्णुपुराणकी रचना की। यह छः अंशोंवाला, सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाला, ज्ञानका भण्डार, छः हजार श्लोकोंसे युक्त, वेदार्थसे समन्वित, पुराण-संहिताओंमें चतुर्थ तथा परम सुन्दर है ॥ ११९–१२२ ॥<br>हे श्रेष्ठ मुनियो ! मैंने आपलोगोंसे संक्षेपमें वसिष्ठके पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा शक्तिपुत्र [पराशर]-के सम्पूर्ण प्रभावका वर्णन कर दिया ॥ १२३ ॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वासिष्ठकथनं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वासिष्ठकथन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥


पैंसठवाँ अध्याय

सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम *

| ऋषय ऊचुः<br>आदित्यवंशं सोमस्य वंशं वंशविदां वर।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं सङ्क्षेपाद्रोमहर्षण ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>अदितिः सुषुवे पुत्रमादित्यं कश्यपाद् द्विजाः।<br>तस्यादित्यस्य चैवासीद्भार्यात्रयमथापरम् ॥ २<br>संज्ञा राज्ञी प्रभा छाया पुत्रांस्तासां वदामि वः।<br>संज्ञा त्वाष्ट्री च सुषुवे सूर्यान्मनुमनुत्तमम् ॥ ३ | ऋषिगण बोले—हे वंशविदोंमें श्रेष्ठ! हे रोमहर्षण! आप संक्षेपमें सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशके विषयमें हमलोगोंको बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥<br><br>सूतजी बोले—हे द्विजो! अदितिने कश्यपसे आदित्य नामक पुत्रको उत्पन्न किया। उस आदित्यकी ज्येष्ठ भार्याके अतिरिक्त तीन और भार्याएँ थीं। वे संज्ञा, राज्ञी, प्रभा तथा छाया थीं—मैं उनके पुत्रोंके विषयमें |


* यहाँ जो रुद्रसहस्रनामस्तोत्र दिया है, वह महाभारतके अनुशासन पर्व अ० १७ के अन्तर्गत आये शिवसहस्रनामस्तोत्र से साम्य रखता है, वहाँ उसका विस्तृत माहात्म्य भी पूर्वमें वर्णित है।