श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७७ ] शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल... शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य ३७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथापि भक्ताः परमेश्वरस्य<br>कृत्वेष्टलोष्टैरपि रुद्रलोकम्।<br>प्रयान्ति दिव्यं हि विमानवर्यं<br>सुरेन्द्रपद्मोद्भववन्दितस्य ॥ ४ | फिर भी इन्द्र तथा ब्रह्माके द्वारा नमस्कृत परमेश्वरके भक्त ईंटों अथवा पत्थरोंसे उनका उत्तम मन्दिर बनवाकर दिव्य रुद्रलोकको जाते हैं॥ ३-४॥ |
| बाल्यात्तु लोष्टेन शिवं च कृत्वा<br>मृदापि वा पांसुभिरादिदेवम्।<br>गृहं च तादृग्विधमस्य शम्भोः<br>सम्पूज्य रुद्रत्वमवाप्नुवन्ति ॥ ५ | बालभावसे भी पत्थर, मिट्टी अथवा धूलसे इन शम्भुका उस प्रकारका आलय (मन्दिर) बनाकर आदिदेव शिवका विधिपूर्वक पूजन करके वे रुद्रत्व प्राप्त करते हैं॥ ५॥ |
| तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भक्त्या भक्तैः शिवालयम्।<br>कर्तव्यं सर्वयत्नेन धर्मकामार्थसिद्धये ॥ ६ | अतः भक्तोंको धर्म, अर्थ, कामकी सिद्धिके लिये पूर्ण प्रयत्नसे भक्तिपूर्वक शिवालयका निर्माण करना चाहिये ॥ ६॥ |
| केशरं नागरं वापि द्राविडं वा तथापरम्।<br>कृत्वा रुद्रालयं भक्त्या शिवलोके महीयते ॥ ७ | केसर, नागर, द्राविड़ अथवा अन्य प्रकारका शिवालय भक्तिपूर्वक बनाकर भक्त शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ७॥ |
| कैलासाख्यं च यः कुर्यात्प्रासादं परमेष्ठिनः।<br>कैलासशिखराकारैर्विमानैर्मोदते सुखी ॥ ८ | जो [भक्त] कैलास नामक शिवालयका निर्माण करता है, वह कैलासशिखरके आकारवाले विमानोंमें सुखपूर्वक आनन्द मनाता है॥ ८॥ |
| मन्दरं वा प्रकुर्वीत शिवाय विधिपूर्वकम्।<br>भक्त्या वित्तानुसारेण उत्तमाधममध्यमम् ॥ ९<br><br>मन्दराद्रिप्रतीकाशैर्विमानैर्विश्वतोमुखैः ।<br>अप्सरोगणसङ्कीर्णैर्देवदानवदुर्लभैः ॥ १०<br><br>गत्वा शिवपुरं रम्यं भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्।<br>ज्ञानयोगं समासाद्य गाणपत्यं लभेन्नरः ॥ ११ | जो मनुष्य शिवके लिये अपने सामर्थ्यके अनुसार भक्तिके साथ विधिपूर्वक उत्तम, मध्यम अथवा अधम [श्रेणीका] मन्दरनामक शिवालय बनाता है, वह मन्दरपर्वतके सदृश, सभी ओर मुखवाले, अप्सराओंसे युक्त तथा देवदानवोंके लिये दुर्लभ विमानोंसे रम्य शिवलोकमें जाकर अभीष्ट सुखोंका उपभोग करके ज्ञानयोग प्राप्तकर गणाधिपति पद प्राप्त करता है॥ ९-११॥ |
| यः कुर्यान्मेरुनामानं प्रासादं परमेष्ठिनः।<br>स यत्फलमवाप्नोति न तत्सर्वैर्महामखैः ॥ १२<br><br>सर्वयज्ञतपोदानतीर्थवेदेषु यत्फलम्।<br>तत्फलं सकलं लब्ध्वा शिववन्मोदते चिरम् ॥ १३ | जो मेरु नामक शिवालय बनाता है, वह जो फल प्राप्त करता है, वह फल सभी महायज्ञोंके द्वारा भी सम्भव नहीं है; सभी प्रकारके यज्ञ, तप, दान, तीर्थ तथा वेदाध्ययन करनेसे जो फल होता है, उस समस्त फलको प्राप्त करके वह [मनुष्य] शिवकी भाँति चिरकालतक आनन्दित रहता है॥ १२-१३॥ |
| निषधं नाम यः कुर्यात्प्रासादं भक्तितः सुधीः।<br>शिवलोकमनुप्राप्य शिववन्मोदते चिरम् ॥ १४ | जो बुद्धिमान् [मनुष्य] भक्तिपूर्वक निषध नामक शिवालय बनाता है, वह शिवलोक प्राप्त करके शिवके समान चिरकालतक आनन्दित रहता है॥ १४॥ |
| कुर्याद्वा यः शुभं विप्रा हिमशैलमनुत्तमम्।<br>हिमशैलोपमैर्यानैर्गत्वा शिवपुरं शुभम् ॥ १५ | हे विप्रो! जो [मनुष्य] हिमशैल नामक अत्युत्तम शुभ शिवालय बनाता है, वह हिमशैलके समान |