श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| वैडूर्यनिर्मितं लिङ्गं पुष्परागेण पुष्यके।<br>माघे च सूर्यकान्तेन फाल्गुने स्फाटिकेन च॥ २२<br><br>सर्वमासेषु कमलं हैममेकं विधीयते।<br>अलाभे रजतं वापि केवलं कमलं तु वा॥ २३<br><br>रत्नानामप्यलाभे तु हेम्ना वा रजतेन वा।<br>रजतस्याप्यलाभे तु ताम्रलोहेन कारयेत्॥ २४<br><br>शैलं वा दारुजं वापि मृन्मयं वा सवेदिकम्।<br>सर्वगन्धमयं वापि क्षणिकं परिकल्पयेत्॥ २५ | (मूँगा)-से निर्मित लिङ्ग, मार्गशीर्ष (अगहन)-में वैडूर्यसे निर्मित लिङ्ग, पौषमें पुष्पराग (पुखराज)-से निर्मित लिङ्ग, माघमें सूर्यकान्तमणिसे निर्मित लिङ्ग तथा फाल्गुनमें स्फटिकसे निर्मित लिङ्गका यजन करना चाहिये॥ १९-२२॥<br><br>सभी महीनोंमें सुवर्णमय एक कमल बनानेका विधान है। सुवर्णके अभावमें चाँदीका कमल बनाना चाहिये। रत्नोंके अभावमें सोने अथवा चाँदीसे निर्माण करना चाहिये। चाँदीके भी अभावमें ताँबे अथवा लोहेसे बनाना चाहिये। वेदीसहित पाषाणका अथवा काष्ठका अथवा मिट्टीका सर्वगन्धमय लिङ्ग बनाये अथवा क्षणिक लिङ्गकी रचना करे॥ २३-२५॥ | | हैमन्तिके महादेवं श्रीपत्रेणैव पूजयेत्।<br>सर्वमासेषु कमलं हैममेकमथापि वा॥ २६<br><br>रजतं वापि कमलं हैमकर्णिकमुत्तमम्।<br>रजतस्याप्यभावे तु बिल्वपत्रैः समर्चयेत्॥ २७<br><br>सहस्रकमलालाभे तदर्धेनापि पूजयेत्।<br>तदर्धार्धेन वा रुद्रमष्टोत्तरशतेन वा॥ २८ | हेमन्त ऋतुमें बिल्वपत्रसे महादेवकी पूजा करनी चाहिये। सभी महीनोंमें एक सुवर्णमय कमल बनाना चाहिये अथवा सुवर्णकी कर्णिकायुक्त चाँदीका उत्तम कमल बनाना चाहिये और चाँदीके अभावमें बिल्वपत्रोंसे ही [शिवका] पूजन करना चाहिये। हजार कमलोंके अभावमें उसके आधेसे ही पूजन करना चाहिये अथवा उसके भी आधेसे अथवा कम-से-कम एक सौ आठ कमलोंसे रुद्रका पूजन करना चाहिये॥ २६-२८॥ | | बिल्वपत्रे स्थिता लक्ष्मीर्देवी लक्षणसंयुता।<br>नीलोत्पलेऽम्बिका साक्षादुत्पले षण्मुखः स्वयं॥ २९<br><br>पद्माश्रितो महादेवः सर्वदेवपतिः शिवः।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्रीपत्रं न त्यजेद् बुधः॥ ३०<br><br>नीलोत्पलं चोत्पलं च कमलं च विशेषतः।<br>सर्ववश्यकरं पद्मं शिला सर्वार्थसिद्धिदा॥ ३१<br><br>कृष्णागरुसमुद्भूतं सर्वपापनिकृन्तनम्।<br>गुग्गुलुप्रभृतीनां च दीपानां च निवेदनम्॥ ३२<br><br>सर्वरोगक्षयं चैव चन्दनं सर्वसिद्धिदम्।<br>सौगन्धिकं तथा धूपं सर्वकामार्थसाधकम्॥ ३३<br><br>श्वेतागरूद्भवं चैव तथा कृष्णागरूद्भवम्।<br>सौम्यं सीतारिधूपं च साक्षान्निर्वाणसिद्धिदम्॥ ३४ | बिल्वपत्रमें सर्वलक्षणयुक्त देवी लक्ष्मी, नीलोत्पलमें साक्षात् अम्बिका और उत्पलमें स्वयं षडानन विराजमान रहते हैं; सभी देवताओंके स्वामी महादेव शिव पद्ममें निवास करते हैं, अतः बुद्धिमान् मनुष्यको पूरे प्रयत्नसे बिल्वपत्रका [कभी भी] त्याग नहीं करना चाहिये और नीलोत्पल, उत्पल तथा विशेषकर कमलका त्याग नहीं करना चाहिये। पद्म सभीको वशमें करनेवाला होता है और शिला (मनःशिला) सभी सिद्धियोंको देनेवाली होती है। कृष्ण अगरुसे उत्पन्न धूप सभी पापोंको हरनेवाला, गुग्गुल आदिके दीपोंका निवेदन सभी रोगोंका क्षय करनेवाला, चन्दन सभी सिद्धियोंको देनेवाला और सुगन्धित धूप सभी कामनाओं तथा अर्थोंका साधक है। श्वेत अगरु तथा कृष्ण अगरुसे बनाया हुआ धूप और सौम्य सीतारि [नामक] धूप साक्षात् निर्वाण-सिद्धि प्रदान करनेवाला है॥ २९-३४॥ |