श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न्यस्यते यत्तदुत्पत्तिर्विपरीतं तु संहृतिः।<br>अङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्तं न्यस्यते हस्तयोर्द्वयोः॥ ६२<br>अतीव भोगदो देवि स्थितिन्यासः कुटुम्बिनाम्।<br>करन्यासं पुरा कृत्वा देहन्यासमनन्तरम्॥ ६३ | लिये समान है। दाहिने हाथके अँगूठेसे प्रारम्भ करके बायें हाथके अँगूठेतक जो न्यास किया जाता है, वह उत्पत्तिन्यास है और इसके विपरीत करना संहृति (संहार) न्यास है। दोनों हाथोंमें अँगूठेसे प्रारम्भ करके कनिष्ठातक जो न्यास किया जाता है, वह स्थितिन्यास होता है; हे देवि! वह [न्यास] गृहस्थोंको परम सुख प्रदान करनेवाला है। सर्वप्रथम करन्यास करके देहन्यास करना चाहिये और उसके बाद अंगन्यास करना चाहिये; यह सामान्य विधि है॥ ६०-६३ १/२॥ |
| अङ्गन्यासं न्यसेत्पश्चादेष साधारणो विधिः।<br>ओङ्कारं सम्पुटीकृत्य सर्वाङ्गेषु च विन्यसेत्॥ ६४<br>करयोरुभयोश्चैव दशाग्राङ्गुलिषु क्रमात्।<br>प्रक्षाल्य पादावाचम्य शुचिर्भूत्वा समाहितः॥ ६५ | प्रत्येक मन्त्रको ओंकारसे सम्पुटित करके सभी अंगोंमें, दोनों हाथोंमें तथा दसों अँगुलियोंके अग्रभागमें क्रमसे न्यास करना चाहिये। दोनों पैर धोकर आचमन करके शुद्ध होकर समाहित चित्त होकर पूर्वकी ओर अथवा उत्तरकी ओर मुख करके न्यासकर्म करना चाहिये॥ ६४-६५ १/२॥ |
| प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि न्यासकर्म समाचरेत्।<br>स्मरेत्पूर्वमृषिं छन्दो दैवतं बीजमेव च॥ ६६<br>शक्तिं च परमात्मानं गुरुं चैव वरानने।<br>मन्त्रेण पाणी सम्मृज्य तलयोः प्रणवं न्यसेत्॥ ६७<br>अङ्गुलीनां च सर्वेषां तथा चाद्यन्तपर्वसु।<br>सबिन्दुकानि बीजानि पञ्चमध्यमपर्वसु॥ ६८<br>उत्पत्त्यादित्रिभेदेन न्यसेदाश्रमतः क्रमात्।<br>उभाभ्यामेव पाणिभ्यामापादतलमस्तकम्॥ ६९<br>मन्त्रेण संस्पृशेद्देहं प्रणवेनैव सम्पुटम्।<br>मूर्ध्नि वक्त्रे च कण्ठे च हृदये गुह्यके तथा॥ ७०<br>पादयोरुभयोश्चैव गुह्ये च हृदये तथा।<br>कण्ठे च मुखमध्ये च मूर्ध्नि च प्रणवादिकम्॥ ७१<br>हृदये गुह्यके चैव पादयोर्मूर्ध्नि वाचि वा।<br>कण्ठे चैव न्यसेदेव प्रणवादित्रिभेदतः॥ ७२<br>कृत्वाऽङ्गन्यासमेवं हि मुखानि परिकल्पयेत्।<br>पूर्वादि चोर्ध्वपर्यन्तं नकारादि यथाक्रमम्॥ ७३<br>षडङ्गानि न्यसेत्पश्चाद्यथास्थानं च शोभनम्।<br>नमः स्वाहा वषड् हुं च वौषट्फट्कारकैः सह॥ ७४ | हे वरानने! प्रारम्भमें ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, परमात्मा तथा गुरुका स्मरण करना चाहिये। मन्त्रके उच्चारणके साथ दोनों हाथोंको धोकर दोनों करतलोंमें प्रणवका न्यास करना चाहिये। सभी अँगुलियोंके आदि-अन्त पर्वोपर और पाँचों मध्यम पर्वोंपर बिन्दुयुक्त पाँच बीजोंका उत्पत्ति आदि तीन भेदोंसे तथा ब्रह्मचर्य आदिके क्रमसे न्यास करना चाहिये। दोनों हाथोंसे मस्तकसे लेकर पैरतक प्रणवके द्वारा सम्पुटित मन्त्रसे देहका स्पर्श करना चाहिये। प्रणवयुक्त मन्त्रसे सिर, मुख, कण्ठ, हृदय, गुह्यस्थान एवं दोनों पैरोंमें; गुह्यस्थान, हृदय, कण्ठ, मुख तथा सिरमें; पुनः हृदय, गुह्यस्थान, दोनों पैरों, सिर, मुख तथा कण्ठमें तीन प्रकारका न्यास करना चाहिये। इस प्रकार अंगन्यास करके प्रणवसहित नकारसे प्रारम्भ होकर यकारपर पूर्ण होनेवाले इन नकार आदि वर्णोंकी क्रमशः अपने शरीरमें भावना करे। इसके बाद मन्त्रमें नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् तथा फट्के साथ यथास्थान छहों अंगोंमें उत्तम रीतिसे न्यास करना चाहिये॥ ६६-७४॥ |
| प्रणवं हृदयं विद्यान्नकारः शिर उच्यते।<br>शिखा मकार आख्यातः शिकारः कवचं तथा॥ ७५ | प्रणवको हृदय जानना चाहिये, 'न' को सिर कहा जाता है, 'म' को शिखा कहा गया है, 'शि' को कवच |