श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ८५ ] पञ्चाक्षरीविद्या ( पञ्चाक्षरमन्त्र ), जपविधान तथा उसकी महिमा [ ४२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चत्वारिंशत्समावृत्ति प्राणानायम्य संस्मरेत्।<br>पञ्चाक्षरस्य मन्त्रस्य प्राणायाम उदाहृतः ॥ १०४<br><br>प्राणायामाद्भवेत्क्षिप्रं सर्वपापपरिक्षयः।<br>इन्द्रियाणां वशित्वं च तस्मात्प्राणांश्च संयमेत् ॥ १०५ | जप करना चाहिये। श्वास रोककर चालीस बार जप करना चाहिये। यह पञ्चाक्षरमन्त्रका प्राणायाम कहा गया है। प्राणायामसे शीघ्र ही सभी पापोंका नाश और इन्द्रियोंका निग्रह हो जाता है, अतः प्राणायाम [अवश्य] करना चाहिये॥ १०३-१०५॥ |
| गृहे जपः समं विद्याद् गोष्ठे शतगुणं भवेत्।<br>नद्यां शतसहस्रं तु अनन्तः शिवसन्निधौ ॥ १०६<br><br>समुद्रतीरे देवह्रदे गिरौ देवालयेषु च।<br>पुण्याश्रमेषु सर्वेषु जपः कोटिगुणो भवेत् ॥ १०७<br><br>शिवस्य सन्निधाने च सूर्यस्याग्रे गुरोरपि।<br>दीपस्य गोर्जलेस्यापि जपकर्म प्रशस्यते ॥ १०८ | घरमें किये गये जपको सामान्य फलवाला जानना चाहिये। गोशालामें किया गया जप उससे सौ गुना फलदायक होता है। नदीके तटपर किया गया जप लाख गुना और शिवके सान्निध्यमें किया गया जप अनन्त गुना फलदायक होता है। समुद्रके तटपर, देवसरोवरोंमें, पर्वतपर, देवालयमें अथवा सभी पवित्र आश्रमोंमें किया गया जप करोड़ गुना फलदायक होता है। शिवकी सन्निधिमें, सूर्य, गुरु, दीपक, गौ अथवा जलके समक्ष जपकर्म श्रेष्ठ माना जाता है॥ १०६-१०८॥ |
| अङ्गुलीजपसंख्यानमेकमेकं शुभानने।<br>रेखैरष्टगुणं प्रोक्तं पुत्रजीवफलैर्दश ॥ १०९<br><br>शतं वै शङ्खमणिभिः प्रवालैश्च सहस्रकम्।<br>स्फाटिकैर्दशसाहस्रं मौक्तिकैर्लक्षमुच्यते ॥ ११०<br><br>पद्माक्षैर्दशलक्षं तु सौवर्णैः कोटिरुच्यते।<br>कुशाग्रन्ध्या च रुद्राक्षैरनन्तगुणमुच्यते ॥ १११ | हे शुभानने! एक-एक करके अँगुलीसे जपकी गणना करनेपर वह सामान्य फल प्रदान करता है; रेखाओंसे करनेपर वह आठ गुना फलदायक कहा गया है। पुत्रजीव-फलोंसे जप करनेपर दस गुना, शंखमणियोंसे करनेपर सौ गुना, प्रवालों (मूँगा)-से करनेपर हजार गुना, स्फटिकोंसे करनेपर दस हजार गुना और मोतियोंसे करनेपर लाख गुना फलदायक कहा जाता है। कमलके बीजसे करनेपर दस लाख गुना और सोनेके सुवर्णखण्डोंसे करनेपर जप करोड़ गुना फलदायक कहा जाता है। कुशाकी ग्रन्थिसे तथा रुद्राक्षोंसे गणना करनेपर जप अनन्त गुना फलदायक होता है॥ १०९-१११॥ |
| पञ्चविंशति मोक्षार्थं सप्तविंशति पौष्टिकम्।<br>त्रिंशच्च धनसम्पत्त्यै पञ्चाशच्चाभिचारिकम् ॥ ११२<br><br>तत्पूर्वाभिमुखं वश्यं दक्षिणं चाभिचारिकम्।<br>पश्चिमं धनदं विद्यादुत्तरं शान्तिकं भवेत् ॥ ११३ | पचीस मणियोंकी माला मोक्षके लिये, सत्ताईसकी [माला] पुष्टिके लिये, तीसकी धन-सम्पदाके लिये और पचासकी अभिचार कर्मके लिये होती है। पूर्वकी ओर मुख करके किया गया जप वशीकरणकी शक्ति देनेवाला और दक्षिणकी ओर मुख करके किया गया जप अभिचारकर्मकी शक्ति देनेवाला होता है। पश्चिमकी ओर मुख करके किये गये जपको धन प्रदान करनेवाला जानना चाहिये। उत्तरकी ओर मुख करके किया गया जप शान्ति प्रदान करनेवाला होता है॥ ११२-११३॥ |
| अङ्गुष्ठं मोक्षदं विद्यात्तर्जनी शत्रुनाशनी।<br>मध्यमा धनदा शान्तिं करोत्येषा ह्यनामिका ॥ ११४ | अँगुठेको मोक्ष देनेवाला जानना चाहिये। तर्जनी |