भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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५९८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| मुनिश्रेष्ठौ च हित्वा त्वं इति स्माह च माधवः।<br>एवमुक्तं तमो नाशं तत्क्षणाच्च जगाम वै॥ १४९ | आना और इस समय राजाको तथा इन मुनिवरोंको छोड़कर चले जाओ—उन माधवने [उस अन्धकारसे] ऐसा कहा। भगवान्‌के ऐसा कहनेपर वह अन्धकार उसी क्षण नष्ट हो गया और निवारित किया गया वह विष्णुचक्र पूर्वकी भाँति व्यवस्थित हो गया॥ १४२-१४९१/२ ॥ | | निवारितं हरेश्चक्रं यथापूर्वमतिष्ठत।<br>मुनिश्रेष्ठौ भयान्मुक्तौ प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ १५०<br><br>निर्गतौ शोकसन्तप्तौ ऊचतुस्तौ परस्परम्।<br>अद्यप्रभृति देहान्तमावां कन्यापरिग्रहम्॥ १५१<br><br>न करिष्याव इत्युक्त्वा प्रतिज्ञाय च तावृषी।<br>योगध्यानपरौ शुद्धौ यथापूर्वं व्यवस्थितौ॥ १५२ | वे मुनिश्रेष्ठ भयसे मुक्त हो गये और जनार्दनको प्रणाम करके वहाँसे निकल गये। शोकसन्तप्त वे दोनों मुनि आपसमें कहने लगे कि आजसे मृत्युपर्यन्त हम दोनों कन्यापरिग्रह (विवाह) नहीं करेंगे। ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे दोनों ऋषि पूर्वकी भाँति योगध्यानपरायण तथा शुद्धविचारवाले हो गये॥ १५०-१५२॥ | | अम्बरीषश्च राजासौ परिपाल्य च मेदिनीम्।<br>सभृत्यज्ञातिसम्पन्नो विष्णुलोकं जगाम वै॥ १५३ | राजा अम्बरीष भी भलीभाँति पृथ्वीका पालन करके अपने सेवकों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित विष्णुलोक चले गये॥ १५३॥ | | मानार्थमम्बरीषस्य तथैव मुनिसिंहयोः।<br>रामो दाशरथिर्भूत्वा नात्मवेदीश्वरोऽभवत्॥ १५४ | भगवान् विष्णु भी अम्बरीषके मानके लिये तथा दोनों मुनिश्रेष्ठोंके वचनकी रक्षाके लिये दशरथ-पुत्र राम हुए और वे प्रभु अपने स्वरूपको नहीं जान सके॥ १५४॥ | | मुनयश्च तथा सर्वे भृग्वाद्या मुनिसत्तमाः।<br>माया न कार्या विद्वद्भिरित्याहुः प्रेक्ष्य तं हरिम्॥ १५५ | उन श्रीहरिको देखकर सभी मुनिगण, भृगु आदि मुनिश्रेष्ठ यह कहने लगे कि विद्वानोंको माया नहीं रचनी चाहिये॥ १५५॥ | | नारदः पर्वतश्चैव चिरं ज्ञात्वा विचेष्टितम्।<br>मायां विष्णोर्विनिन्द्यैव रुद्रभक्तौ बभूवतुः॥ १५६ | नारद तथा पर्वत भी [अपने द्वारा किये गये] मूर्खतापूर्ण कार्यको दीर्घकालतक सोचकर तथा विष्णुकी मायाकी निन्दा करके रुद्रभक्त हो गये॥ १५६॥ | | एतद्वि कथितं सर्वं मया युष्माकमद्य वै।<br>अम्बरीषस्य माहात्म्यं मायावित्वं च वै हरेः॥ १५७<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वापि मानवः।<br>मायां विसृज्य पुण्यात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ १५८<br><br>इदं पवित्रं परमं पुण्यं वेदैरुदीरितम्।<br>सायं प्रातः पठेन्नित्यं विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात्॥ १५९ | [हे मुनियो!] मैंने अम्बरीषका माहात्म्य तथा श्रीहरिका मायावी होना—यह सब आपलोगोंको बता दिया। जो मनुष्य इसे पढ़ता, सुनता अथवा दूसरोंको सुनाता है वह विशुद्ध आत्मावाला होकर मायाका त्याग करके रुद्रलोकको प्राप्त होता है। जो वेदोंके द्वारा कहे गये इस परम पवित्र तथा पुण्यप्रद [आख्यान]-का प्रतिदिन प्रातः तथा सायं पाठ करता है, वह विष्णुसायुज्य प्राप्त करता है॥ १५७–१५९॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे श्रीमत्याख्यानं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'श्रीमती-आख्यान' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥