भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 606
६०४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वभक्षरता नित्यं तस्याः स्थाने समाविश।<br>मलिनास्याः स्वयं मर्त्या मलिनाम्बरधारिणः॥ ६४॥शौचाचारसे विमुख हो, देहशुद्धिसे रहित हो तथा सभी [भक्ष्याभक्ष्य] पदार्थोंके भक्षणमें तत्पर रहती हो, उसके घरमें तुम नित्य निवास करो॥ ६२-६३ १/२॥
मलदन्ता गृहस्थाश्च गृहं तेषां समाविश।<br>पादशौचविनिर्मुक्ताः सन्ध्याकाले च शायिनः॥ ६५॥जो गृहस्थ मानव स्वयं मलिन मुखवाले, गन्दे वस्त्र धारण करनेवाले तथा मलयुक्त दाँतोंवाले हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो। जो लोग अपना पैर नहीं धोते, सन्ध्याके समय शयन करते हैं और
सन्ध्यायामश्नते ये वै गृहं तेषां समाविश।<br>अत्याशनरता मर्त्या अतिपानरता नराः॥ ६६॥सन्ध्यावेलामें भोजन करते हैं, उनके घरमें तुम निवास करो। जो मूर्ख मनुष्य बहुत भोजन करते हैं, अत्यधिक पान करते हैं और जुआ-सम्बन्धी वार्ता करने तथा उसके खेलनेमें तत्पर रहते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो॥ ६४-६६ १/२॥
द्यूतवादक्रियामूढाः गृहं तेषां समाविश।<br>ब्रह्मस्वहारिणो ये चायोग्यांश्चैव यजन्ति वा॥ ६७॥जो लोग ब्राह्मणके धनका हरण करते हैं, अपात्रोंका पूजन करते हैं और शूद्रोंका अन्न खाते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो।
शूद्रान्नभोजिनो वापि गृहं तेषां समाविश।<br>मद्यपानरताः पापा मांसभक्षणतत्पराः॥ ६८॥जो मनुष्य मद्यपानमें संलग्न रहते हैं, पापपरायण हैं, मांस-भक्षणमें तत्पर रहते हैं और परायी स्त्रियोंमें आसक्त रहते हैं, उनके घरमें तुम निवास करो॥ ६७-६८ १/२॥
परदाररता मर्त्या गृहं तेषां समाविश।<br>पर्वण्यनर्चाभिरता मैथुने वा दिवा रताः॥ ६९॥जो लोग पर्वके अवसरपर भगवान्‌की पूजामें संलग्न नहीं रहते, दिनमें तथा सन्ध्याके समय मैथुन करते हैं, उनके घरमें तुम निवास करो।
सन्ध्यायां मैथुनं येषां गृहं तेषां समाविश।<br>पृष्ठतो मैथुनं येषां श्वानवत् मृगवच्च वा॥ ७०॥जो लोग कुत्ते तथा मृगकी भाँति पीछेसे मैथुन करते हैं और जलमें मैथुन करते हैं, उनके यहाँ अपनी भार्यासहित तुम निवास करो।
जले वा मैथुनं कुर्यात्सभार्यस्त्वं समाविश।<br>रजस्वलां स्त्रियं गच्छेच्चाण्डालीं वा नराधमः॥ ७१॥जो नराधम रजस्वला स्त्रीके साथ अथवा चाण्डालीके साथ अथवा कन्याके साथ अथवा गोशालामें सम्भोग करता है; उसके घरमें तुम निवास करो।
कन्यां वा गोगृहे वापि गृहं तेषां समाविश।<br>बहुना किं प्रलापेन नित्यकर्मबहिष्कृताः॥ ७२॥अधिक कहनेसे क्या लाभ! जो लोग नित्यकर्मसे विमुख तथा रुद्रभक्तिसे रहित हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो।
रुद्रभक्तिविहीना ये गृहं तेषां समाविश।<br>शृङ्गादिव्यौषधैः क्षुद्रैः शेफ आलिप्य गच्छति॥ ७३॥<br><br>भगद्रावं करोत्यस्मात्सभार्यस्त्वं समाविश।कृत्रिम साधनोंसे सम्पन्न होकर जो मनुष्य स्त्रीके पास जाता है और स्त्रीसंसर्ग करता है, उसके यहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो॥ ६९-७३ १/२॥
सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा स मुनिः श्रीमान्निर्मार्ज्य नयने तदा॥ ७४॥<br><br>ब्रह्मर्षिर्ब्रह्मसङ्काशस्तत्रैवान्तर्द्धिमातनोत् ।<br>दुःसहश्च तथोक्तानि स्थानानि च समीयिवान्॥ ७५॥**सूतजी बोले—**ऐसा कहकर वे ऐश्वर्यशाली तथा ब्रह्मतुल्य ब्रह्मर्षि [मार्कण्डेय] मुनि अपने नेत्र धोकर वहींपर अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् [मार्कण्डेयऋषिके द्वारा] बताये गये स्थानों, विशेष