भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 609

अध्याय ७ ] भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रजपकी महिमामें ऐतरेय ब्राह्मणकी कथा ६०७


| नारायणं जपेन्नित्यं प्रणम्य पुरुषोत्तमम्।<br>स्वपन्नारायणं देवं गच्छन्नारायणं तथा॥ ६<br>भुञ्जन्नारायणं विप्रास्तिष्ठञ्जाग्रत्सनातनम्।<br>उन्मिषन्निमिषन् वापि नमो नारायणेति वै॥ ७<br>भोज्यं पेयं च लेह्यं च नमो नारायणेति च।<br>अभिमन्त्र्य स्पृशन्भुङ्क्ते स याति परमां गतिम्॥ ८<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति च सतां गतिम्। | जो पुण्य कर्म करनेवाला विद्वान् मन-वचन-कर्मसे पुरुषोत्तमको प्रणाम करके 'नमो नारायणाय'—इस मन्त्रका जप करता है; सोते, जागते, चलते, बैठते, भोजन करते, आँखें खोलते तथा मूँदते नारायणका स्मरण करता है; भोज्य, पेय तथा लेह्य पदार्थका स्पर्श करते हुए 'नमो नारायणाय'—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसे ग्रहण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है और सभी पापोंसे मुक्त होकर सद्गति प्राप्त करता है॥ ५–८ १/२॥ | | अलक्ष्मीश्च मया प्रोक्ता पत्नी या दुःसहस्य च॥ ९<br>नारायणपदं श्रुत्वा गच्छत्येव न संशयः।<br>या लक्ष्मीर्देवदेवस्य हरेः कृष्णस्य वल्लभा॥ १०<br>गृहे क्षेत्रे तथावासे तनौ वसति सुव्रताः। | मुनि दुःसहकी पत्नी जो मेरे द्वारा अलक्ष्मी कही गयी है, वह 'नारायण' नामको सुनते ही वहाँसे भाग जाती है; इसमें संशय नहीं है और हे सुव्रतो! देवोंके भी देव भगवान् श्रीकृष्णकी प्रिया जो लक्ष्मी हैं, वे [उस मनुष्यके] घर, क्षेत्र, आवास तथा शरीरमें वास करती हैं॥ ९–१० १/२॥ | | आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः॥ ११<br>इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा।<br>किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तस्य बहुभिर्व्रतैः॥ १२<br>नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः।<br>तस्मात्सर्वेषु कालेषु नमो नारायणेति च॥ १३<br>जपेत् स याति विप्रेन्द्रा विष्णुलोकं सबान्धवः। | सभी शास्त्रोंका सम्यक् अनुशीलन करके और बार-बार विचार करके यही एक निश्चय किया गया है कि सदा नारायणका ही ध्यान करना चाहिये। अनेक मन्त्रों तथा व्रतोंसे उस मनुष्यको क्या प्रयोजन; क्योंकि यह 'नमो नारायणाय' मन्त्र सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है। अतः हे विप्रेन्द्रो! जो सभी समय 'नमो नारायणाय' इस मन्त्रको जपता है, वह बन्धु-बान्धवोंसहित विष्णुलोकको प्राप्त होता है॥ ११–१३ १/२॥ | | अन्यच्च देवदेवस्य शृण्वन्तु मुनिसत्तमाः॥ १४<br>मन्त्रो मया पुराभ्यस्तः सर्ववेदार्थसाधकः।<br>द्वादशाक्षरसंयुक्तो द्वादशात्मा पुरातनः॥ १५<br>तस्यैवेह च माहात्म्यं सङ्क्षेपात्प्रवदामि वः। | हे मुनिश्रेष्ठो! अब आपलोग देवदेव भगवान् विष्णुके अन्य मन्त्रोंके माहात्म्यका श्रवण करें। मैंने पूर्वकालमें समस्त वेदार्थोंको सिद्ध करनेवाले, बारह वर्णोंसे युक्त, द्वादश आदित्यस्वरूप तथा सनातन मन्त्रका अभ्यास किया था; उसी मन्त्रका माहात्म्य मैं आपलोगोंको संक्षेपमें बता रहा हूँ॥ १४–१५ १/२॥ | | कश्चिद्द्विजो महाप्राज्ञस्तपस्तप्त्वा कथञ्चन॥ १६<br>पुत्रमेकं तयोत्पाद्य संस्कारैश्च यथाक्रमम्।<br>योजयित्वा यथाकालं कृतोपनयनं पुनः॥ १७<br>अध्यापयामास तदा स च नोवाच किञ्चन।<br>न जिह्वा स्पन्दते तस्य दुःखितोऽभूद् द्विजोत्तमः॥ १८ | किसी महामनीषी ब्राह्मणने तपस्या करके किसी तरह एक पुत्रको उत्पन्नकर क्रमानुसार उसके सभी संस्कार सम्पन्न किये; यथासमय उसके उपनयनके पश्चात् उस द्विजने उसे अध्ययन कराया, किन्तु वह कुछ भी नहीं |