श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय . ८ ] शिवमहामन्त्रके जपसे ब्राह्मणपुत्र दुराचारी धौन्धूमूकका शिवगणत्वको प्राप्त करना ६११
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनेनैव मुनिश्रेष्ठा धौन्धुमूकेन दुर्मदात्।<br>भुक्त्वांयां वृषलीं दृष्ट्वा स्वभार्यावहिवानिशम्॥ २२<br><br>एकशय्यासनगतो धौन्धूमूको द्विजाधमः।<br>तथा चचार दुर्बुद्धिस्त्यक्त्वा धर्मगतिं पराम्॥ २३<br><br>माध्वी पीता तया सार्धं तेन रागविवृद्धये।<br>केनापि कारणेनैव तामुद्दिश्य द्विजोत्तमाः॥ २४ | हे द्विजश्रेष्ठो! इसी [पूर्वोक्त दोष]-के कारण वह धुन्धूमूकपुत्र किसी शूद्राको देखकर मदोन्मत्त होकर अपनी भार्याके समान उसके साथ दिन-रात भोग करके [उसके पास] पड़ा रहता था। वह द्विजाधम तथा दुर्बुद्धि अपनी परम धर्मगतिका त्याग करके उसके साथ शय्यापर स्थित होकर दुराचारमें रत रहता था। वह कामोद्दीपनके लिये उसके साथ मदिरा भी पीता था॥ २२-२३१/२॥ |
| निहता सा च पापेन वृषली गतमङ्गला।<br>ततस्तस्यास्तदा तस्य भ्रातृभिर्निहतः पिता॥ २५<br><br>माता च तस्य दुर्बुद्धेर्धौन्धूमूकस्य शोभना।<br>भार्या च तस्य दुर्बुद्धेः श्यालास्ते चापि सुव्रताः॥ २६<br><br>राज्ञा क्षणादहो नष्टं कुलं तस्याश्च तस्य च।<br>गत्वासौ धौन्धूमूकश्च येन केनापि लीलया॥ २७ | हे द्विजश्रेष्ठो! किसी कारणसे उस शूद्राके साथ उसका विरोध हो गया और उस पापीने अभद्र शूद्राको मार डाला। तब उसके भाइयोंने उस धौन्धूमूकके पिताको मार डाला, इसी प्रकार उन्होंने उस दुर्बुद्धिकी माता, सुन्दर पत्नी तथा उसके सालों (पत्नीके भाइयों)-का भी वध कर दिया। हे सुव्रतो! इस प्रकार क्षणभरमें उसका कुल विनष्ट हो गया और उस शूद्राका सम्पूर्ण कुल भी राजाके द्वारा मार डाला गया॥ २४-२६१/२॥ |
| दृष्ट्वा तु तं मुनिश्रेष्ठं रुद्रजाप्यपरायणम्।<br>लब्ध्वा पाशुपतं तद्वै पुरा देवान् महेश्वरात्॥ २८<br><br>लब्ध्वा पञ्चाक्षरं चैव षडक्षरमनुत्तमम्।<br>पुनः पञ्चाक्षरं चैव जप्त्वा लक्षं पृथक्पृथक्॥ २९<br><br>व्रतं कृत्वा च विधिना दिव्यं द्वादशमासिकम्।<br>कालधर्मं गतः कल्पे पूजितश्च यमेन वै॥ ३०<br><br>उद्धृता च तथा माता पिता श्यालाश्च सुव्रताः।<br>पत्नी च सुभगा जाता सुस्मिता च पतिव्रता॥ ३१<br><br>ताभिर्विमानमारुह्य देवैः सेन्द्रैरभिष्टुतः।<br>गाणपत्यमनुप्राप्य रुद्रस्य दयितोऽभवत्॥ ३२ | तत्पश्चात् जिस किसी तरह वहाँसे निकलकर वह धौन्धूमूक पूर्वकालमें महेश्वर महादेवसे पाशुपतव्रत प्राप्त करके रुद्रजपमें तत्पर मुनिश्रेष्ठ बृहस्पति के यहाँ प्रारब्धवश पहुँचकर उनसे सर्वश्रेष्ठ पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्र ग्रहण करके और बादमें उस पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्रको पृथक्-पृथक् एक लाख बार जपकर और इस प्रकार दिव्य द्वादशमासिक व्रतको विधिपूर्वक करके अन्तमें [आयुके समाप्त होनेपर] मृत्युको प्राप्त हुआ। यमलोकमें यमराजके द्वारा वह बहुत सम्मानित किया गया। हे सुव्रतो! इस प्रकार उसने [शूद्रोंके द्वारा मारे गये] अपने माता, पिता तथा सालोंका उद्धार कर दिया और सुन्दर मुसकानवाली उसकी पतिव्रता भार्या सौभाग्यवती हो गयी। उन सभीके साथ विमानमें बैठकर [रुद्रलोक पहुँचकर] इन्द्रसहित सभी देवताओंसे स्तुत होता हुआ वह गणाध्यक्ष बनकर भगवान् रुद्रका प्रिय हो गया॥ २७-३२॥ |
| तस्मादष्टाक्षरान्मन्त्रात्तथा वै द्वादशाक्षरात्।<br>भवेत्कोटिगुणं पुण्यं नात्र कार्या विचारणा॥ ३३ | अतएव अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रोंसे यह [पंचाक्षरमन्त्र] करोड़ों गुना अधिक पुण्यप्रद होता है; |