भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १३] भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपोंका वर्णन ६२९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरीरिणां शरीरेषु कठिनं कोङ्कणादिवत्।<br>पार्थिवं तद्वपुर्ज्ञेयं शर्वतत्त्वं बुभुत्सुभिः॥ १९<br>देहे देहे तु देवेशो देहभाजां यदव्ययम्।<br>वस्तुद्रव्यात्मकं तस्य भवस्य परमात्मनः॥ २०<br>ज्ञेयं च तत्त्वविद्भिर्वै सर्ववेदार्थपारगैः।जीवोंके शरीरोंमें कोंकण आदि स्थलोंकी भाँति जो कठोर पार्थिव भाग है, उसे जिज्ञासुओंको शर्व-तत्त्व समझना चाहिये। प्राणियोंके शरीरमें जो शाश्वत द्रवरूप वस्तु है, वह उन परमात्मा भवका अंश है—ऐसा सभी वेदार्थोंके पारगामी विद्वानों तथा तत्त्वज्ञोंको जानना चाहिये॥ १९-२०१/२॥
आग्नेयः परिणामो यो विग्रहेषु शरीरिणाम्॥ २१<br>मूर्तिः पशुपतिर्ज्ञेया सा तत्त्वं वेत्तुमिच्छुभिः।<br>वायव्यः परिणामो यः शरीरेषु शरीरिणाम्॥ २२<br>बुधैरीशेति सा तस्य तनुर्ज्ञेया न संशयः।प्राणियोंके शरीरोंमें जो तेजोरूप अग्निभाग है, उसे तत्त्वज्ञानकी इच्छावालोंको पशुपतिमूर्ति जाननी चाहिये। जीवोंके शरीरोंमें जो प्राण आदि वायुरूप है, उसे विद्वानोंको उन परमेश्वरकी ईशानमूर्ति समझनी चाहिये; इसमें संशय नहीं है॥ २१-२२१/२॥
सुषिरं यच्छरीरस्थमशेषाणां शरीरिणाम्॥ २३<br>भीमस्य सा तनुर्ज्ञेया तत्त्वविज्ञानकाङ्क्षिभिः।<br>चक्षुरादिगतं तेजो यच्छरीरस्थमङ्गिनाम्॥ २४सभी जीवोंके शरीरोंमें जो छिद्ररूप [आकाश] भाग है, उसे तत्त्वविज्ञानकी आकांक्षा रखनेवालोंको भीमकी मूर्ति समझनी चाहिये। सभी प्राणियोंके शरीरोंमें चक्षु आदिमें जो सूर्यरूप तेज है, उसे परमार्थके जिज्ञासुओंको रुद्रमूर्ति जाननी चाहिये॥ २३-२४१/२॥
रुद्रस्यापि तनुर्ज्ञेया परमार्थं बुभुत्सुभिः।<br>सर्वभूतशरीरेषु मनश्चन्द्रात्मकं हि यत्॥ २५<br>महादेवस्य सा मूर्तिर्बोद्धव्या तत्त्वचिन्तकैः।<br>आत्मा यो यजमानाख्यः सर्वभूतशरीरगः॥ २६सभी प्राणियोंके शरीरोंमें चन्द्ररूप जो मन है, उसे तत्त्वचिन्तकोंको महादेवकी मूर्ति जाननी चाहिये। सभी जीवोंके शरीरोंमें यजमान नामक जो आत्मा है, उसे परमात्मज्ञानकी कामनावाले लोगोंको उग्र नामक मूर्ति जाननी चाहिये॥ २५-२६१/२॥
मूर्तिरुग्रस्य सा ज्ञेया परमात्मबुभुत्सुभिः।<br>जातानां सर्वभूतानां चतुर्दशसु योनिषु॥ २७<br>अष्टमूर्तेरनन्यत्वं वदन्ति परमर्षयः।<br>सप्तमूर्तिमयान्याहुरीशस्याङ्गानि देहिनाम्॥ २८महर्षिगण चौदहों योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले समस्त जीवोंमें अष्टमूर्तिकी अभिन्नता बताते हैं और उन्होंने प्राणियोंके शरीरोंको शिवकी सात मूर्तियोंसे समन्वित कहा है। सभी जीवोंके शरीरमें स्थित आत्मा उस शिवकी आठवीं मूर्ति है॥ २७-२८१/२॥
आत्मा तस्याष्टमी मूर्तिः सर्वभूतशरीरगा।<br>अष्टमूर्तिममुं देवं सर्वलोकात्मकं विभुम्॥ २९<br>भजस्व सर्वभावेन श्रेयः प्राप्तुं यदीच्छसि।<br>प्राणिनो यस्य कस्यापि क्रियते यद्यनुग्रहः॥ ३०<br>अष्टमूर्तेर्महेशस्य कृतमाराधनं भवेत्।<br>निग्रहश्चेत् कृतो लोके देहिनो यस्य कस्यचित्॥ ३१[हे सनत्कुमार!] यदि आप कल्याण प्राप्त करना चाहते हैं तो इन सर्वलोकस्वरूप तथा सर्वव्यापी अष्टमूर्ति भगवान् शिवकी सब प्रकारसे आराधना कीजिये। जिस किसी भी प्राणीके प्रति जो अनुग्रह किया जाता है, वह अष्टमूर्ति महेश्वरकी ही आराधना की गयी होती है। यदि लोकमें जिस किसी भी जीवको क्लेश दिया जाता है, तो वह मानो अष्टमूर्ति महेशको ही दिया गया। लोकमें यदि जिस किसी भी प्राणीका अनादर किया गया, तो वह मानो सर्वव्यापी अष्टमूर्ति