श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय २२ ] | शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन | ६६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सहस्रं वा तदर्धं वा शतमष्टोत्तरं तु वा।<br>बाष्कलं च जपेदग्रे दशांशेन च योजयेत्॥ ६६<br><br>कुण्डं च पश्चिमे कुर्याद्वर्तुलं चैव मेखलम्।<br>चतुरङ्गुलमानेन चोत्सेधाद्विस्तरादपि॥ ६७<br><br>एकहस्तप्रमाणे नित्ये नैमित्तिके तथा।<br>कृत्वाश्वत्थदलाकारं नाभिं कुण्डे दशाङ्गुलम्॥ ६८<br><br>तदर्धेन पुरस्तात्तु गजोष्ठसदृशं स्मृतम्।<br>गलमेकाङ्गुलं चैव शेषं द्विगुणविस्तरम्॥ ६९<br><br>तत्प्रमाणे कुण्डस्य त्यक्त्वा कुर्वीत मेखलाम्।<br>यत्नेन साधयित्वैव पश्चाद्धोमं च कारयेत्॥ ७० | इसके बाद एक हजार, पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार बाष्कल मन्त्रका जप करना चाहिये और पुनः दशांश हवन करना चाहिये। [हवनके लिये] मण्डलके पश्चिमकी ओर वर्तुलाकार कुण्ड बनाना चाहिये और चार अंगुल मापकी ऊँचाई तथा चौड़ाईवाली मेखला बनानी चाहिये। नित्य एवं नैमित्तिक कर्ममें एक हाथ प्रमाणका कुण्ड उत्तम होता है। कुण्डमें अश्वत्थ (पीपल)-के पत्तेके आकारकी दस अँगल परिमाणकी नाभि बनानी चाहिये; उसके आधे (पाँच अंगुल) प्रमाणवाला और हाथीके ओष्ठके सदृश आकारका कुण्डका अगला भाग (योनि) बताया गया है। एक अंगुल प्रमाणका नाल बनाना चाहिये तथा कुण्डके बाहर दो अँगल भाग छोड़कर मेखला बनानी चाहिये। इस प्रकार यत्नपूर्वक कुण्ड बनाकर ही बादमें हवन करना चाहिये॥ ६६-७०॥ |
| षष्ठेनोल्लेखनं कुर्यात्प्रोक्षयेद्वारिणा पुनः।<br>आसनं कल्पयेन्मध्ये प्रथमेन समाहितः॥ ७१<br><br>प्रभावतीं ततः शक्तिमाग्नेय्यां तु विन्यसेत्।<br>बाष्कलेनैव सम्पूज्य गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ७२<br><br>बाष्कलेनैव मन्त्रेण क्रियां प्रति यजेत्पृथक्।<br>मूलमन्त्रेण विधिना पश्चात्पूर्णाहुतिर्भवेत्॥ ७३<br><br>क्रमादेवं विधानेन सूर्याग्निजनितो भवेत्।<br>पूर्वोक्तेन विधानेन प्रागुक्तं कमलं न्यसेत्॥ ७४<br><br>मुखोपरि समभ्यर्च्य पूर्ववद्भास्करं प्रभुम्।<br>दशैवाहुतयो देया बाष्कलेन महामुने॥ ७५<br><br>अङ्गानां च तथैकैकं संहिताभिः पृथक् पुनः।<br>जयादिस्विष्टपर्यन्तमिध्मप्रक्षेपमेव च॥ ७६ | छठे मन्त्रसे उल्लेखन करना चाहिये तथा जलसे कुण्डका प्रोक्षण करना चाहिये। तदनन्तर समाहित होकर प्रथम मन्त्रसे कुण्डके मध्यमें आसन कल्पित करना चाहिये और प्रथम मन्त्रसे ही प्रभावती [नामक] शक्तिकी स्थापना करनी चाहिये। क्रमसे गन्ध, पुष्प आदिसे बाष्कलमन्त्रके द्वारा ही विधिवत् पूजन करके, बाष्कलमन्त्रसे ही प्रत्येक क्रियाका पृथक् यजन करना चाहिये। तत्पश्चात् मूलमन्त्रसे विधिपूर्वक पूर्णाहुति होनी चाहिये। क्रमशः इस विधानके द्वारा सूर्यरूपी अग्नि उत्पन्न हो, तब पहले कहे गये विधानके अनुसार अग्निमें पूर्वोक्त कमलका न्यास करना चाहिये। हे महामुने! उस कमलके मुखपर पूर्वकी भाँति प्रभु भास्करकी सम्यक् पूजा करके संहितामन्त्रोंसे एक-एक अंगोंके लिये बाष्कलमन्त्रके द्वारा पृथक्-पृथक् दस आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये॥ ७१-७५ १/२॥ |
| सामान्यं सर्वमार्गेषु पारम्पर्यक्रमेण च।<br>निवेद्य देवदेवाय भास्करायामितात्मने॥ ७७<br><br>पूजाहोमादिकं सर्वं दत्त्वार्घ्यं च प्रदक्षिणम्।<br>अङ्गैः सम्पूज्य सङ्क्षिप्य हृद्युद्वास्य नमस्य च॥ ७८ | जयाहोमसे लेकर स्विष्टकृतहोमपर्यन्त पारम्पर्य क्रमसे सभी मार्गोमें यज्ञकाष्ठका प्रक्षेप करना चाहिये। अमित आत्मावाले देवदेव भास्करको समस्त पूजा, होम आदिका समर्पण करके उन्हें अर्घ्य प्रदानकर उनकी प्रदक्षिणा करके अंगमन्त्रोंसे उनकी पूजाकर कर्मोंका |