भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण... हवन-विधानका वर्णन [ ६७५


लिङ्गार्चकश्च षण्मासान्नात्र कार्या विचारणा।<br>सप्त प्रदक्षिणाः कृत्वा दण्डवत्प्रणमेद्बुधः॥ ३८प्रभावसे शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है। केवल शिवलिङ्गकी पूजा करनेवाला छः मासमें ही शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् भक्तको चाहिये कि [पूजाके अनन्तर] सात प्रदक्षिणा करके दण्डवत् प्रणाम करे॥ ३७-३८॥
प्रदक्षिणक्रमपादेन अश्वमेधफलं शतम्।<br>तस्मात्सम्पूजयेन्नित्यं सर्वकर्मार्थसिद्धये॥ ३९प्रदक्षिणामें एक-एक पगके द्वारा सौ-सौ अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। अतः समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये सम्यक् प्रकारसे [भगवान् शिवकी] नित्य पूजा करनी चाहिये। [इस पूजनसे]
भोगार्थी भोगमाप्नोति राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात्।<br>पुत्रार्थी तनयं श्रेष्ठं रोगी रोगात्प्रमुच्यते॥ ४०भोगकी अभिलाषा रखनेवाला भोग-सुख प्राप्त करता है, राज्यकी कामना करनेवाला राज्य प्राप्त करता है, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला उत्तम पुत्र प्राप्त करता है और रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है। मनुष्य जिन-जिन मनोरथोंको सोचता है,
यान् यांश्चिन्तयते कामांस्तांस्तान् प्राप्नोति मानवः॥ ४१उन्हें प्राप्त कर लेता है॥ ३९-४१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लिङ्गार्चनविधानं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लिङ्गार्चनविधान' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥


पचीसवाँ अध्याय

शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण, अरणिमन्थन, पात्रासादन, आज्यसंस्कार, अग्निसंस्कार तथा हवन-विधानका वर्णन

शैलादिरुवाचशैलादि बोले—
शिवाग्निकार्यं वक्ष्यामि शिवेन परिभाषितम्।<br>जनयित्वाग्रतः प्राचीं शुभे देशे सुसंस्कृते॥ १[हे सनत्कुमार!] अब मैं शैव-अग्निकार्यका वर्णन करूँगा, जिसे [स्वयं] शिवजीने कहा है। सर्वप्रथम [दिक्साधनके विधानसे] पूर्व दिशाका निर्धारण करके शुभ तथा परिष्कृत भूमिपर
पूर्वाग्रमुत्तराग्रं च कुर्यात्सूत्रत्रयं शुभम्।<br>चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे कुर्यात्कुण्डानि यत्नतः॥ २पवित्र तीन सूत पूर्वाग्र तथा तीन सूत उत्तराग्र रखकर चतुष्कोणीय निर्मित की गयी भूमिमें यत्नपूर्वक कुण्ड बनाना चाहिये॥ १-२॥
नित्यहोमाग्निकुण्डं च त्रिमेखलसमायुतम्।<br>चतुस्त्रिद्व्यङ्गुलायामा मेखला हस्तमात्रतः॥ ३नित्यहोमके लिये तीन मेखलाओंसे युक्त अग्निकुण्ड होना चाहिये। तीनों मेखलाएँ एक हाथ प्रमाणकी तथा चार अँगुल, तीन अँगुल और दो अँगुल ऊँचाईकी बनानी चाहिये। कुण्ड एक हाथ प्रमाणका होना चाहिये तथा
हस्तमात्रं भवेत्कुण्डं योनिः प्रादेशमात्रतः।<br>अश्वत्थपत्रवद्योनिं मेखलोपरि कल्पयेत्॥ ४योनि प्रादेशमात्र (अँगूठे तथा तर्जनी अँगुलीके बीचकी दूरी) होनी चाहिये। मेखलाके ऊपर अश्वत्थ (पीपल)-के पत्तेके आकारकी योनि बनानी चाहिये॥ ३-४॥