भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 679

अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण···हवन-विधानका वर्णन [ ६७७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हस्ताभ्यां नासिकं पात्रमैशान्यां दिशि विन्यसेत्।<br>आज्याधिश्रयणं कुर्यात्पश्चिमोत्तरतः शुभम् ॥ १८<br><br>भस्ममिश्रांस्तथाङ्गारान् ग्राहयेत्सकलेन वै।<br>पश्चिमोत्तरतो नीत्वा तत्र चाज्यं प्रतापयेत् ॥ १९<br><br>कुशानग्नौ तु प्रज्वाल्य पर्यग्निं त्रिभिराचरेत्।<br>तान् सर्वांस्तत्र निःक्षिप्य चाग्रे चाज्यं निधापयेत् ॥ २०<br><br>अङ्गुष्ठमात्रौ तु कुशौ प्रक्षाल्य विधिनैव तु।<br>पर्यग्निं च ततः कुर्यात्तैरेव नवभिः पुनः ॥ २१<br><br>पर्यग्निं च पुनः कुर्यात्तदाज्यमवरोपयेत्।<br>अथापकर्षयेत्पात्रं क्रमेणोत्तरपश्चिमे ॥ २२चाहिये। हे सुव्रत! इसके बाद जलमें रखी अन्य कुशाओंके द्वारा उसे भलीभाँति आच्छादित करके दोनों हाथोंसे नासिकापर्यन्त उस पात्रको उठाकर ईशान दिशामें स्थापित कर देना चाहिये॥ १५-१७॥<br><br>तत्पश्चात् वायव्य कोणमें शुभ आज्याश्रयण (घृतस्थापन) करना चाहिये। भस्मयुक्त अंगारोंको लेना चाहिये और उसे वायव्य दिशामें रखकर उसके ऊपर घृतको तपाना चाहिये। तदनन्तर कुशोंको अग्निमें प्रज्वलित करके तीन कुशोंसे पर्यग्निकरण करना चाहिये। फिर उन सभी कुशोंको उस कुण्डमें डालकर घृतको अपने सम्मुख रख लेना चाहिये। इसके बाद अँगुष्ठप्रमाणके दो कुशोंको विधिवत् प्रक्षालित करके उन कुशोंसे तथा अन्य नौ कुशोंसे पर्यग्नि करनी चाहिये, इसके बाद फिर पर्यग्नि करनी चाहिये। तदनन्तर घृतको अग्निपरसे उतार लेना चाहिये और घृतपात्रको क्रमसे उत्तर-पश्चिम दिशामें रख देना चाहिये॥ १८-२२॥
संयुज्य चाग्निं काष्ठेन प्रक्षाल्यारोप्य पश्चिमे।<br>आज्यस्योत्पवनं कुर्यात्पवित्राभ्यां सहैव तु ॥ २३<br><br>पृथगादाय हस्ताभ्यां प्रवाहेण यथाक्रमम्।<br>अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु उभाभ्यां मूलविद्यया ॥ २४<br><br>अभ्युक्ष्य दापयेदग्नौ पवित्रे घृतपङ्किते।तदनन्तर उपवेषणकाष्ठद्वारा अग्निका संयोजन करके पश्चिम दिशामें रखकर उसे प्रक्षालित करके दोनों हाथोंकी अँगुष्ठ और अनामिका अँगुलियोंद्वारा याज्ञिकोक्त पद्धतिके अनुसार दो पवित्रियोंको ग्रहण करके मूलमन्त्रके द्वारा आज्योत्पवन करना चाहिये। उसके बाद घृतसे भीगी हुई दोनों पवित्रियोंका अभ्युक्षण करके उन्हें अग्निमें डाल देना चाहिये॥ २३-२४ १/२॥
सौवर्णं स्रुक्स्रुवं कुर्याद्रत्निमात्रेण सुव्रत ॥ २५<br><br>राजतं वा यथान्यायं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>अथवा याज्ञिकैर्वृक्षैः कर्तव्यौ स्रुक्स्रुवावुभौ ॥ २६हे सुव्रत! सोने अथवा चाँदीका स्रुक्-स्रुव बनाना चाहिये, जो एक हाथ लम्बा हो तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न हो अथवा यज्ञीय वृक्षोंसे ही स्रुक्-स्रुवाका निर्माण करना चाहिये॥ २५-२६॥
अरत्निमात्रमायामं तत्पोत्रे तु बिलं भवेत्।<br>षडङ्गुलपरीणाहं दण्डमूलं महामुने ॥ २७<br><br>तदर्धं कण्ठनालं स्यात्पुष्करं मूलवद्भवेत्।<br>गोबालसदृशं दण्डं स्रुवाग्रं नासिकासमम् ॥ २८<br><br>पुटद्वयसमायुक्तं मुक्ताद्येन प्रपूरितम्।स्रुव एक हाथ प्रमाणका और उसके मुखपर गहरा गर्त होना चाहिये। हे महामुने! उस स्रुवका दण्डमूल छः अँगल चौड़ा और कण्ठनाल तीन अँगल चौड़ा होना चाहिये। उसका मुख भी मूलकी भाँति बनाना चाहिये। स्रुवका दण्ड गायकी पूँछके सदृश ऊपर मोटा और क्रमशः नीचेकी ओर पतला होना चाहिये; उसका अग्रभाग नासिकाके समान दो पुटोंसे युक्त तथा मुक्ता आदिसे समन्वित होना चाहिये॥ २७-२८ १/२॥
षट्त्रिंशदङ्गुलायाममष्टाङ्गुलसविस्तरम् ॥ २९