श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४८ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
शास्त्रों में तो बहुत सी बातें हैं, परन्तु यदि ईश्वर के दर्शन न हुए – उनके चरणकमलों में भक्ति न हुई – चित्त शुद्ध न हुआ तो सब वृथा है। पंचांग में लिखा है, वर्षा बीस बिस्वे की होगी, परन्तु पंचांग दबाने से कहीं एक बूँद भी पानी नहीं गिरता। एक बूँद गिरे, सो भी नहीं।
“शास्त्रादि लेकर विचार कब तक के लिए हैं? – जब तक ईश्वर के दर्शन न हों। भौंरा कब तक गुँजार करता है? – जब तक वह फूल पर बैठता नहीं। फूल पर बैठकर जब वह मधु पीने लगता है, तब फिर गुनगुनाता नहीं।
“परन्तु एक बात है, ईश्वर के दर्शनों के बाद भी बातचीत हो सकती है; वह बात ईश्वर के ही आनन्द की बात होगी – जैसे मतवाले का ‘जय देवी’ बोलना, और भौंरा फूल पर बैठकर जैसे अर्धस्फुट शब्दों में गुंजार करता है।
“ज्ञानी ‘नेति-नेति’ विचार करता है। इस तरह विचार करते हुए जहाँ उसे आनन्द की प्राप्ति होती है, वही ब्रह्म है।
“ज्ञानी का स्वभाव कैसा है, जानते हो? ज्ञानी कानून के अनुसार चलता है।
“मुझे चानक ले गये थे। वहाँ मैंने कई साधुओं को देखा। उनमें कोई कोई कपड़ा सी रहे थे। (सब हँसते हैं।) मेरे जाने पर वह सब अलग रख दिया। फिर पैर पर पैर चढ़ाकर मुझसे बातचीत करने लगे। (सब हँसते हैं।)
“परन्तु ईश्वर की बात बिना पूछे ज्ञानी उस सम्बन्ध में खुद कुछ नहीं बोलते। पहले वे पूछेंगे, इस समय कैसे हो? – घरवाले अब कैसे हैं?
“परन्तु विज्ञानी का स्वभाव और ही है। उसके स्वभाव में ढिलाई रहती है। कभी देखा, धोती कहीं, खुली हुई है। कभी बगल में दबी है – बच्चे की तरह।
“ईश्वर हैं, यह जिसने जान लिया है, वह ज्ञानी है। लकड़ी में अवश्य ही आग है, यह जिसने जाना है, वह ज्ञानी है; परन्तु लकड़ी जलाकर भोजन पकाना, भरपेट खाना, यह जिसे आता है वह विज्ञानी है।
“विज्ञानी के आठों पाश खुल जाते हैं। उनमें कामक्रोधादि का आकार मात्र रह जाता है।”
पण्डितजी – “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्व संशयाः।”
श्रीरामकृष्ण – हाँ, एक जहाज समुद्र में जा रहा था। एकाएक उसके कल-पुर्जे, लोहा-लक्कड़ खुलने लगे। पास ही एक चुम्बक का पहाड़ था। इसीलिए लोहा सब अलग होकर निकला जा रहा था। मैं कृष्णकिशोर के घर जाता था। एक दिन गया तो उसने कहा, तुम पान क्यों खाते हो? मैंने कहा, ‘मेरी इच्छा। मैं पान खाऊँगा, शीशे में मुँह देखूँगा, हजार औरतों के बीच में नंगा होकर नाचूँगा।’ कृष्णकिशोर की स्त्री उसे डाँटने लगी। कहा, ‘तुम किसे यह सब कह रहे हो? – रामकृष्ण को?’