सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ / सुदामा-चरित भूमि कठोर पै रात कटै, कहं कोमल सेज पै नींद न आवत । कै जुरतो नहिं कोदों सवाँ, प्रभु के परताप तें दाख न भावत ॥" 'सुदामा-चरित' में कवि वितर्क, भ्रम, भय आदि संचारी भावों की व्यवस्था करके निश्चय ही अद्भुत-रस की सफल व्यंजना करता है किन्तु यह अद्भुत- रस भक्ति-रस पर अवलम्बित है और अन्त में उसी का अंग बन जाता है । सुदामा को घोर दारिद्र्य से छुटकारा दिलाने तथा अपार धन-वैभव को प्राप्त कराने का श्रेय श्रीकृष्ण की भक्त वत्सलता को ही देना समीचीन है । श्रीकृष्ण करुणानिधान दीनदयाल, भक्त-वत्सल अन्तर्यामी तथा पतित-पावन हैं । दुखियों के दुख को दूर करके उन्हें सुख-शान्ति प्रदान करना ही उनका मुख्य कार्य है । उन्हीं की कृपा से सुदामा का भी उद्धार होता है । फलतः विस्मय-रस का रसा- स्वादन करते-करते पाठक भक्ति-रस में आत्म-विभोर हो जाता है और उसी को इस रचना का अंगीरस माना जा सकता है । 'सुदामा-चरित' की भक्ति-भावना परम्परा से कुछ पृथक् दृष्टिगत होती है। कवि श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप की अपेक्षा मित्रवत्सलता के रूप को अधिक प्रश्रय देता है। श्रीकृष्ण सुदामा का उद्धार अपने भक्त के नाते नहीं वरन् बाल- सखा के रूप में करते हैं। वे मैत्री के उच्च आदर्श को स्थापित करने के लिए अपना सर्वस्व उसे सौंप देना चाहते हैं। उनकी इस आदर्श-मैत्री का निरूपण ही कवि का प्रमुख अभीष्ट लगता है। काव्य-शास्त्र की दृष्टि से मित्रवत्सलता के भाव को चाहे किसी रूप में परिणत न किया जा सके किन्तु 'सुदाम-चरित' में वह पूर्णतः व्याप्त है । कृष्ण-काव्य-परम्परा और सुदामा-चरित कृष्ण-भक्ति-काव्य में श्रीकृष्ण के लोकरंजन रूप को ही अधिक प्रश्रय दिया गया है । उनके लोक रक्षक रूप को बहुत थोड़े कवियों ने प्रस्तुत किया है । मध्यकालीन कवियों ने उनके बाल-रूप तथा तरुण रूप की मनमोहक लीलाओं को अपने ही काव्य का विषय बनाया। उनके महिमामय विराट व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं को प्रायः छोड़ दिया या उसका सांकेतिक वर्णन कर देना ही पर्याप्त