भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ७ काहू सौं न रोष तोष काहू सौं न राग दोष, काहू सौं न वैरभाव काहू की न घात है । काहू सो न बकवाद काहू सो नही विवाद काहू सौं न संग न तौ कोऊ पक्षपात है ॥ काहू सौं न दुष्ट वैन काहू सौं न लैन देन, ब्रह्म कौ विचार कछू और न मुहात है । सुन्दर कहत सोई ईशनि कौ महा ईश, सोई गुरुदेव जाकै दूसरी न बात है ॥१३॥ लोह कौ ज्यौं पारस पखान हू पलटि लेत, कंचन छुवत होइ जग मै प्रमानिये । द्रुम कौ ज्यौं चंदन हू पलटि लगाइ वास, आपु कै समान ता मै शीतलता आनिये ॥ कीट को ज्यौं भृङ्ग हू पलटि कै करत भृङ्ग, सोई उडि जाइ ताकौ अचरिज मानिये । सुन्दर कहत यह सगर प्रसिद्ध बात, सद्य शिष्य पलटै सु सत्यगुरु जानिये ॥१४॥ गुरु बिन ज्ञान नाहि गुरु बिन ध्यान नाहि, गुरु बिन आतम-बिचार न लहतु है । (१४) पारस पख न-पारसमणि । द्रुम-साधारण वृक्ष । भृङ्ग-भोरा । सद्य तत्काल । पलटे-जीव से शिव बनादे ।

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