भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ७ काहू सौं न रोष तोष काहू सौं न राग दोष, काहू सौं न वैरभाव काहू की न घात है । काहू सो न बकवाद काहू सो नही विवाद काहू सौं न संग न तौ कोऊ पक्षपात है ॥ काहू सौं न दुष्ट वैन काहू सौं न लैन देन, ब्रह्म कौ विचार कछू और न मुहात है । सुन्दर कहत सोई ईशनि कौ महा ईश, सोई गुरुदेव जाकै दूसरी न बात है ॥१३॥ लोह कौ ज्यौं पारस पखान हू पलटि लेत, कंचन छुवत होइ जग मै प्रमानिये । द्रुम कौ ज्यौं चंदन हू पलटि लगाइ वास, आपु कै समान ता मै शीतलता आनिये ॥ कीट को ज्यौं भृङ्ग हू पलटि कै करत भृङ्ग, सोई उडि जाइ ताकौ अचरिज मानिये । सुन्दर कहत यह सगर प्रसिद्ध बात, सद्य शिष्य पलटै सु सत्यगुरु जानिये ॥१४॥ गुरु बिन ज्ञान नाहि गुरु बिन ध्यान नाहि, गुरु बिन आतम-बिचार न लहतु है । (१४) पारस पख न-पारसमणि । द्रुम-साधारण वृक्ष । भृङ्ग-भोरा । सद्य तत्काल । पलटे-जीव से शिव बनादे ।

८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ गुरु विन प्रेम नाहि गुरु विन प्रीति नांहि, गुरु विन शील ह सन्तोष न गहतु है ॥ गुरु विन प्यास नाहि बुधि कौ प्रकाश नाहि, भ्रम हू कौ नाश नाहि संशय रहतु है । गुरु विन वाट नाहि कोटा विन हाट नाहि, सुन्दर प्रगट लोक वेद याँ कहतु है ॥१५॥ पढ़े के न बैठै पास ग्रन्थिर न वाचि सकै, विन ही पढ़े तें कैसे आवत है फारसी । जौहरी के मिलै विन परख न जानै कोउ, हाथ नग लिये फिरै मगै नहिं टारसी ॥ वैद हू मिल्यौ न कोऊ बूटी की बताइ देत, भेद विनु पाये वाकै औषध है क्षारसी । सुन्दर कहत मुख रच हू न देख्यो जाइ, गुरु विन ज्ञान ज्यौ अंधेरे माहि आरसी ॥१६॥ गुरु के प्रसाद बुधि उत्तम दशा कौ ग्रहै, गुरु के प्रसाद भव दुख बिसराइये । गुरु के प्रसाद प्रेम प्रीति हू अधिक बढै, गुरु के प्रसाद राम नाम गुन गाइये ॥ गुरु के प्रसाद सब जोग की जुगति जानै, (१५) प्यास आत्मजिज्ञासा । कोडा-धन (१६) वैद-वैद्य, औषध विशेषज्ञ । क्षार सी-राख के बराबर ।

॥ गुरुदेव को अग ॥ [ ९ गुरु के प्रसाद शून्य मैं समाधि लागे । सुन्दर कहत गुरुदेव जो कृपालु होहि, तिनके प्रसाद तत्व ज्ञान पुनि पाइये ॥१७॥ बूडत भी सागर मैं आडके बंधावै धीर, पारऊ लगाइ देत नाय कों ज्या खेवसी । पर उपकारी सब जीवनि के सारै काज, कबहू न आवै जाके गुननि कौ छेव सौ ॥ बचन सुनाइ भय भ्रम सब दूरि करै, सुन्दर दिखाइ देत अनप अभेव सौ । और हू सनेही हम नीके करि देखे सोधि, जग में न कोऊ हितकारी गुरुदेव सौ ॥१८॥ गुरु तात गुरु मात गुरु बंधु निज गात, गुरुदेव सब सिष्य सकल सवाऱ्यो है । गुरु दिये दिव्य नैन गुरु दिये मुख वैन, गुरुदेव श्रवन दे सब्द हू उचाऱ्यो है ॥ गुरु दिये हाथ पाव गुरु दियो सीस भाव, (१७) प्रसाद-कृपा । उत्तम दशा-शुद्ध अवस्था । भवदुख-संसार के दुख । शून्य मे-निरंजन निराकार ब्रह्म मे । (१८) बूडत-डूबते हुओ को । भी-भव । खेव सौ-खेने वाला । छेवै-पार । सोधि-परीक्षा करके ।

१० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ गुरुदेव पिंड माहि प्राण आइ डार्यो है । सुन्दर कहत गुरुदेव जू कृपालु होइ, फेरि घाट घरि करि मोहि निसतार्यो है ॥१९॥ कोऊ देत पुत्र धन कोऊ दल बल धन, कोऊ देत राज साज देव रिषि मुन्यौ है । कोऊ देत जस मान कोऊ देत रस आन, कोऊ देत विद्या ज्ञान जगत मे गुन्यो है ॥ कोऊ देत रिधि सिधि कोऊ देत नव निधि, कोऊ देत और कछु तातै सीस धुन्यौ है । सुन्दर कहत एक दियौ जिन राम नाम, गुरु सौ उदार कोऊ देख्यो है न सुन्यौ है ॥२०॥ भूमि हू की रेणु की तौ स ख्या कोऊ कहत है, भार हू अठारा द्रुम तिनके जो पात है । मेघन की स ख्या सोऊ रिषिन कही विचार, बू दन की स ख्या तेऊ आइकै बिलात है ॥ तारन की स ख्या सोऊ कही है पुरान माहि, रोमन की स ख्या पुनि जितनेक गात है । सुन्दर जहा लौ जत सबही को आवै अंत, गुरु के अनत गुन कापै कहे जात है ॥२१॥ (१६) गात-शरीर । (२१) रेणु-धल के कण । जन्त-जन्तु, जीव ।

॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ११ गोविंद के कीये जीव जात है रसताल कौ, गुरु उपदेशे सो तो छूटै जम फद त । गोविंद के कीये जीव बस परे कर्मन के, गुरु के निवाजे सो फिरत है स्वच्छंद तै ॥ गोविंद के कीये जीव बूडत भौसागर मे, सुन्दर कहत गुरु काढै दुख द्वंद तै । और हू कहा लौ कछु मुख तै कहै बनाइ, गुरु की तौ महिमा अधिक है गोविंद तै ॥२२॥ चिंतामनि पारस कलपतरु कामधेनु, और हू अनेक निधि वारि वारि नाषिये । जोई कछु देखिये सो सकल विनाशवत, बुद्धि मै विचार करि बहु अभिलाषिये ॥ तातै अव मन वच क्रम करि कर जोरि, सुन्दर कहत सीस मेलि दीन भापिये । बहुत प्रकार तीनो लोक सब मोधे हम, ऐसी कौन भेट गुरुदेव आगे राखिए ॥२३॥ महादेव वामदेव रिषभ कपिलदेव, व्यासदेव शुकदेव जयदेव नामदेव जू । रामानन्द मुग्धानंद कट्टिय अनतानंद, (२२) रसातल-पाताललोक । जमफंद-यम की फाँसी । (२३) मन वच क्रम-मन वाणी कर्म । मोधे-खोज लिये ।

१२ ] ।। सुन्दर विलास ।। सुरेसुरानद हू कै आनद अच्छेव जू ॥ रैदास कबीरदास मोभादास पीपादास, धनादास हू कै दासभाव ही की टेव जू । सुन्दर सकल सत प्रगट जगत मांहि, तै से गुरु दादूदेव लागे हरि सेव जू ॥२४॥ गुरुदेव सर्वोपरि अधिक विराजमान, गुरुदेव सब ही तै अधिक गरिष्ठ है । गुरुदेव दत्तात्रेय नारद शुकादि मुनि, गुरुदेव ज्ञानघन प्रगट वसिष्ठ हैं ॥ गुरुदेव परम आनदमय देखियत, गुरुदेव वर वरीयान हू वरिष्ठ है । सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ, ऐसे गुरुदेव दादू मेरे सिर इष्ट है ॥२५॥ जोगी जैन जंगम सन्यासी वनवासी बौद्ध, और कोऊ भेष पक्ष सब भ्रम भान्यो है । तापस रिषीसुर मुनीसुर कवीसुर ऊ, : सबन को मत देखि तत पहिचान्यो है ॥ वेदसार तंत्रसार स्मृति रु पुरान सार, ग्रन्थन को सार सोई हृदै माँहि आन्यो है, (२५) गरिष्ठ-महान् । वरिष्ठ-श्रेष्ठ । इष्ट-आराध्य देव । सिर-सर्वोपरि ।

॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ | १३ सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ, ऐसे गुरुदेव दादू मेरे मन मान्यो है ॥२६॥ जीते हैं जु काम क्रोध लोभ मोह दूरि किए, और सब गुननि को मद जिन भान्यो है । उपजै न ताप कोऊ सीतल सुभाव जाको, सबही में समता संतोप उर आन्यो है ॥ काहू सों न राग दोप देत सबही कौ पोष, जीवत ही पायौ मोक्ष एक ब्रह्म जान्यो है । सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ, ऐसो गुरुदेव दादू मेरे मन मान्यो है ॥२७॥ ॥ इति श्री गुरुदेव कौ अंग सम्पूर्ण ॥

(२६) तत-तत्त्व । रिषीसुर-ऋषीश्वर । मुनीसुर- मुनीश्वर । कवीसूर-कवीश्वर । (२७) भान्यो है-दूर कर दिया । दोप-द्वेष । मोक्ष । पोष-पोषण ।

१४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ उपदेश चितावनी को अग ॥२॥ हमाल छंद तो सही चतुर तू जान परवीन अति, परै जनि पिंजरै मोह कूंवा । पाइ उत्तम जनम लाइ लै चपल मत, गाड गोविंद गुन जीति जूवा ॥ आपु ही आपु अज्ञान नलनी बध्यौ, विना प्रभु विमुख कै वार मूवा । दास सुन्दर कहै परम पद तौ लहै, राम हरि राम हरि बोल सूवा ॥१॥ नप्स शतान कौ आपुनौ कैद करि, क्या दुनी मै पर्या खाइ गोता । है गुनहगार भी गुनह ही करत है, खाइगा मार तब फिरै रोता ॥ जिन तुझै खाक सौ अजब पैदा किया, तू उस्से क्यों फरामोस होता । दास सुन्दर कहै सरम तब ही रहै, हक्क तू हक्क तू बोल तोता ॥२॥ (१) परवीन-प्रवीण । अज्ञान नलनी-अज्ञानकी नाली, जैसा कि तोता नाली के द्वारा पकड़ा जाता है । (२) नप्स मन । उस्से-उसमे । फरामोस-विमुख ।

॥ उपदेश चितावनी को अङ्ग ॥ [ ६५ आब की बूंद औजूद पैदा किया, नैन तन मानिषा रंगि सजूती । ख्याल मैला भये उरी लीये फिरै, जानि कै दोप बग करै सूती ॥ भूलि उस खसम को काम नै क्या किया, बेगिले यादि करि मति निपूती । दास सुन्दर कहै गर्व गुल नौ रहे भी तुही ना तुही बोल नूती ॥३॥ श्रवन उस्ताद के कद्म की खाक हौ, दिग्म दुयजार सब छाडि फैना । यार दिलदार दिल माहिं तू याद कर, है तुझी पास तू देखि नैना ॥ जान का जान है, जिद का जिद है, सपुन का सपुन कछु समझि सैना । दास सुन्दर कहै मकान घट मै रहै, एक तू एक तू बोलि मैना ॥४॥ मनहर छन्द कान के गए तै कहा कान ऐसो होत मूढ, नैन के गये तै कहा नैन ऐसे पाइ है । (३) आब-पानी । औजूद-अद्भूत शरीर । करि सजूती- लगाकर । ख्याल-विचार । खसम-स्वामी परमेश्वर ।

१६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ नासिका गये तै कहा नासिका सुगन्ध लेत, मुख के गये तै कहा मुख ऐसै गाइ है ॥ हाथ के गये तै कहा हाथ ऐसौ काम होत, पाव के गये तै ऐसै पाव कत धाइ है । याहि तै बिचारि देखि सुन्दर कहत तोहि, देह के गये तै ऐसी देह नही आई है ॥५॥ बार बार कह्यौ तोहि सावधान क्यौ न होहि, ममता की पोट सिर काहे कौं धरतु है । मेरो धन मेरो धाम मेरे सुत मेरी बाम, मेरो पशु मेरो ग्राम भूलौ यौ फिरतु है ॥ तौ भयौ बावरौ बिकाई गई बुद्धि तेरी, ऐसौ अन्धकूप गृह तामै तू परतु है । सुन्दर कहत तोहि नैक हू न आवै लाज, काज कौ बिगारि कै अकाज क्यौ करतु है ॥६॥ (४) अबल उस्ताद-आदि जगद्गुरु । कदम की खाक- पैरो की धूल । हिरस बुगुजार-कामना छोड । फैना-छल कपट । जान का जान-प्रणो का प्राण । जिंद का जिंद- जीवन का जीवन । सखुन का सखुन-सब सारो सार । (६) बाम-वामागना, स्त्री । नेक-थोडी सी भी । काज- कार्य । अकाज-अकार्य ।

१. अंग १-५: गुरु-देव अंग, विरह अंग, ज्ञान-योग अंग व अद्वैत विचार

॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ | ९७ ने रैं तौ कुपेच पर्यो गाठि अति पूरि गई, ब्रह्मा आइ छोरै पगो तौ छूटन न जबहू । तेल सौं भिजोड करि नोलग लपेटि राखै, कूकुर की पूंछ सूधी होइ नहीं तबहू ॥ मानू देत सीप बहु कीरी की भिनत जाउ, कहत कहत दिन बीत गयो सबहू । सुन्दर अज्ञान ऐसो छाड्यो नही अभिमान, निकसन प्रान लग देत्यो नहि कवहू ॥७॥ वालू माहि तेल नहि निकसत काहू विधि, पाथर न भीजै बहु वरषन घन है । पानी के मथे तं कहु घीव नहि पाइयत, कूकस कें कूटै नहि निकसत कन है ॥ शून्य कूं मूठी भरे तै हाथ न परत कछु, ऊसर के वाहै कहा उपजत अन्न है । उपदेश औषध कवन विधि लाग ताहि, सुन्दर असाध्य रोग भयौ जाकै मन है ॥८॥ (७) कुपेच-दुर्बुद्धि । छोरे-छुटावे सुलझावे । कीरीकी- कीडी के समान । (८) घन-ब दल । कूकस-भूसा । कन-कण, अन्न के दाने । शून्य-सूना आकाश । ऊसर-खारडे की जमीन ।

१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ बैरी घर मांहि तेरे जानत सनेही मेरे, दारा सुत वित्त तेरौ पोसि पोसि खाहिंगे । और ऊ कुटुम्ब लोग लूटैं चहू ओर ही तैं, मीठी मीठी बात कहि तोसौ लपटाहिंगे ॥ सकट परैगो जब कोऊ नहि तेरौ तब, अति ही कठिन वाकी बेर उठि जाहिंगे । सुन्दर कहत तानै झूठौ ही प्रपंच यह, सुपन की नाईं सब देखत विलाहिंगे ॥९॥ वारू कै मदिर माहि बैठि रह्यौ थिर होइ, राखत है जीवने की आसा कैऊ दिन की । पल पल छीजत घटत जात घरी घरी, बिनसत वार कहा षवरि न छिनकी ॥ करत उपाइ झूठै लेन देन षान पान, मूसा इत उत फिरै ताकि रही मिनकी । सुन्दर कहत मेरी मेरो करि भूलौ शठ, चंचल चपल माया भई किन किन की ॥१०॥ अन अन्त । (९) सनेही-प्रेमी । वित्त-धन । बाकी बेर-उनके मौक़ पर । उठि जाहिंगे-मुंह फेर लेंगे । (१०) बारू-बालू मिट्टी । छिन की-क्षणभर की । मूसा-चूहा। मिनकी-बिल्ली । शठ-दुष्ट, मूर्ख ।

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ १६ श्रवनू लै जाइ करि नाद कौ लै डारै पासि, नैनवा लै जाइ करि रूप वसि कर्यौ है । नथुवा लै जाइ करि बहुत सुंघावै फूल, रसनू लै जाइ करि स्वाद मन हर्यौ है ॥ चरनू लै जाइ करि नारी सों सपर्श करै, सुन्दर कोऊक साध ठगन तें डर्यौ है । काम ठग क्रोध ठग लोभ ठग मोह ठग, ठगन की नगरी मैं जीव आइ पर्यौ है ॥११॥ पायौ है मनुष देह औसर बन्यौ है आइ, ऐसी देह बार बार कहौ कहां पाइये । भूलत है बावरे ! तूं अबकै सयानौ होइ, रतन अमोल यह काहे कौ ठगाइये ॥ समुझि विचारि करि ठगन कौ संग त्यागि, ठगा बाजी देखि कहुं मन न डुलाइये । सुन्दर कहत तोहि अब सावधान होइ, हरि कौ भजन करि हरि मैं समाइये ॥१२॥ (११) पासि-पाश, फांसी बंधन । रसनू-जीभ । सपर्श-स्पर्श । वाद-सुन्दर शब्द । (१२) औसर-अवसर । सयानौ-बुद्धिमान ।

२० ] ।। सुन्दर विलास ।। घरी घरी घटत छीजत जात छिन छिन, भीजत ही गरि जात माटी कौ सौ ढेल है । मुक्ति हू कै द्वारे आइ सावधान क्यों न होई, वार वार चढत न “त्रिया कौ सौ तेल है” ॥ करि लै सुकृत हरि भजन अखड उर, याही मैं अन्तर परै यामैं ब्रह्म मेल है । मनुष जन्म पाउ जीति भावै हारि अब, सुन्दर कहत यामैं जूवा कौ सौ खेल है ॥१३॥ जोवन कौ गयौ राज और सब भयौ साज, आपुनि दुहाई फेरि दामामौ वजायौ है । लकुटी हथियार लिये नैनन की ढाल दीये, सेत वार भये ताकौ तंबू सौ तनायौ है ॥ दशन गये सु मानौ, दरवान दूरि कीये, झींगरी परी सु औरै बिछौना बिछायौ है । सीस कर कंपत सु सुन्दर निकार्यौ रिपु, देषत ही देषत बुढापौ दौरि आयौ है ॥१४॥ (१३) सुकृत-सत्कर्म । और-भेद, दूरी । भावै-चाहे । (१४) सेतवार-सफेद बाल । दशन, दात । झींगरी परी-चमड़ी सिकुड़ गई ।

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ २१ ईंदव छंद घीच तुचा कटि है लटकी, कचऊ पलटे अजहू रत वामी । दत भया मुख के उखरे, नषरे न गये सुखरौ खर कामी ॥ कपति देह सनेह सु दपति, सपति झपति है निस जामी । सुन्दर अन्त हु भौन तज्यौ, “न भज्यो भगवत सु लौन हरामी ।१५। देह घटी पग भूमि मडै नहि, औ लटिया पुनि हाथ लईजू । आंखिहु नाक परै मुख तै जल, सीस हलै कटि घीच नईजू ॥ ईश्वर कौ कबहू न सभारत, दुख परै तब त्राहि दई जू । सुन्दर तौहु बिषै सुख बछत, “घोरे गये पै बगै न गई जू” ॥१६॥ (१५) घीच-गदन । तुचा त्वचा, चमडी । कच शिर के बाल । वामी-स्त्री । रत-आसक्त । भया-भैया । सूखरे-पूरे । खर-गधा । झपति है-जपता है । निसजामी-रात दिन । भौन-भवन, शरीरका घर । लौनहरामी-नमकहरामी । (१६) बगै-पशुओ के स्थान पर उडने वाली मक्खी ।

२२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ पाइ अमोलक देह इहै नर, क्यौं न बिचार करै दिल अन्दर । कामहु क्रोधहु लोभहु मोह हु, लूटत है दस हू दिसि दुर्दर ॥ तूं अब बाछत है सुरलोक हि, कालहु पाड परै सु पुरदर । छाडि कुबुद्धि सुबुद्धि हृदै धरि, "आतमराम भजै किन सुन्दर" ॥१७॥ इन्द्रिय के सुख मानत हैं शठ, याहित तै बहुते दुख पावै । ज्यौं जल मैं झष मास हि लीलत, स्वाद बध्यो जल बाहरि आवै ॥ ज्यौं कपि मूठि न छाडत है, रसना बस वदि पर्यो बिललावै । सुन्दर बर्षा पहिलै न सभारत, "जो गुर पाट सु कान विंधावै" ॥ १८ ॥ कौन कुबुद्धि भई घट अंतर, तू अपने प्रभु सों मन चोरै । (१७) दुर्दर-द्वन्द्व । पुरंदर-इन्द्र । किन-क्यों नहीं । (१८) झष-मछली। लीलत-खाने के लिए । गुर-गुरु ।

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ २३ भूलि गयौ विषया सुख मैं गठ, लालच लागि रह्यौ अति थोरै ॥ ज्यौ कोऊ कचन छार मिलावत, लेकरि पाथर सौ नग फोरै । सुन्दर या नर देह अमोलिक, तीर लगी नवका कत वोरै ॥१६॥ देषित के नर सोभित हैं जैसे, आहि अनूपम केरि कौ खंभा । भीतर तौ कुछ सार नही पुनि, ऊपर छीलक अवर दभा ॥ बोलत है पर नाही कछू सुधि, ज्यौ बबयारि तैं बाजत कुम्भा । रूसि रहै कपि ज्यौं छिन माहिमु, याहि तै सुन्दर होत अचभा ॥२०॥ देषत के नर दीसत हैं पर, लक्षन तौ पसु के सबही है । बोलत चालत पीवत खात सु, वै घर वै बन जात सही है ॥ (१६) छार-राख । नग-हीरा मोती । कत-क्यो । वोरै-डुबाता है । (२०) केरि-केला । अवर-दभा-आडवर । बवियारि- फूंक । कुम्भा-घडा ।

२४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ प्रात गये रजनी फिर आवत, सुन्दर यौ नित भार वही है ! और तो लक्षण आइ मिलै सब, एक कमी सिर शृङ्ग नही है ॥२१॥ प्रेत भयौ कि पिशाच भयौ कि, निशाचर सौ जितही तित डोलै । तूं अपनी सुधि भूलि गयौ, मुख तै कछु और को और ई बोलै ॥ भोई उपाड करै जु मरै पचि, बधन तौ कवहू नही खोलै । सुन्दर जा तन मैं हरि पावत, सो तन नाश कियौ मति भोलै ॥२२॥ पेट ते बाहिर होत हि बालक, आड कें मात पयोधर पीनीं । मोह बढ़यौ दिन ही दिन औग, तरुन्न भयौ त्रिय के रस भीनीं ॥ पुत्र पडन बढ्यौ परिवार मु, ऐसो ही भाति गये पन तीनों । सुन्दर राम कौ नाम विसारिन्, आपुहि आपकौ वधन कीनीं ॥२३॥ (२३) पयोधर-स्तन । तरुन्न-तरुण, जवान । त्रिय- स्त्री । पडन पौत्र, पोता । पन तीनों-तीनों अवस्था ।

॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ [ २५ मात पिता सुत भाइ बध्यौ, जुवती के कहे कहा कान करे है । चोरी करै बटमारी करै किरषी बनजी कर पेट भरै है ॥ शीत सहै सिर घाम सहै, कहि सुन्दर सो रन माहि मरै है । वाध रह्यौ ममता सब सौ नर, ताहि तैं बाध्यौ ई बाँध्यो फिरै है ॥२४॥ तू ठगि कै धन और कौ ल्यावत, तेरेऊ तौ घर औरई फोरै । आगि लगै सबही जरि जाइ सु, तू दमरी दमरी कर जोरै ॥ हाकिम कौ डर नाहि न सूझत, सुन्दर एक हि वार निचोरै । तू षरचै नहिं आपु न षाइ सु, “तेरी ही चातुरी तोहि ले बोरै” ॥२५॥ (२४) जुवती-युवती । किरषी-खेती । बनजी-व्यापार । (२५) चातुरी-चतुराई ।

२६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मनहर छंद । करत प्रपंच इनि पंचनि कैं वसि पर्यौ, परदारा रत भै न आनत बुराई कौ । पर धन हर पर जीव की करत घात, मद्य मास षाइ लव लेस न भलाई कौ ॥ होइगो हिसाब तब मुषतैं न आवै ज्वाब, सुन्दर कहत लेषा लेत राई राई कौ । इहा तैं किये बिलास जम की न तोहि त्रास, उहातौ न व्है है कछु राज पोपाबाई कौ ॥२६॥ दुनिया कौ दौडता है औरति कौ लोडता है, औजूद कौ मोडता है बटोही सराइ का । मुरगी कौ मोसता है बकरी कौ रोसता है, गरीबू कौ शोसता है बेमिहर गाइ का ॥ जुलम कौ करता है धनी सौ न डरता है, दोजग कौ भरता है खजाना बलाइ का । (२६) प्रपच-जंजाल । परदारा-पराई स्त्री । भै-भय । घात-हत्या । बिलास-भोग विलास । त्रास-डर । पोपाबाई को राज-पोल का राज्य ।