सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ २१ ईंदव छंद घीच तुचा कटि है लटकी, कचऊ पलटे अजहू रत वामी । दत भया मुख के उखरे, नषरे न गये सुखरौ खर कामी ॥ कपति देह सनेह सु दपति, सपति झपति है निस जामी । सुन्दर अन्त हु भौन तज्यौ, “न भज्यो भगवत सु लौन हरामी ।१५। देह घटी पग भूमि मडै नहि, औ लटिया पुनि हाथ लईजू । आंखिहु नाक परै मुख तै जल, सीस हलै कटि घीच नईजू ॥ ईश्वर कौ कबहू न सभारत, दुख परै तब त्राहि दई जू । सुन्दर तौहु बिषै सुख बछत, “घोरे गये पै बगै न गई जू” ॥१६॥ (१५) घीच-गदन । तुचा त्वचा, चमडी । कच शिर के बाल । वामी-स्त्री । रत-आसक्त । भया-भैया । सूखरे-पूरे । खर-गधा । झपति है-जपता है । निसजामी-रात दिन । भौन-भवन, शरीरका घर । लौनहरामी-नमकहरामी । (१६) बगै-पशुओ के स्थान पर उडने वाली मक्खी ।