भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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विषयानुक्रमणिका

विषयपृष्ठ
संपूर्ण शास्त्र पढ़े हुए को भी कर्माभ्यास करना चाहिये३४
छेदन के सब भेदों को दिखाना चाहिये३४
उपसंहार३४
दशमोऽध्यायः
विशिखानुप्रवेशनीय अध्याय की व्याख्या३४
शास्त्रकर्म के लिये वैद्य को किस प्रकार घर में प्रवेश करना चाहिये३५
रोग को जानने के लै प्रकार३५
रोग विज्ञान के उपाय३५
रोगों की परीक्षा कर लेने पर साधु रोगों की चिकित्सा करनी चाहिये३६
किन व्यक्तियों में साधु रोग भी प्रायः करके अति कष्टसाध्य होते हैं३६
चिकित्सा के समय वैद्य के लिये नियम३६
एकादशोऽध्यायः ✓
क्षारपाकविधि की व्याख्या३६
शास्त्र तथा अनुशास्त्रों में क्षार ही प्रधान है३६
क्षारनियुक्ति३६
क्षार के गुण कर्म३७
क्षार के दो प्रकार३७
प्रतिसारणीय क्षार का विषय३७
पानीयक्षार३७
जिन रोगों में क्षार निषिद्ध है३७
पानीयक्षारपाक विधि३७
प्रतिसारणीय क्षारनिर्माण विधि३७
मृदु मध्यम तथा तीक्ष्ण क्षार३८
इन तीनों का व्याधि के अनुसार प्रयोग होना चाहिये३९
क्षार के गुण दोष३९
क्षारप्रतिसारण विधि३९
सम्यग दग्ध होने के लक्षण तथा उसके पश्चात् कृत्य४०
अग्न से क्षार की शान्ति के लिये प्रकार४०
सम्यक प्रकार से जलने पर४०
विषयपृष्ठ
कम जलने पर४०
अति जलने पर४०
किन के लिये क्षार कर्म उपयुक्त नहीं४०
प्रदेश विशेष से निषेध४१
साध्यरोगों में किन अवस्थाओं में क्षारकर्म सफल नहीं होता४१
द्वादशोऽध्यायः ✓
अग्निकर्म की व्याख्या४१
क्षार से अग्नि श्रेष्ठ है४१
दहन कार्य के साधन४१
शरद तथा ग्रीष्म ऋतु को छोड़४१
अग्निकर्म करना चाहिये४२
अग्निकर्म के दो प्रकार४२
स्वच्छा के जलने पर४२
शिर के रोगों तथा अधिमन्य४२
किनमें अग्निकर्म करना चाहिये४२
रोग के आश्रयभेद से अग्निकर्म चार प्रकार का है४३
अग्निकर्म में प्रवृत्ति निवृत्ति का निश्चय४३
किन पुरुषों में अग्निकर्म नहीं करना चाहिये४३
अन्य प्रकार से जले हुए व्यक्तियों के लक्षण४३
आग से जले हुये के ४ प्रकार४४
आग से जले हुये के चिकित्सा कर्म४४
धूम से पीड़ित व्यक्तियों के लक्षण४४
वमन के लिये४४
उष्णवात४४
त्रयोदशोऽध्यायः ✓
जलौकावचरणीय अध्याय की व्याख्या४५
जौक का उपयोग४५
विद्याम्य रक्त को निकालने के तीन तरीके—गाय का सींग, जौक, तथा तुम्बी कौन सा रक्त निकालने के लिये उपयुक्त है४५
जलायुका शब्द की नियुक्ति४६
जलायु के प्रकार४६
विषयुक्त जौके४७
निर्विषा जौके४७
निर्विष जलौकाओं के प्रशस्तक्षेत्र४७
विषयपृष्ठ
जौकों को क्षेत्त्र भेद से विष युक्त तथा निर्विष जौके४७
जौक को ग्रहण करने के उपाय४७
जौक को पालने के उपाय४८
यह जौके जिनका उपयोग नहीं करना चाहिये४८
जौकों को किस तरह लगाना चाहिये४८
जौक रक्त ले रही है अथवा नहीं यह जानना४८
जौक को विशुद्ध रक्त पीने न देने का उपाय४८
जौक के गिरने पर उसके रक्त को निकालने का उपाय४८
शोणितवासेचन होने पर ब्रणों को चिकित्सा४८
चतुर्दशोऽध्यायः
शोणितवर्णनीय अध्याय की व्याख्या४९
रस का वर्णन४९
रक्त तथा आर्तव की उत्पत्ति वर्णन४९
रक्त तथा आर्तव भेद४९
शोणित के स्वभाव में मतान्तररक्त पांचभौतिक है४९
शुक्र की उत्पत्ति तथा भाग४९
अन्नपान का सारभाग रस है४९
रस शब्द की निरुक्ति४९
एक धातु में रस का अवस्थानकाल५०
शरीर में रस की तीन प्रकार की गति५०
वाजीकरण औषधियों का शीघ्र शुक्र विरेचन५१
बालकों की शुक्र अदर्शन में युक्ति५१
अन्न रस का बुढ़ापे में पुष्ट न करना५२
धातुशब्दनिरुक्ति५२
विकृत शोणित का दोषभेद से लक्षण५२
शुद्ध शोणित का वर्णन५२
विद्याम्य रक्तों की व्याख्या५२
रक्तमोक्षण के अयोग्य रोगी५३
शास्त्रविद्यावण के प्रकार५३
रक्तखाव के अयोग्य हेतु५३
दुष्टरक्त के बाहर न निकलने से खाव से दोष५३