स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
प्रकाशकीय
(पंचम संस्करण)
प्रकाशकीय (पंचम संस्करण)
“स्वरोदय विज्ञान” का पंचम संस्करण प्रकाशित करते हुये श्री “पीताम्बरा-पीठ संस्कृत परिषद् प्रसन्नता का अनुभव कर रही है।
स्वर साधना अत्यन्त प्राचीन है। प्राण साधना के अन्तर्गत इसका विशेष महत्व है। पूज्यपाद स्वामी जी महाराज स्वयं स्वर साधना के अच्छे ज्ञाता रहे हैं। वे “स्वरोदय” नाम से पंचाङ्ग तैयार कराते थे जिसमें पूरे वर्ष भर होने वाले घटना-क्रम को संवत्सर की प्रतिपदा को ही लिख देते थे। स्वर सम्बन्धी साहित्य जहाँ कहीं से भी उन्हें प्राप्त हुआ इस ग्रन्थ में संकलित कर दिया है।
आशा है स्वर अध्याताओं का इससे हित होगा।
शारदीय नवरात्र 2060
तदनुसार 27 सितम्बर 2003
ओम् नारायण शास्त्री
मंत्री
श्री पीताम्बरा पीठ संस्कृत परिषद्
दतिया
दो शब्द
स्वरोदय का साधन प्राण-साधना के अन्तर्गत विशेष महात्मा रखता है। अनेक महात्मा इसके ज्ञाता हो चुके हैं; उन्होंने पुस्तकों के अन्दर इसे प्रकट किया है; जो शिव-स्वरोदय आदि नामों से विख्यात है इसके अलावा ऐसे कुछ फुटकर अनुभव भी प्राप्त हुए हैं जिनके लेखकों का पता नहीं है
प्रस्तुत पुस्तक में भी ऐसा स्वरोदय सम्बन्धी बहुत सा साहित्य संग्रहीत कर दिया गया है।
आशा है साधकों का इससे हित होगा।
अनन्त श्री विभूषित पूज्यपाद राष्ट्रगुरु श्रीस्वामीजी महाराज श्री पीताम्बरा-पीठ, दतिया (म.प्र.)
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पीताम्बरा पीठाधीश्वर अनन्त श्रीविभूषित श्री स्वामी जी महाराज, दतिया (म.प्र.)
तमी, कीति, क... (faint, illegible text)
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अनुक्रमणिका
| क्र. | विषय | पृ. सं. |
|---|
- | स्वरोदय | 1
- | स्वरों का वर्णन | 2
- | पंचतत्वों का वर्णन | 4
- | स्वर ज्ञान की रीति | 5
- | स्वरों के स्वामी, दिन और राशियाँ | 7
- | नक्षत्र | 8
- | उत्तर पश्चिम तालिका | 9
- | स्वरों में अच्छे काम करने का वर्णन : | 10 | — चन्द्र स्वर | 10 | — सूर्य स्वर | 10 | — सुषुम्णा स्वर | 11
- | स्वरों का नियमित पालन | 11
- | स्वर वर्णन नक्शा | 13
- | नक्शा—1 | 14
- | तत्व वर्णन | 15
- | नक्शा—2 | 16
- | अन्तःकरण की चार प्रवृत्तियाँ (नक्शा—3) | 17
- | पञ्च ज्ञानेन्द्रिय (नक्शा—4) | 17
- | पञ्च कर्मेन्द्रिय (नक्शा—5) | 17
- | स्वरोदय शास्त्र और आरोग्यता | 18
- | स्वर बदलने की विधि | 19
- | गर्भाधान विधि | 19
- | यात्रा | 21
- | प्रश्नोत्तर विधि | 23
- | भविष्यफल | 27
- | प्रतिदिवस तत्वोदय ज्ञान तालिका | 31
- | स्वरोदय | 32
- | फौज की लड़ाई की विधि | 35
- | नित्य उठने की विधि | 37
- | स्वर बदले की विधि | 38
| क्र. | विषय | पृ.सं. |
|---|
- | इन्द्र स्वरोदय | 39
- | चन्द्र कर्म | 40
- | सूर्य कर्म | 40
- | पक्ष विचार | 40
- | संक्रान्त को भेदु | 40
- | अथ युद्ध कीवे की विधि | 41
- | आकाश तत्व के भेद | 41
- | अथ वायु तत्व | 42
- | अथ संवत्सर को प्रश्न | 42
- | अथ स्वासन की मरजादा अथ दीपक ज्ञान स्वरोदय | 44 45
- | श्री गणपति स्तुति | 45
- | अथ नूतकं छंद | 45
- | सौरठा | 46
- | नवल छंद | 46
- | सौरठा | 47
- | नाग स्वरूपिनी छन्द | 47
- | अरिल्ल | 47
- | दोहा | 47
- | ककुभाछन्द : पार्वत्युवाच | 47
- | श्री शिव उवाच | 48
- | अथ सिष्य लक्षण | 48
- | नाडी वर्णन | 48
- | नाडी अस्थान | 49
- | नाडी देवता | 50
- | नाडी स्वर वर्णन | 50
- | तत्व वर्णत्र द्वितीय प्रकाश-स्वर कार्य वर्णन | 51 52
- | दोहा | 52
- | हरिगीतिकां छन्द | 52
- | अथ चन्द्र स्वर | 52
- | अथ रवि स्वर | 53
अनुक्रमणिका
| क्र. | विषय | पृ. सं. |
|---|
- | स्वरोदय | 1
- | स्वरों का वर्णन | 2
- | पंचतत्वों का वर्णन | 4
- | स्वर ज्ञान की रीति | 5
- | स्वरों के स्वामी, दिन और राशियाँ | 7
- | नक्षत्र | 8
- | उत्तर पश्चिम तालिका | 9
- | स्वरों में अच्छे काम करने का वर्णन : | 10 | — चन्द्र स्वर | 10 | — सूर्य स्वर | 10 | — सुषुम्णा स्वर | 11
- | स्वरों का नियमित पालन | 11
- | स्वर वर्णन नक्शा | 13
- | नक्शा—1 | 14
- | तत्व वर्णन | 15
- | नक्शा—2 | 16
- | अन्तःकरण की चार प्रवृत्तियाँ (नक्शा—3) | 17
- | पञ्च ज्ञानेन्द्रिय (नक्शा—4) | 17
- | पञ्च कर्मेन्द्रिय (नक्शा—5) | 17
- | स्वरोदय शास्त्र और आरोग्यता | 18
- | स्वर बदलने की विधि | 19
- | गर्भाधान विधि | 19
- | यात्रा | 21
- | प्रश्नोत्तर विधि | 23
- | भविष्यफल | 27
- | प्रतिदिवस तत्वोदय ज्ञान तालिका | 31
- | स्वरोदय | 32
- | फौज की लड़ाई की विधि | 35
- | नित्य उठने की विधि | 37
- | स्वर बदले की विधि | 38
| क्र. | विषय | पृ. सं. |
|---|
- | इन्द्र स्वरोदय | 39
- | चन्द्र कर्म | 40
- | सूरज कर्म | 40
- | पक्ष विचार | 40
- | संक्रान्त को भेदु | 40
- | अथ युद्ध कीवे की विधि | 41
- | आकाश तत्व के भेद | 41
- | अथ वायु तत्व | 42
- | अथ संवत्सर को प्रश्न | 42
- | अथ स्वासन की मरजादा अथ दीपक ज्ञान स्वरोदय | 44
- | श्री गणपति स्तुति | 45
- | अथ नूतकं छंद | 45
- | सोरठा | 46
- | नवल छंद | 46
- | सोरठा | 47
- | नाग स्वरूपिनी छन्द | 47
- | अरिल्ल | 47
- | दोहा | 47
- | ककुभाछन्द : पार्वत्युवाच | 47
- | श्री शिव उवाच | 48
- | अथ सिष्य लक्षणं | 48
- | नाडी वर्णन | 48
- | नाडी अस्थान | 49
- | नाडी देवता | 50
- | नाडी स्वर वर्णन | 50
- | तत्व वर्णत्र द्वितीय प्रकाश-स्वर कार्य वर्णन | 51
- | दोहा | 52
- | हरिगीतिका छन्द | 52
- | अथ चन्द्र स्वर | 52
- | अथ रवि स्वर | 53
| पृ. सं. | क्र. | विषय | पृ. सं. |
|---|---|---|---|
| 39 | 58. | अथ सुषुम्ना (उभय) स्वर | 54 |
| 40 | 59. | अथ नाडी स्वर | 54 |
| 40 | 60. | अथ लग्न विचार | 54 |
| 40 | 61. | अथ तिथि विचार | 55 |
| 40 | 62. | अथ शुभ स्वर वर्णन | 55 |
| 41 | 63. | अथ विपरीत स्वर वर्णन | 55 |
| 41 | 64. | अथ स्वर फल वर्णन | 56 |
| 42 | तृतीय प्रकाश-प्रश्न विचार | 58 | |
| 42 | 65. | अथ जुद्ध प्रश्न | 58 |
| 44 | 66. | अथ साधारण प्रश्न | 59 |
| 45 | 67. | अथ तत्व विचार | 59 |
| 45 | 68. | अथ रोगी प्रश्न | 60 |
| 45 | 69. | अथ परदेशी प्रश्न | 61 |
| 46 | 70. | अथ गर्भ प्रश्न | 62 |
| 46 | 71. | अथ मन्दस्वर प्रश्न | 63 |
| 47 | 72. | अथ जयाजय प्रश्न | 63 |
| 47 | 73. | अथ शत्रुआगम प्रश्न | 63 |
| 47 | 74. | अथ वर्षा प्रश्न | 64 |
| 47 | 75. | अथ विष प्रश्न | 65 |
| 47 | 76. | अथ कार्य प्रश्न | 66 |
| 48 | 77. | अथ रोगी प्रश्न | 66 |
| 48 | 78. | अथ गोप्य प्रश्न | 66 |
| 48 | 79. | अथ स्वरदिशा विचार | 67 |
| 49 | चतुर्थ प्रकाश-रतित्यादि विधि | 68 | |
| 50 | 80. | अथ रति विधि | 68 |
| 50 | 81. | अथ वशीकरण विधि | 68 |
| 51 | 82. | अथ डर कौ उपाय | 69 |
| 52 | 83. | अथ रोस कौ उपाइ | 70 |
| 52 | 84. | अथ जिम्या स्थंमन विधि | 70 |
| 52 | 85. | अथ उच्चाटन उथाटन विधि | 71 |
| 52 | 86. | अथ अनुग्रह विधि | 71 |
| 53 | 87. | अथ आप विधि | 72 |
| क्र. | विषय | पृ. सं. |
|---|---|---|
| पचम प्रकाश-काल ज्ञान वर्णन | 72 |
- | दोहा | 72
- | छंद भुजंग प्रयास | 72
- | अथ काल ज्ञान | 73
- | अथ काल कौ उपाइ | 75 | षष्ठम प्रकाश-योग साधना विधि | 77
- | दोहा | 77
- | चौपाई | 77
- | शिव उवाच | 78
- | पार्वत्युवाच | 79
- | श्री शिव उवाच | 79
- | अथ स्वर सिद्धि विधि | 80
- | पार्वत्युवाच | 81
- | अथ हसानन विधि | 81
- | श्री शिव उवाच | 81
- | पार्वत्युवाच | 81
- | अथ अनाहद विधि | 82
- | श्री शिव उवाच | 82
- | पार्वत्युवाच | 82
- | अथ शब्द कर्म | 82
- | श्री शिव उवाच | 83
- | पार्वत्युवाच | 83
- | श्री शिव उवाच | 83
- | पार्वत्युवाच | 83
- | अथ खेचरी कर्म | 83
- | श्री शिव उवाच | 83
- | पार्वत्युवाच | 84
- | अथ सिद्धासन विधि | 84
- | श्री शिव उवाच | 84
- | कबीरौवाच | 85
- | कुछ उपयोगी सूचनार्थ | 87
- | चिरयौवन प्राप्ति का उपाय | 91
❖❖❖
| क्र. | विषय | पृ. सं. |
|---|
- | अथ सुषुम्ना (उभय) स्वर | 54
- | अथ नाडी स्वर | 54
- | अथ लग्न विचार | 54
- | अथ तिथि विचार | 55
- | अथ शुभ स्वर वर्णन | 55
- | अथ विपरीत स्वर वर्णन | 55
- | अथ स्वर फल वर्णन | 56 | तृतीय प्रकाश-प्रश्न विचार | 58
- | अथ जुद्ध प्रश्न | 58
- | अथ साधारण प्रश्न | 59
- | अथ तत्व विचार | 59
- | अथ रोगी प्रश्न | 60
- | अथ परदेशी प्रश्न | 61
- | अथ गर्भ प्रश्न | 62
- | अथ मन्दस्वर प्रश्न | 63
- | अथ जयाजय प्रश्न | 63
- | अथ शत्रुआगम प्रश्न | 63
- | अथ वषा प्रश्न | 64
- | अथ विष प्रश्न | 65
- | अथ कार्य प्रश्न | 66
- | अथ रोगी प्रश्न | 66
- | अथ गोप्य प्रश्न | 66
- | अथ स्वरदिशा विचार | 67 | चतुर्थ प्रकाश-रतित्यादि विधि | 68
- | अथ रति विधि | 68
- | अथ वशीकरण विधि | 68
- | अथ डर कौ उपाय | 69
- | अथ रोस कौ उपाइ | 70
- | अथ जिम्या स्थंमन विधि | 70
- | अथ उच्चाटन उध्याटन विधि | 71
- | अथ अनुग्रह विधि | 71
- | अथ आप विधि | 72
| क्र. | विषय | पृ.सं. |
|---|---|---|
| पचम प्रकाश-काल ज्ञान वर्णन | 72 |
- | दोहा | 72
- | छंद भुजंग प्रयास | 72
- | अथ काल ज्ञान | 73
- | अथ काल कौ उपाइ | 75 | षष्ठम प्रकाश-योग साधना विधि | 77
- | दोहा | 77
- | चौपाई | 77
- | शिव उवाच | 78
- | पार्वत्युवाच | 79
- | श्री शिव उवाच | 79
- | अथ स्वर सिद्धि विधि | 80
- | पार्वत्युवाच | 81
- | अथ हंसानन विधि | 81
- | श्री शिव उवाच | 81
- | पार्वत्युवाच | 81
- | अथ अनाहद विधि | 82
- | श्री शिव उवाच | 82
- | पार्वत्युवाच | 82
- | अथ शब्द कर्म | 82
- | श्री शिव उवाच | 82
- | पार्वत्युवाच | 83
- | श्री शिव उवाच | 83
- | पार्वत्युवाच | 83
- | अथ खेचरी कर्म | 83
- | श्री शिव उवाच | 83
- | पार्वत्युवाच | 84
- | अथ सिद्धासन विधि | 84
- | श्री शिव उवाच | 84
- | कबीरौवाच | 85
- | कुछ उपयोगी सूचनार्थ | 87
- | चिरयौवन प्राप्ति का उपाय | 91
❖❖❖
स्वरोदय-विज्ञान
...
स्वरोदय
स्वर+उदय=स्वरोदय। स्वर के नियमपूर्वक चलाने की विद्या को स्वरोदय कहते हैं। यह अत्यन्त प्राचीन और प्रतिष्ठित विज्ञान है। संसार की विद्याओं का यह केन्द्र है। जिन प्रश्नों का बड़े-बड़े तत्त्वज्ञ और भिन्न-भिन्न धर्म यथोचित उत्तर नहीं दे सकते उनका यह शीघ्र ही समाधान कर सकता है। हिन्दू शास्त्र के अनुसार संसार पांच तत्वों से बना है, अर्थात् मूल तत्व पांच तत्वों में बँटने के पश्चात् सृष्टि की उत्पत्ति का कारण हुआ है। इनसे ही पांच तत्वों का भली-भांति ज्ञान होने से मनुष्य सृष्टि के रहस्य को समझ सकता है। श्री महादेव जी ने इस विद्या का वर्णन पार्वती से किया। जिस प्रकार हिन्दू शास्त्र के अन्तर्गत अनेक मतमतान्तरों एवं भिन्न-भिन्न विद्याओं के कर्ता महादेव जी माने गये हैं, उसी प्रकार स्वरोदय शास्त्र का प्रथम ज्ञान भी शिव-पार्वती सम्वाद के नाम से शिव-स्वरोदय में वर्णित है।
३०० वर्ष पूर्व इसके प्रख्यात ज्ञाता श्री चरणदासजी ने हिन्दी भाषा में इसको कविता का रूप प्रदान किया। कहते हैं कि श्री व्यास पुत्र शुक्रदेवजी ने स्वयं चरणदासजी को इसका ज्ञान कराया था।
इस समय यह विद्या लुप्त हो रही है। लोगों का विश्वास इससे हट रहा है। परन्तु तब भी जो लोग इससे जरा भी परिचित है। वे इसके रहस्य को खूब जानते हैं। उनकी श्रद्धा को किसी प्रकार का तर्क खण्डित नहीं कर सकता। चरणदास जी का कथन है :-
(२)
(स्वरोदय विज्ञान)
सब योगन को योग है, सब ज्ञानन को ज्ञान।
सर्व सिद्धि की सिद्धि हैं, तत्त्व सुरन कौ ध्यान।।
इस विद्या को जानने वाले तीनों काल का हाल बता सकते हैं, जो इस विद्या से खूब परिचित हैं वे अपनी मृत्यु अथवा बीमारी का हाल पहले ही मालूम कर लेते हैं। इसके अनुसार जो कार्य किया जाता है वह कभी विफल नहीं होता :-
धरनि टरै गिरिवर टरै, टरै जगत सुन भीत।
वचन स्वरोदय ना टरै, कह मुरली सुत रणजीत।
स्वरों का वर्णन
स्वर तीन हैं— दाहिना (पिङ्गल स्वर), बायां (इडा स्वर) और सुषुम्णा। इडा, पिङ्गला, सुषुम्णा—तीन नाडियों और इन्हीं के नाम से तीन प्रकार के स्वर प्रसिद्ध हैं। इडा शरीर के बायीं और फँली हुई है इसे चन्द्र—नाडी कहते हैं। पिङ्गला शरीर के दाई ओर है, इसे सूर्य नाडी कहते हैं, सुषुम्णा नाडी शरीर के बीचों—बीच है। सूर्य—चक्र इसी के आधार पर स्थित है।
श्वास कभी दाहिनी नथने से ज्यादा जोर से निकलता है, कभी बायें से, कभी दोनों नासिकाओं में बराबर निकलता है। यदि स्वर बायीं नासिका से ज्यादा आवे तो उसे इडा स्वर या चन्द्र स्वर कहते हैं। यदि श्वास दाहिनी नासिका से अधिक आवे तो उसे पिङ्गला या सूर्य स्वर कहते हैं। यदि श्वास दोनों नासिकाओं से बराबर निकलता है तो उसे सुषुम्णा स्वर कहते हैं।
इडा पिङ्गला सुषुम्णा—नाडी तीन विचार।
दाहिने बायें स्वर चले—लखें धारना धार।
इस विद्या में चन्द्रमा को अधिष्ठात्री माना गया है। सब प्रकार की
(स्वरोदय विज्ञान)
(३)
गणना यहीं से की जाती। शुक्ल पक्ष से सब कार्यारम्भ होता है।
शुक्ल पक्ष के आदि ही, तीन तिथि लग चन्द्र।
फिर सूरज फिर चन्द्र है, फिर सूरज फिर चन्द्र।
कृष्ण पक्ष के आदि में, तीन तिथि लग भान।
फिर चन्द्र फिर भान है, फिर चन्द्र फिर भान।।
शुक्ल पक्ष अर्थात् चाँदनी रात की पहली तिथि को निरोगी मनुष्य का सूर्योदय के समय चन्द्र स्वर चलता रहेगा। इसी प्रकार लगातार तीन दिन तक ऐसा रहेगा। यह दशा पाँच घड़ी तक रहती है। बाद में स्वर बदल जाता है।
कृष्ण पक्ष में लगातार तीन दिन तक अर्थात् प्रथमा, द्वितीया और तृतीया की सूर्योदय के समय सूर्य स्वर चलेगा। तीन दिन के बाद सवेरे स्वर बदल जाया करता है। नीचे के नक्शे से यह बात भलीभाँति समझ में आ जावेगी।
प्रातः काल का समय सूर्योदय से लेकर ५ घड़ी तक -
दाहिना (सूर्य)
बाँया (चन्द्र)
कृष्ण पक्ष -
१, २, ३, ७, ८, ९
१३, १४, १५
४, ५, ६, १०, ११, १२
शुक्ल पक्ष -
४, ५, ६, १०, ११, १२
१, २, ३, ७, ८, ९
१३, १४, १५
पाँच घड़ी समाप्त होने पर स्वर आप से आप बदल जाता है। यह दशा
(४)
(स्वरोदय विज्ञान)
केवल स्वस्थ मनुष्यों की होती है। यदि शरीर में कुछ गड़बड़ है तो निःसंदेह स्वर में कुछ फर्क पड़ जावेगा। यदि पक्ष के आरम्भ में लगातार तीन दिन तक स्वर उल्टा चले तो प्रायः १५ रोज तक शरीर में एक न एक नयी व्याधि सताया करती है। यदि कोई मनुष्य केवल स्वर ठीक कर सके तो कम से कम बहुत बीमार न रहेगा और यदि बीमारी रहेगी तो बहुत ज्यादा जोर न करेगी।
पंच-तत्वों का वर्णन
आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल—ये पाँच तत्व हैं। हर एक नासिका—नथने से एक स्वर पाँच घड़ी तक चलता है, फिर दूसरी नासिका—नथने से चलने लगता है। जब स्वर चलता है, तो उसमें तत्व भी एक—एक घड़ी के हिसाब से चलते हैं, सबसे पहिली घड़ी में वायु तत्व चलता है, फिर क्रमानुसार अग्नि, पृथ्वी और जल तत्व चला करते हैं। वायु तत्व इस प्रकार नहीं चलता। वह हर एक तत्व के साथ थोड़ी—थोड़ी देर चलकर अपनी एक घड़ी पाँच घड़ी में से ले लेता है, इस तरह कुल २४ घण्टों में अर्थात् ६० घड़ी में पाँच तत्व १२ बार बदलते हैं। यह तो हुई दशा अलग अलग तत्वों की, इन पाँचों तत्वों के मेल से हर एक के पाँच भाग हो जाते हैं। उदाहरण के लिए वायु तत्व कीजिये :-
प्रथम — वायु में वायु
द्वितीय — वायु में अग्नि
तीसरे — वायु में पृथ्वी
पाँचवें — वायु में आकाश
यह बात गणित से भली भाँति मालूम हो सकती है परन्तु स्वरोदय के अभ्यासी को गणित करने की कोई आवश्यकता नहीं है: क्योंकि प्रत्येक तत्व
(स्वरोदय विज्ञान)
(५)
का रंग उसको हर वक्त दीखता रहता है। प्रत्येक तत्व के रंग, स्वाद, रूप चाल आदि का नक्शा नीचे दिया जाता है :-
| नाम तत्व | रंग | स्वाद | स्वरूप | स्वभाव | चाल |
|---|---|---|---|---|---|
| आकाश | काला | कडुवा | कान के सामान | शीतल | १ अंगुल |
| अन्दरहीअं | |||||
| वायु | हरा | खट्टा | गोल | चञ्चल | ९ तिरछी |
| अग्नि | लाल | चर्परा | त्रिकोण | गरम | ४ ऊपर... |
| पृथ्वी | पीला | मीठा | चौकोर | भारी | १३ समुख |
| जल | सफेद | मीठा से | |||
| जरा कम | चन्द्राकार | शीतल | १६ नीचे |
स्वर-ज्ञान की रीति
स्वर पहचानने की साधारण रीति तो यह है कि साधक शान्तीरिति से बैठकर श्वास कहीं तक नीचे जाता है उसे नाप ले। साधारणतः तत्व मालूम हो ही जावेगा। यदि नासिका के अन्दर ही अन्दर श्वास रहे, तो आकाश तत्व जाने। ४ अंगुल बाहर आवे तो अग्नि तत्व—८ अंगुल बाहर आवे तो वायु तत्व, १२ चंगुल बाहर आवे तो पृथ्वी तत्व, १६ अंगुल बाहर आवे, तो जल तत्व समझना चाहिए।
इसकी एक दूसरी विधि भी है। एक आइना या दर्पण को साफ करके उस पर जोर से श्वास मारो ताकि दर्पण श्वास की भाप से धुंधला हो जाये, फिर देखो कि इस धुंधलेपन का क्या स्वरूप होता है।
(६)
(स्वरोदय विज्ञान)
यदि चार कोने बराबर हैं, तो पृथ्वी तत्व जानो, अर्द्ध चन्द्राकार है तो जलतत्व। यदि आकृति गोल हो तो वायु तत्व चलना जानो। यदि आकृति त्रिकोण है, तो अग्नि तत्व चलता जानो और यदि आकृति कान (कर्ण) की हो, तो आकाश तत्व चलता जानो।
पृथ्वी तत्व
(पीला रंग)
जल तत्व
(सफेद रंग)
वायु तत्व
(हरा रंग)
अग्नि तत्व
(लाल रंग)
आकाश तत्व
(काला रंग)
(स्वरोदय विज्ञान)
(७)
तत्त्व पहचानने की एक सरल विधि और भी है। पाँच गोली पाँच तत्त्वों के रंग की बनवाले। सदा उनको अपने जेब में रखें। जब कभी आपकी इच्छा यह जानने की हो कि कौन सा तत्त्व चल रहा है तो आंखें बन्द करके और मन को एकाग्र करके जेब में से एक गोली निकाल लें। बहुधा उसी रंग की गोली निकलेगी, जिस रंग का तत्त्व उस समय चल रहा होगा। यदि नेत्र बन्द कर लिये जावें तो अंधेरे में जो रंग दिखाई देता है – उसका ध्यान पूर्वक देखने से भी तत्त्व को पहचान हो सकती है। परीक्षा के लिये अपने किसी मित्र से कहे कि, कोई रंग वह अपने मन में ले ले। अब तुम यह पता लगाओ कि तुम्हारा कौन सा तत्त्व चल रहा है। जो तत्त्व चल रहा होगा वही रंग उसने अपने मन में लिया होगा। पहले पहल गलती अवश्य होगी, परन्तु अभ्यास से ठीक रंग का पता लग जावेगा। अभ्यास से यह बतलाना, कि अमुक मनुष्य ने आज क्या खाया है, मामूली बात हो जाती है।
स्वरों के स्वामी, दिन, और राशियां
स्वरों का सम्बन्ध राशि, नक्षत्र और दिन, तीनों से है। प्रश्न पूछने के समय वह बहुत काम आता है। इडा स्वर का स्वामी चन्द्रमा है – यह स्थिर है। पिङ्गला स्वर का स्वामी सूर्य है – यह चर है। सुषुम्णा चर और स्थिर दोनों स्वभाव अपने में रखता है। इडा, शीतल, पिङ्गला गर्म और सुषुम्णा सम-शीतल है। इडा का स्वामी, कई हिन्दू ग्रंथकारों ने ब्रह्मा, पिंगला का शिव और सुषुम्णा का विष्णु लिखा है। सोमवार बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार चन्द्र स्वर के दिन हैं। शनि, रवि, मंगल, – ये सूर्य स्वर के दिन हैं।
मंगल अरु इतवार दिन और शनिश्चर लीन।
शुभकारज को मिलते हैं सूरज के दिन तीन।
सोमवार शुक्कर भलौ, दिन बृहस्पति को देख।