भारतकोश
स्वप्नदोष चिकित्सा

स्वप्नदोष चिकित्सा

Swapnadosh Chikitsa

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (उद्गम)

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कुछ भयंकर भ्रम और उनका निवारण

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सन्मुख चोरी, व्यभिचार आदि पापकर्म नहीं करते, उसी प्रकार पिताओं के पिता और माताओं की माता ओ३म् है, जो सब कुछ देखता है और हमारे कर्मों का फल सुख-दुःख के रूप में देता है। उससे छुपकर हम कुछ भी नहीं कर सकते। चाहे हम उसे देख न सकें किन्तु वह बार-बार हमें सचेत करता है। जब हमारे मन में पाप की भावना आती है, वह हमें अन्दर से बार-बार टोकता है। हम यह अनुभव भी करते हैं। किन्तु उसकी चेतावनी को अनसुनी कर देते हैं। जब हम अपने सच्चे रक्षक की भी नहीं सुनते तो वह भी हमें भूलजाता है। वह किसी कुकर्मी का साथी नहीं। इसलिये उस अदृश्य शक्ति को कभी मत भूलो। सोते समय भी परमरक्षक ओ३म् का (शिवसंकल्प के छः वेदमन्त्रों द्वारा) स्मरण करते-करते सोजावो। वह स्वप्न में भी तुम्हारी रक्षा करेगा। वह स्वप्रदोष की एक अचूक औषधि है। यदि मन में उसे परमपिता परमात्मा की आज्ञा का कि “पापो नृषद्वरो जनः” आलसी मनुष्य पापी होता है, ध्यान रखो और मन व शरीर से दिनभर इतना कार्य करलो कि वह पूर्णतया थकजाये, जिससे रात्रि में इतनी गाढ़ी निद्रा आये कि मन को स्वप्न देखने का अवसर ही न मिले, तो सर्वथा स्वप्रदोष से बचजावोगे। यथार्थ स्वप्ररहित निद्रा ही तो निद्रा है। यदि हमारी नींद बीच में टूट जाती है तो हमें स्वप्न आते हैं तो यह दशा हमारे आलस्य और प्रमाद को प्रकट करती है। ब्रह्मचारी को स्वप्ररहित एक अटूट निद्रा चाहिये।

ध्यान दें

निद्रा (शयन) आदि के विषय में मेरी ‘जीवनसंदेश’ अथवा ‘ब्रह्मर्चामृत’ नाम की पुस्तिका को ध्यानपूर्वक पढ़ो। जो इससे पूर्व पृथक् प्रकाशित हो चुकी है। इसी प्रकार शौच, स्नान, व्यायाम, भोजन आदि ब्रह्मचर्य के नियमों पर पर्याप्त प्रकाश उसी पुस्तिका में डाला है। उन्हें पुनः लिखना व्यर्थ है। वहीं बार-बार पढ़ो और उनका आचरण करो। ब्रह्मचर्य के सभी नियमों का पालन किए बिना स्वप्रदोषादि रोगों से छुटकारा मिलना असम्भव है।

कुछ भयंकर भ्रम और उनका निवारण

जिन युवकों को मास में अनेक बार स्वप्रदोष हो जाता है, वे इसे दूर करने का यत्न भी करते हैं किन्तु वे जब वीर्यरक्षा में सफल नहीं होते तो यह विचार उन्हें बार-बार तङ्ग करता है कि वीर्य ने तो शरीर में रहना नहीं। इसे तो नष्ट होना ही है। फिर क्यों न इससे विषयभोग (मैथुन) व्यभिचार का आनन्द ले लिया जाये। यह बड़ा भयंकर तथा विनाशकारी भ्रम है। स्वप्न-विज्ञान के वेत्ता लिखते हैं कि बड़े से बड़ा स्वप्न पांच सैकिंड में समाप्त हो जाता है। स्वप्रदोष होते समय अधिक से अधिक पांच सैकिंड ही लगते हैं किन्तु सब प्रकार के अन्य प्राकृतिक मैथुनों वा व्यभिचार में पर्याप्त समय लगता है—यही अनुभवी लेखक लिखते हैं। निष्कर्ष यह