भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 261 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 111

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५ कुतश्चित्प्रविभज्यते तदनन्तम् । | विभक्त नहीं होता वही अनन्त हो ज्ञानकर्तृत्वे च ज्ञेयज्ञानाभ्यां | सकता है । ज्ञानकर्ता होनेपर तो प्रविभक्तमित्यनन्तता न स्यात् । | वह ज्ञेय और ज्ञानसे विभक्त होगा; “यत्र नान्यद्विजानाति स भूमा | इसलिये उसकी अनन्तता सिद्ध नहीं अथ यत्रान्यद्विजानाति तदल्पम्” | हो सकेगी । “जहाँ किसी दूसरेको ( छा० उ० ७ । २४ । १ ) इति | नहीं जानता वह भूमा है और जहाँ श्रुत्यन्तरात् । | किसी दूसरेको जानता है वह अल्प | है” इस एक दूसरी श्रुतिसे यही | सिद्ध होता है । नान्यद्विजानातीति विशेष- | इस श्रुतिमें ‘दूसरेको नहीं | जानता’ इस प्रकार विशेषका प्रतिषेधादात्मानं विजानातीति | प्रतिषेध होनेके कारण वह स्वयं | अपनेको ही जानता है-ऐसी यदि चेन्न; भूमलक्षणविधिपरत्वाद्वा- | कोई शङ्का करे तो ठीक नहीं; | क्योंकि यह वाक्य भूमाके लक्षणका क्यस्य । यत्र नान्यत्पश्यतीत्यादि | विधान करनेमें प्रवृत्त है । ‘यत्र | नान्यत्पश्यति’ इत्यादि वाक्य भूमाके भूम्नो लक्षणविधिपरं वाक्यम् । | लक्षणका विधान करनेमें तत्पर है । | अन्य अन्यको देखता है—इस लोक- यथा प्रसिद्धमेवान्योऽन्यत्पश्य- | प्रसिद्ध वस्तुस्थितिको स्वीकार कर | ‘जहाँ ऐसा नहीं है वह भूमा है’—इस तीत्येतदुपादाय यत्र तन्नास्ति | प्रकार उसके द्वारा भूमाके स्वरूपका | बोध कराया जाता है । ‘अन्य’ स भूमेति भूमस्वरूपं तत्र ज्ञाप्य- | शब्दका ग्रहण तो यथाप्राप्त द्वैतका | प्रतिषेध करनेके लिये है; अतः यह ते। अन्यग्रहणस्य प्राप्तप्रतिषेधार्थ- | वाक्य अपनेमें क्रियाका अस्तित्व | प्रतिपादन करनेके लिये नहीं है । त्वान्न स्वात्मनि क्रियास्तित्वपरं | और स्वात्मामें तो भेदका अभाव वाक्यम् । स्वात्मनि च भेदा- | होनेके कारण उसका विज्ञान होना

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri