भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९ यच्चोक्तं निरतिशयप्रीतेः स्वर्ग- शब्दवाच्यायाः कर्मनिमित्तत्वा- त्कर्मारब्ध एव मोक्ष इति, तन्न; नित्यत्वान्मोक्षस्य । न हि नित्यं किञ्चिदारभ्यते लोके यदारब्धं तदनित्यमिति । अतो न कर्मा- रब्धो मोक्षः । विद्यासहितानां कर्मणां नि- त्यारम्भसामर्थ्यमिति चेत् ? न; विरोधात् । नित्यं चा- रभ्यत इति विरुद्धम् । यद्विनष्टं तदेव नोत्पद्यत इति । प्रध्वंसाभाववन्नित्योऽपि मोक्ष आरभ्य एवेति चेत् ? न; मोक्षस्य भावरूपत्वात् । प्रध्वंसाभावोऽप्यारभ्यत इति न संभवति; अभावस्य विशेषाभावाद्विकल्पमात्रमेतत् । और यह जो कहा कि 'स्वर्ग' शब्दसे कही जानेवाली निरतिशय प्रीति कर्मनिमित्तक होनेके कारण मोक्ष कर्मसे ही आरम्भ होनेवाला है; सो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि मोक्ष नित्य है और किसी भी नित्य वस्तुका आरम्भ नहीं किया जाता; लोकमें जिस वस्तुका भी आरम्भ होता है वह अनित्य हुआ करती है; इसलिये मोक्ष कर्मारब्ध नहीं है । पूर्व०-ज्ञानसहित कर्मोंमें तो नित्य मोक्षके आरम्भ करनेकी भी सामर्थ्य है ही ? सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे विरोध आता है, मोक्ष नित्य है और उसका आरम्भ किया जाता है-ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। पूर्व०-जो वस्तु नष्ट हो जाती है वही फिर उत्पन्न नहीं हुआ करती, अतः प्रध्वंसाभावके समान नित्य होनेपर भी मोक्षका आरम्भ किया ही जाता है। ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि मोक्ष तो भावरूप है । प्रध्वंसाभाव भी आरम्भ किया जाता है यह संभव नहीं; क्योंकि अभावमें कोई विशेषता न होनेके कारण यह तो केवल विकल्प ही है। भावका CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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