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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४९ न्यायकन्दली द्वे वस्तुनी प्रतिभासयति । नापि तयोर्विशेषण-विशेष्यभावः ,गोत्वा 1गोत्ववानित्येयमनुदयात्; किन्तु तादात्म्यग्राहिणी प्रतीतिरियम्, गौरयमित्येकात्मतापरामर्शात्, उभयोरन्योन्यप्रहाणेन स्वरूपान्तराभावाच्च । अनुवृत्तता हि गोत्वस्यैव सामान्यान्तरस्यापि स्वरूपम्, व्यावृत्ततापि गोव्यक्तेर्व्यक्त्यन्तराणामपि स्वभावः । सामान्यान्तरव्यावृत्तं तु गोत्वस्य स्वरूपम्, व्यक्त्यन्तरव्यावृत्तिश्च गोव्यक्तेः स्वभावः परस्परान्यतामन्तरेणान्यो न शक्यते निर्देष्टुम् । जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि विशिष्टबुद्धियों में दण्ड और पुरुष दोनों में से एक सामान्यविधया और दूसरा व्यक्तिविधया स्पष्ट रूप से प्रतिभासित होता है, उस प्रकार से 'अयं गौः, अयं गौः' इत्यादि आकार के अनुवृत्तिप्रत्ययों में गोत्वादि सामान्य रूप से और गोप्रभृति विशेष (व्यक्ति) रूप से प्रतिभासित नहीं होते । एवं उक्त प्रतीतियों में गो विशेष्य रूप से और गोत्व विशेषण रूप से भी प्रतिभासित नहीं होते; क्योंकि ऐसी बात होती तो प्रतीति का अभिलाप 'गौः1 गोत्वन्' इस आकार का होता ('अयं गौः' इस आकार का नहीं) । तस्मात् 'अयं गौः' यह प्रतीति तादात्म्यविषयक है; क्योंकि 'अयम्' पदार्थ और 'गौः' पदार्थ दोनों के एकरूपत्व का ही उससे परामर्श होता है । दूसरी युक्ति यह भी है कि गो को छोड़कर गोत्व का कोई अपना स्वरूप नहीं है एवं गोत्व को छोड़कर गो का भी कोई स्वरूप नहीं है; क्योंकि केवल अनुवृत्तत्व जैसे गोत्व जाति में है, वैस ही अश्वत्वादि जातियों में भी है । एवं केवल व्यावृत्तत्व (अर्थात् स्वभिन्न- भिन्नत्व) जैसे गो व्यक्ति में है, वैसे ही अश्वादि व्यक्तियों में भी है, अतः गोत्व का ऐसा ही स्वरूप मानना पड़ेगा जो दूसरे सामान्यों में न रहे एवं गोव्यक्ति

  1. मुद्रित न्यायकन्दली में 'गोत्वा गोत्ववान्' ऐसा पाठ है । यह तो स्पष्ट है कि इसमें एक 'ए' का चिह्न छूट गया है । अतः 'गोत्वो गोत्ववान्' ऐसा पाठ संशोधक को अभिप्रेत मालूम होता है । किन्तु सो भी ठीक नहीं जँचता; क्योंकि प्रथम विकल्प में कहा गया है कि 'अयं गौः' इस आकार की प्रतीति में गो का व्यक्तिविधया और गोत्व का जातिविधया भान नहीं होता है । इसके बाद 'नापि तयोः' इत्यादि से जो विकल्प किया गया है, उसमें द्विवचनान्त 'तयोः' पद से गो और गोत्व इन्हीं दोनों का ग्रहण समुचित जान पड़ता है । 'किन्तु तादात्म्यग्राहिणी' इत्यादि से इस विकल्प का खण्डन किया गया है कि 'अयं गौः' यह प्रतीति 'इदम्' पदार्थ में गो के तादात्म्यविषयक ही है । इससे भी इसी प्रतिषेध का आक्षेप होता है कि 'अयं गौः' यह प्रतीति गोविशेष्यक एवं गोत्वविशेषणक नहीं है । यदि ऐसी बात है तो फिर 'गौः गोत्ववान्' ऐसा ही पाठ उचित है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।

७५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- न्यायकन्दली न च तस्य स एव स्वभावः सं एव च सम्बन्धीत्युपपद्यते, निःस्वभावस्य सम्बन्धाभावात् । तस्माज्जातिव्यक्त्योः परस्परात्मकतैव तत्त्वम् । एवं सति भेदाभेदवादोऽपि सिद्धयति । यथा हि शाबलेयो गौरित्येवं प्रतीयते तथा बाहुलेयोऽपि । न चास्ति कस्यचिद् बाधः शाबलेय एव गौर्न बाहुलेय इति; किन्तु सर्वेषामेकमतित्त्वमेव 'स गौरयमपि गौरिति' । तत्र प्रतीतिबलेन शाबलेयात्मकस्य गोत्वस्य बाहुलेयात्मकत्वे सिद्धे शाबलेयाद् भेदोऽपि सिद्धयति । अयमेव हि सामान्यस्य पूर्वपिण्डाद् भेदो यत् पिण्डान्तरात्मकत्वम् । इदमेव च सामान्यरूपत्वं यदुभयात्मकत्वम् । भेदाभेदावेकस्य विरुद्धाविति चेत् ? न, युक्तिज्ञस्य भवतः साम्प्रतमेतदभिधातुम् । तद्विरुद्धं यत्र बुद्धिर्विपर्य्येति । यत्तु सर्वदा प्रमाणेन तथैव प्रतीयते, तत्र विरोधाभिधानमेव विरुद्धम् । अन्यत्रैवं न दृष्टमिति चेत् ? किं वै प्रत्यक्षमपि अनुमानमिव दृष्टमनु- का स्वरूप भी ऐसा ही मानना पड़ेगा जो अश्वादि व्यक्तियों में न रहे । अतः इन दोनों स्वरूपों का उपयुक्त निर्णय तभी हो पायेगा, जब कि गोव्यक्ति और गोत्व जाति दोनों में तादात्म्य मान लें । अर्थात् ऐसा मान लें कि गोत्वाभिन्नत्व ही गोव्यक्ति का स्वभाव है एवं गोव्यक्तियों से अभिन्न रहना ही गोत्व जाति का स्वभाव है । ऐसा तो हो नहीं सकता कि वही उसका स्वभाव भी हो और वही उसका सम्बन्धी भी हो; क्योंकि किसी स्वभाव से युक्त वस्तु में ही किसी का सम्बन्ध होता है । बिना स्वभाव के वस्तु में किसी का सम्बन्ध सम्भव नहीं है । तस्मात् 'जाति व्यक्तिस्वरूप है और व्यक्ति भी जातिस्वरूप ही है' यही सिद्धान्त ठीक है । ऐसा मान लेने पर जाति और व्यक्ति में परस्पर भेद और अभेद दोनों की ही सिद्धि (प्रतीतियों के भेद से) हो सकती है । जिस प्रकार शाबलेय गो में 'यह गो है' इस आकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार बाहुलेय नाम के गो में भी 'यह गो है' इस प्रकार की प्रतीति होती है । ऐसी कोई बाधबुद्धि भी नहीं है कि शाबलेय ही गो है बाहुलेय नहीं; किन्तु यही सबों का अनुभव है कि 'शाबलेय' भी गो है एवं 'बाहुलेय' भी गो है । इस स्थिति में शाबलेय गो के स्वरूप गोत्व में बाहुलेय गो की स्वरूपता जिस प्रकार सिद्ध होती है, उसी प्रकार गोत्व में शाबलेय गो के भेद की भी सिद्धि होती है । (गोत्व रूप) सामान्य में पूर्वपिण्ड (शाबलेय गोरूप पिण्ड) का भेद इसीलिए है कि सामान्य (गोत्व) पिण्डान्तर (बाहुलेय गोरूप दूसरा पिण्ड) स्वरूप है । सामान्यरूपता इसलिए है कि वह उभयात्मक है । (उ.) एक ही वस्तु में एक ही वस्तु का भेद और अभेद दोनों का रहना परस्पर 'विरुद्ध' है ? (प्र) युक्तियों से अभिज्ञ आप जैसे व्यक्ति का ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि 'विरुद्ध' वही कहलाता है जिसमें कि बुद्धि का विपर्यास हो । जो बराबर प्रमाण के द्वारा उसी प्रकार का प्रतीत होता है, उसको विरुद्ध कहना ही 'विरुद्ध' है । यदि यह

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५१ न्यायकदली सरति ? हतं तर्हीदमनवस्थया । अथेयं स्वसामर्थ्यात् प्रवर्तते ? तदा यथा यद् वस्तु यद् दर्शयति तथैव तत्, न त्येतदन्यत्रादर्शनेन प्रत्याख्यानमर्हति सर्वभावप्रत्याख्यानप्रसङ्गात् । तस्मात् सामान्यं व्यक्त्युत्पादविनाशयोरुत्पादविनाशवत्त्वाद् व्यक्त्यन्तरावस्थाने चावस्थाना- न्नित्यमनित्यं च, न पुनर्नित्यमेव । एवं प्राप्तेऽभिधीयते किं जातिव्यक्त्योर्विलक्षणमाकारं गृह्णाति तत्प्रतीतिः ? उत तयोरभेदं गृह्णाति ? आहोस्वित् परस्परविलक्षणावाकारौ ? आद्ये कल्पे तावदेकमेव वस्तु स्यात्, नोभयोरेकात्मकत्वम्, अविलक्षणाकारबुद्धिर्वेद्यत्वस्याभेदलक्षणत्वात् । द्वितीये तु कल्पे व्याहतिरेव, विलक्षणाकारसंवित्तिरेव हि भेदसंवितिः । तस्याः सम्भवे सति तयोरभेदप्रतिपत्तिरेव नास्ति, कथं भिन्नयोरभेदो व्यवस्थाप्यते ? कथं तर्हि तादात्म्य- प्रतीतिः ? न कथञ्चिदिति वदामः । यदि तावदेक आकारोऽनुभूयते, एकस्यैव वस्तुनः प्रतीतिरियं नोभयोः । अथ द्वावाकारावनुभूयेते तदास्याः प्रतीतेरसम्भव एव । यत् पुनर्गौरित्यय- कहें कि (उ.) एक ही वस्तु के भेद और अभेद इन दोनों की अवस्थिति एक ही वस्तु में कहीं नहीं देखी जाती है । अतः उक्त भेदाभेद पक्ष अयुक्त है । (प्र.) तो इसके उत्तर के लिए यह पूछना है कि क्या अनुमान की तरह प्रत्यक्ष प्रमाण को भी अपने विषय की सिद्धि के लिए उसका अन्यत्र देखा जाना आवश्यक है ? यदि ऐसी बात मानें तो अनवस्थादोष के कारण प्रत्यक्ष प्रमाण का ही लोप हो जायगा । यदि प्रत्यक्ष (अन्यत्र दर्शन की अपेक्षा न करके) केवल अपने बल से ही अपने विषय को दिखाने के लिए प्रवृत्त होता है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि अपने जिस वस्तु को वह जिस रूप में दिखलाता है, वह वस्तु उसी रूप का है । इस वस्तुस्थिति का केवल इस हेतु से निरादर नहीं किया जा सकता कि 'अन्यत्र इस प्रकार से देखा नहीं जाता' । प्रत्यक्ष का यदि यह स्वभाव न मानें तो संसार से सभी वस्तुओं की सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि सामान्य यतः अपने आश्रयरूप व्यक्तियों के उत्पन्न होने पर ही उत्पन्न होता है और उनके विनष्ट होने पर विनष्ट भी होता है, अतः 'अनित्य' है । एवं उस व्यक्ति के नाश के बाद भी उसी जाति की दूसरी व्यक्ति में रहता है, अतः वह 'नित्य' भी है । तस्मात् सामान्य नित्य एवं अनित्य दोनों ही है, केवल नित्य ही नहीं है। (उ.) ऐसी स्थिति में हम (तार्किक) लोग पूछते हैं कि (१) 'अयं गौः' यह प्रतीति जाति और व्यक्ति दोनों को एक ही आकार में ग्रहण करती है । (२) अथवा दोनों के अभेद का ग्रहण करती है ? (३) अथवा जाति और व्यक्ति दोनों को परस्पर विभिन्न आकारों में ग्रहण करती है ? इनमें यदि पहला पक्ष मानें तो

७५२ न्यायकन्दलीसंतलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- न्यायकन्दली मविभागेन संवेदनं तत् समवायसामर्थ्यात् । संयोगे हि द्वयोः संसर्गावभासः, समवायस्य पुनरेष महिमा यदत्र सम्बन्धिनावयःपिण्डवह्नियत् पिण्डीभूतावेव प्रतीयेते जातिरेव न च व्यक्तेः स्वरूपम् । तेन सत्यपि भेदे बदरादिवत् कुण्डस्य जातितो व्यक्तेः स्वरूपं पृथग् न निष्कृष्यते । परस्परपरिहारेण तूपलम्भोऽस्त्येव, दूरे गोत्वाग्रहणेऽपि पिण्डस्य ग्रहणात् । पूर्वपिण्डाग्रहणेऽपि पिण्डान्तरे गोत्वग्रहणात् । तस्माद् व्यक्तेरत्यन्तं भिन्नमेव सामान्यमिति तार्किकाणां प्रक्रिया । द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम्, द्रव्यत्वादयः फिर जाती या व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक का मानना ही सम्भव होगा, दूसरे का नहीं, जाति और व्यक्ति एतदुभयात्मक किसी वस्तु की कल्पना सम्भव नहीं होगी; क्योंकि अभिन्नता का यही लक्षण है कि जो अविलक्षण आकार की बुद्धि के द्वारा ज्ञात हो । यदि दूसरा पक्ष मानें तो परस्पर विरोध ही उपस्थित होगा; क्योंकि किन्हीं दो वस्तुओं का परस्पर विभिन्न आकारों से गृहीत होना ही उन दोनों के भेद का ज्ञान है । भेद का यह ज्ञान यदि सम्भव है, तो फिर उन दोनों में तादात्म्य की प्रतीति कैसी ? अतः हम लोग कहते हैं कि जाति और व्यक्ति इन दोनों के तादात्म्य की प्रतीति किसी भी प्रकार से नहीं होती; क्योंकि यदि एक ही आकार का अनुभव होता है तो फिर वह अनुभव एक ही वस्तु की प्रतीति होगी, दो वस्तुओं की नहीं । यदि दो आकारों का अनुभव होता है, तो फिर उस एक आकार की प्रतीति की सम्भावना ही मिट जाती है । 'गौरयम्' इत्यादि प्रतीतियों में जो गोत्वजाति और गोव्यक्ति विना अलग हुए से प्रतीत होते हैं, वह तो दोनों के समवाय का सामर्थ्य है । संयोग की प्रतीति में उसके प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों के सम्बन्धियों का भान होता है । समवाय की ही यह विशेष महत्ता है कि इसमें उसके दोनों सम्बन्धी (प्रतियोगी और अनुयोगी) परस्पर एक होकर ही प्रतीत होते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड वस्तुतः पृथक् होते हुए भी एक होकर ही ज्ञान में भासित होते हैं । सुतराम् (व्यक्ति-सम्बद्ध) जाति की ही प्रतीति होती है, केवल व्यक्ति के स्वरूप की नहीं । अतः जाति और व्यक्ति में वस्तुतः भेद रहते हुए भी जैसे कि (संयोगयुक्त) कुण्ड और बेर को अलग कर दिखलाया जा सकता है, उस प्रकार जाति से व्यक्ति के स्वरूप को अलग नहीं किया जा सकता । कुछ स्थानों में जाति और व्यक्ति की प्रतीति एक-दूसरे को छोड़कर भी होती है । जैसे दूर में गोपिण्ड (व्यक्ति) की प्रतीति तो होती है, (किन्तु 'यह गो है' इस प्रकार से) गोत्व की प्रतीति वहाँ नहीं होती । एवं पूर्वपिण्ड का ग्रहण न रहने पर भी दूसरे पिण्ड में गोत्व का ग्रहण होता है । तस्मात् तार्किकों की रीति के अनुसार जाति और व्यक्ति अत्यन्त भिन्न हैं । (किसी भी प्रकार वास्तव में अभिन्न नहीं हैं) । द्रव्यादि सामान्य यतः नियमित रूप से द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही रहते हैं, एवं प्रत्येक सामान्य की प्रतीति भिन्न-भिन्न आकार की होती है, अतः समझते हैं कि द्रव्यत्व व गुणत्वादि सामान्य परस्पर भिन्न हैं । अभिप्राय यह है कि द्रव्यादि सामान्यों

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५३ प्रशस्तपादभाष्यम् द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम् । प्रत्येकं स्वाश्रयेषु लक्षणाविशेषाद् विशेषलक्षणाभावाच्चैकत्वम् । यद्यप्य- परिच्छिन्नदेशानि सामान्यानि भवन्ति, तथाप्युपलक्षणनियमात् द्रव्यत्वादि कोई भी सामान्य द्रव्यादि कुछ आश्रयों में ही नियत रूप से रहते हैं एवं भिन्न रूप से प्रतीत भी होते हैं, अतः (द्रव्यत्व- गुणत्वादि) सामान्य परस्पर विभिन्न हैं । एवं प्रत्येक सामान्य अपने आश्रयों में समान रूप से प्रतीत होता है एवं उसको अनेक मानने में कोई प्रमाण भी नहीं है इससे सिद्ध होता है कि द्रव्यादि नियत आश्रयों में रहनेवाले द्रव्यत्वादि सामान्यों में से प्रत्येक सामान्य एक-एक ही हैं । यद्यपि सामान्य अनन्त (प्रकार के) आश्रयों में रहता है, फिर भी उसकी अभिव्यक्ति के कारणों की एकरूपता और उसके आश्रयों का न्यायकन्दली प्रत्येकं द्रव्यादिव्येव नियताः । प्रत्ययभेदश्चैतेषु दृश्यते, तस्माद् द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च द्रव्यत्वादीनां परस्परतो भेदः । अभेदात्मकं सामान्यमिति पूर्वं प्रतिज्ञामात्रेणोक्तं तदिदानीं प्रमाणसिद्धं तस्य करोति-प्रत्येकं स्वाश्रयेष्विति । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणमनुगताकारज्ञानम् । प्रत्येकं प्रतिपिण्डमविशेषाद् वैलक्षण्याभावाद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च सामान्यस्य स्वाश्रयेष्वेकत्वमभिन्नस्वभावमित्यर्थः । स्वविषये सर्वत्र सामान्यं समवैति नान्यत्रेति यत् पूर्वमुक्तं तस्य कारणमाह-यद्यपीति । यद्यपि सामान्यानि यत्र तत्रोत्पद्यमानेन पिण्डेन सम्बन्धादपरिच्छिन्नदेशान्यनियतदेशानि, में से प्रत्येक सामान्य यतः द्रव्यादि व्यक्तियों में ही नियमित रूप से रहता है एवं इनमें इनकी प्रतीतियाँ भी विभिन्न आकार की होती हैं । तस्मात् द्रव्यादि में ही नियमित रूप से रहने के कारण और उक्त प्रतीति भेद के कारण समझते हैं कि द्रव्यत्वादि जातियाँ परस्पर भिन्न हैं । 'प्रत्येकं स्वाश्रयेषु' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पहले केवल प्रतिज्ञावाक्य के द्वारा सिद्धवत् कही हुई सामान्य की अभिन्नता को प्रमाण के द्वारा 'प्रत्येकं स्वाश्रयेषु' इत्यादि वाक्य से सिद्ध करते हैं । 'लक्ष्यते अनेन' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत में 'लक्षण' शब्द का अर्थ है, अनुगत एक आकार का ज्ञान । उसका 'प्रत्येक में' अर्थात् गोप्रभृति प्रत्येक व्यक्ति में 'अविशेष से' अर्थात् विभिन्नता के न रहने से, एवं 'विशेष में' अर्थात् द्रव्यत्वादि प्रत्येक जाति के भेद में अर्थात् अनेकत्व में 'लक्षण' अर्थात् किसी प्रमाण के न रहने से समझते हैं कि एक सामान्य अपने सभी आश्रयों में एक ही है, अर्थात् अभिन्न स्वभाव का है । पहले जो यह कहा गया है कि "सामान्य अपने विषयों अर्थात् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से रहता है, अन्यत्र नहीं" उसी के हेतु का प्रतिपादन 'यद्यपि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है ।

७५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषयसर्वगतानि । अन्तराले च संयोगसमवाय- वृत्त्यभावादव्यपदेश्यानीति । ॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये सामान्यपदार्थः समाप्तः ॥ नियमित रूप से समान कारणों से उत्पन्न होना, इन दोनों से समझते हैं कि सामान्य अपने सभी आश्रयों में समानरूप से रहता है । (कार्योत्पत्ति के) बीच के द्रव्यों में उस कार्य में रहनेवाले सामान्य का न संयोग सम्बन्ध है, न समवाय सम्बन्ध, अतः उनमें सामान्य का व्यवहार नहीं होता । (अतः सन्निहित होने पर भी उनमें वह नहीं रहता है ।) ॥ प्रशस्तपादभाष्य का सामान्यनिरूपण समाप्त हुआ ॥ न्यायकन्दली तथाप्युपलक्षणस्याभिव्यञ्जकस्यावयवसंस्थानविशेषस्य नियमाश्रितत्वात् पिण्डोत्पादक- कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषये सर्वत्र समवयन्ति नान्यत्रेति । एतदुक्तं भवति-सास्नादिसंस्थानविशेषो गोत्वस्य व्यञ्जकः, केसरादिसंस्थानविशेषोऽ- श्वत्वस्य, विशिष्टग्रीवादिसंस्थानविशेषो घटत्वस्य, प्रतीतिनियमात् । एते च संस्थानविशेषा न सर्वेषु पिण्डेषु साधारणाः; अपि तु प्रतिनियतेषु भवन्ति । तत्र यद्यपि सर्वं सामान्यं सर्वत्रोपजायमानेन स्वविषयेणैव¹ पिण्डान्तरेणापि सम्बद्धं क्षमते, तथापि यस्याभिव्यञ्जकं यत्र यद्यपि सामान्य जहाँ तहाँ उत्पन्न पिण्डों के साथ सम्बद्ध होने के कारण 'अपरिच्छिन्न देश' में अर्थात् अनियत देशों में रहनेवाले हैं । फिर भी उसके 'उपलक्षण' अर्थात् अभिव्यञ्जक जो अवयवों के विशेष प्रकार के संयोग हैं, वे नियमित हैं । इस नियम के कारण और आश्रयीभूत पिण्डों के कारणों के नियमित होने से वे अपने ही विषयों में समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होते हैं । इससे यह अभिप्राय निकला कि सास्ना प्रभृति अवयवों का विशेष प्रकार का संयोग (संस्थान) ही गोत्व जाति की अभिव्यक्ति का कारण है । एवं केसर प्रभृति संस्थान अश्वत्व जाति की अभिव्यक्ति का हेतु है । इसी प्रकार विशेष प्रकार के ग्रीवादि संस्थान घटत्व के ज्ञापक हैं; क्योंकि नियमित रूप से तत्तत् संस्थान से युक्त पिण्डों में ही तत्तत् सामान्य का प्रतिभास होता है । ये कथित संस्थान सभी पिण्डों में समान रूप से नहीं रहते; किन्तु अपने नियमित पिण्डों में ही रहते हैं । इस प्रकार सभी सामान्य जिस प्रकार सभी जगह उत्पन्न होनेवाले अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होंगे, उसी प्रकार दूसरे पिण्डों के साथ

  1. यहाँ 'स्वविषयेणैव' के स्थान में 'स्वविषयेणेव' ऐसा 'इवकार' घटित पाठ ही उचित जान पड़ता है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५५ न्यायकन्दली पिण्डे सम्भवति तस्य तत्रैव समवायो नान्यत्र । एवं सामग्रया नियमादपि सामान्यसम्बन्धनियमः । एष हि तन्त्वादीनां कारणानां स्वभावो यदेतैरुपद्यमाने द्रव्ये पटत्वमेव समवैति, नान्यत् । एष हि मृत्पिण्डादीनां महिमा यत् तैः क्रियमाणे द्रव्ये घटत्वमेव समवैति, नान्यत् । न तावत् सामान्यमन्यतो गत्यान्यत्र सम्बध्यते, निष्क्रियत्वात् । तत्रापि यदि पूर्वं नासीत् ? तत्रोपजायमानेन पिण्डेनास्य सम्बन्धो न स्यात् । दृश्यते च सर्वत्रोपजाय- मानेन पिण्डेन सम्बन्धः, तस्मात् सर्वं सर्वत्रास्तीति कस्यचिन्मतं तन्निराकुर्वन्नाह- अन्तराले संयोगसमवायवृत्त्यभावान्नाव्यपदेश्यानीति । अन्तरालमिति आकाशं वा दिग्द्रव्यं वा स्तिमितवेगमूर्त्तद्रव्याभावो वा, तेषु गोत्वादिसामान्यानां न संयोगो नापि समवायः । न चासम्बद्धानामेव तेषामवस्थाने प्रमाणस्ति । अतोऽन्तराले न सामान्यानि व्यपदिश्यन्ते न सन्तीत्यर्थः । कथं तर्हि तत्रोपजायमानेन पिण्डेन सम्बध्यन्ते ? भी जिस किसी सम्बन्ध से सम्बद्ध हो सकते हैं । फिर भी जिस सामान्य का ज्ञापक जो संस्थान है, उस संस्थान से युक्त पिण्ड में ही उस सामान्य का समवाय है, अन्य पिण्डों में नहीं । इसी प्रकार आश्रयीभूत किसी व्यक्ति के उत्पादक कारणसमूह के नियमन से ही सामान्य के समवायरूप सम्बन्ध का भी नियमन हो सकता है, जैसे कि (पट के उत्पादक) तन्तु प्रभृति कारणों का ही यह स्वभाव है कि इनसे उत्पन्न द्रव्य में पटत्व समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होता है, अन्य सामान्य नहीं । एवं मिट्टी प्रभृति कारणों की ही यह महिमा है कि इनसे उत्पन्न द्रव्य में घटत्व का ही समवाय हो, किसी दूसरे सामान्य का नहीं । 'सामान्य' यतः क्रियारहित है, अतः एक जगह से दूसरी जगह जाकर अपने विषय के साथ सम्बद्ध नहीं हो सकता । (व्यक्ति की उत्पत्ति के देश में उसके रहने पर भी उस व्यक्ति के साथ सम्बन्ध के प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठता है कि) सामान्य यदि उस देश में पहले से नहीं था, तो फिर इस समय उत्पन्न हुए अश्वादि के साथ उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता; किन्तु सभी देशों में उत्पन्न व्यक्तियों के साथ उसका सम्बन्ध होता है । तस्मात् यह मानना पड़ेगा कि सामान्य सभी स्थानों में है । किसी सम्प्रदाय के इसी सिद्धान्त का निराकरण करने के लिए 'अन्तराले' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । प्रकृत में 'अन्तराल' शब्द आकाशादि का, स्तिमित वायु का अथवा अमूर्त्त द्रव्य प्रभृति का बोधक है । इनमें से किसी में भी गोत्वादि सामान्यों का न समवाय सम्बन्ध है और न संयोग सम्बन्ध है । 'गोत्वादि जातियाँ बिना किसी सम्बन्ध के ही रहती हैं' इस प्रसङ्ग में भी कोई प्रमाण नहीं है । अतः कथित 'अन्तराल' में गोत्वादि सामान्य का व्यवहार नहीं होता है । फलतः वह अन्तराल में नहीं है । (प्र.) तो फिर उन देशों में अपने गवादि विषयों (व्यक्तियों) के साथ वे किस प्रकार सम्बद्ध होते

७५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- न्यायकन्दली कारणसामर्थ्यात् । संयोगो ह्यन्यतः समागतस्य भवति, तत्रैवावस्थितस्य वा भवति । तस्माद् विलक्षणस्तु समवायो यत्र यत्रैव पिण्डोत्पत्तौ कारणानि व्याप्रियन्ते, तत्र तत्रैव कारणानां सामर्थ्यात् पिण्डेऽन्यतोऽनागतस्य तत्र स्थितस्यापि सामान्यस्य भवति, वस्तुशक्तेरपर्य्यनुयोज्यत्वात् । अत्राहुः सौगताः-प्रतीयमानेषु भेदेषु मणिसूत्रवदेकस्याकारस्यानुपलम्भात् सामान्यं नास्त्येवेति । तदयुक्तम्, अनेकासु गोव्यक्तिष्वनुभूयमानास्त्वश्वादिव्यक्तिवैलक्षणतया सामान्याकारप्रतीतिसम्भवात् । यदि शाबलेयादिषु परस्परभिन्नेष्वेकमनुवृत्तं न किञ्चि- दस्ति, यथा गवाश्वव्यक्तयः परस्परविलक्षणाः संवेद्यन्ते तथा गोव्यक्तयोऽपि संवेद्याः स्युः । यथा वा गोव्यक्तयः सरूपाः प्रतीयन्ते तथा गवाश्वव्यक्तयोऽपि प्रतीयेरन्, विशेषाभावात् । नियमेन तु गोव्यक्तयः प्रतीयमानाः सरूपाः स्ववर्गसाधारण- हैं ? इसका यह उत्तर है कि व्यक्ति के उत्पादक कारणों के विशेष सामर्थ्य के द्वारा ही गोत्वादि सामान्य अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होते हैं । संयोग दूसरे देश से आये हुए व्यक्ति का, अथवा उसी स्थान में पहले से विद्यमान वस्तु का होता है; किन्तु समवाय में संयोग से यह अन्तर है कि जिन-जिन देशों में उसके विषयों के उत्पादक कारण अपने कार्य को करने के लिए क्रियाशील होते हैं, उन्हीं- उन्हीं देशों में उन्हीं कारणों के विशेष सामर्थ्य के द्वारा उस सामान्य का सम्बन्ध हो जाता है, जो किसी दूसरी जगह से नहीं आता, उसी देश में विद्यमान रहता है; क्योंकि वस्तुओं की स्वाभाविक शक्तियाँ सभी अभियोगों के बाहर हैं । इस प्रसङ्ग में बौद्ध लोगों का कहना है कि (प्र.) सामान्य नाम की कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार मणियों के विभिन्न होते हुए भी उन सबों में एक माला का व्यवहार इसलिए होता है कि सबों को एक व्यवहार में लानेवाला सूत्र नाम का एक पदार्थ है, उस प्रकार विभिन्न गोव्यक्तियों में एक प्रकार के व्यवहार के कारण गौओं से भिन्न किसी वस्तु की उपलब्धि नहीं होती । (उ.) किन्तु उन लोगों का यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि सभी गोव्यक्ति में 'ये गो हैं' इस एक प्रकार की प्रतीति होती है, जो अश्वादि व्यक्तियों में नहीं होती है । यदि परस्पर विभिन्न शाबलेय (बाहुलेय) प्रभृति सभी गोव्यक्ति में समान रूप से रहनेवाली कोई वस्तु नहीं हैं, तो फिर जिस प्रकार गो और अश्व दोनों परस्पर विभिन्न रूप में प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार सभी गोव्यक्ति भी परस्पर विभिन्न रूप में ही प्रतीत होंगी । अथवा जिस प्रकार सभी गोव्यक्ति की प्रतीति एक रूप से होती है, उसी प्रकार गोव्यक्तियों और अश्वव्यक्तियों की प्रतीतियाँ भी एक रूप से होंगी; क्योंकि स्थितियों में अन्तर का कोई कारण नहीं है; किन्तु नियमतः सभी गोव्यक्ति एक ही आकार से प्रतीत होती हैं, अतः अश्वादि सभी व्यक्तियों में न रहनेवाले एवं सभी गोव्यक्तियों

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७५७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७५७ न्यायकन्दली मह्यादिव्यावृत्तं किञ्चिदेकं रूपमाक्षिपति, १ एकार्थक्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च । गोव्यक्ती- नामेकत्वमिति चेत् ? नासति सामान्ये व्यक्तीनामिव व्यक्तिहेतूनां व्यक्तिकार्याणामपि परस्पर- व्यावृत्तानामेकत्वात् २ । किञ्च, यद्येकहेतुत्वादेकत्वम्, भिन्नकारणप्रभवाणां व्यक्तीनामेकत्वं न स्यात् । दृश्यते चाभिन्नस्वभावानामपि कारणभेदो यथा वह्नेर्दारुनिर्मथनाद् विद्युत् आदित्य- गभस्तिक्षोभितात् सूर्यकान्तादपि मणेरुत्पत्तिः । एककार्यत्वादेकत्वे च विजातीयाना- में रहनेवाले किसी एक धर्म की कल्पना आवश्यक हो जाती है । (प्र.) सभी व्यक्ति यतः एक ही प्रकार के कार्यों के सम्पादक हैं एवं एक ही प्रकार की सामग्रियों से उत्पन्न होती हैं, अतः सभी गोव्यक्ति एक ही हैं (इसी एकत्व के कारण एकाकार की प्रतीतियाँ होती हैं) । (उ.) जिस प्रकार सामान्य के न रहने पर व्यक्तियों की एकता सम्भव नहीं है, उसी प्रकार व्यक्तिरूप कार्यों और व्यक्ति के कारणों की एकता भी सम्भव नहीं है; क्योंकि व्यक्तियों की तरह उनके कार्य और उनके कारण भी तो परस्पर विभिन्न हैं, उनमें रहनेवाले सामान्यों के बिना उनमें भी एकत्व का सम्पादक कौन होगा ? दूसरी बात यह है कि यदि एक प्रकार की सामग्री से उत्पन्न होना ही व्यक्तियों में एकरूपता का कारण हो तो फिर भिन्न प्रकार की सामग्री से एक प्रकार के कार्य की उत्पत्ति न हो सकेगी; किन्तु सभी अग्नियों का एक प्रकार का स्वभाव होते हुए भी उनके कारण भिन्न- भिन्न हैं, यतः कभी काष्ठों के मन्थन से, कभी विद्युत् से और कभी सूर्य की किरणों से क्षुभित सूर्यकान्त मणि से वह्नि की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार यदि एक प्रकार के कार्यों के उत्पादक होने से ही व्यक्तियों में एकता मानी जाय तो कुछ विजातीय वस्तुओं में भी एकता माननी पड़ेगी; क्योंकि दोहन, वाहनादि क्रियायें समान रूप से गोप्रभृति व्यक्तियों से और महिषादि व्यक्तियों से भी उत्पन्न होती हैं । (एवं एककार्यकारित्व को यदि एकता का प्रयोजक मानें तो फिर) जिन गोव्यक्तियों से दोहन, भारवाहनादि क्रियायें सम्पादित ही नहीं होतीं, उनमें

  1. मुद्रित पुस्तक में 'रूपमाक्षिपति' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम नहीं है । 'एकार्थ- क्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम है, जिससे सङ्गति ठीक नहीं बैठती है । अतः 'रूपमाक्षिपति' इसी वाक्य के आगे पूर्णविराम देकर और आगे के वाक्य को पूर्वपक्षियों के साधक हेतुओं का बोधक मानकर अनुवाद किया गया है ।
  2. इस सन्दर्भ में 'परस्परव्यावृत्तानामेकत्वात्' यह मुद्रित पाठ उचित नहीं जान पड़ता, इसे प्रथमान्त होना चाहिए । आगे के 'भिन्नकारणप्रभवाणामेकत्वम्' इस प्रथमान्त पाठ से यह और स्पष्ट हो जाता है । अतः उक्त पाठ को प्रथमान्त मानकर ही अनुवाद किया गया है ।

७५८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- न्यायकन्दली मप्येकत्यापत्तिः, दृष्टा हि वाहदोहनादिक्रिया गवादिव्यक्तिनामिव महिष्यादि- व्यक्तीनामपि । या च गौर्न दुह्यते न च वाह्यते, सा गौर्न स्यात् । अपि च सामान्याभावे कोऽर्थः शब्दसंसर्गविषयः ? न तावत् स्वलक्षणम्, तस्य क्षणिकस्य सर्वतो व्यावृतस्य सङ्केतविषयत्वाभावात् । नापि विकल्पः शब्दार्थः, तस्य क्षणिकत्वादसाधारणत्वाच्च । विकल्पाकारः शब्दार्थ इति चेत् ? किं विकल्पाकारो विकल्पव्यतिरिक्तः ? अव्यतिरिक्तो वा ? यदि भिन्नः, स किं सर्वविकल्पसाधारणः, किं वा प्रतिविकल्पं भिद्यते ? साधारणत्वे तावदेतस्य सामान्यादभेदः, यदि परम् ? तव ज्ञानधर्मोऽयमस्माकं चार्थधर्मः (इति) बहिर्मुखतया प्रतीयमानत्वादिति (न) कश्चिद् विशेषः । यदि व्यतिरिक्तोऽयमाकारः प्रतिज्ञानं भिद्यते, अथवा ज्ञानाद्व्यतिरिक्त एव, उभयथापि न शब्दसंसर्गयोग्यता, ज्ञानवदशक्यसङ्केतत्वात् । विकल्पः पारम्पर्येण तदुत्पत्तिप्रतिबन्धाद् बाह्यात्मतया स्वाकारमारोप्य विकल्पयति, तत्रायं शब्दसंसर्ग एक आकार की कथित प्रतीति नहीं होगी । एवं जिस गाय से न दूध मिलता है और न माल ढोया जाता है वह गाय ही नहीं रह जायगी । दूसरी बात यह है कि यदि सामान्य नाम की कोई वस्तु ही न हो तो शब्दों का (सङ्केत रूप) सम्बन्ध कहाँ मानेंगे ? घटादि विषयों के 'स्वलक्षण' में घटादि शब्दों का सम्बन्ध मान नहीं सकते; क्योंकि उक्त 'स्वलक्षण' तो क्षणिक है एवं और किसी भी वस्तु में वह नहीं रहता है, अतः उसमें किसी भी शब्द का (सङ्केत या) सम्बन्ध नहीं हो सकता । उसका विकल्प भी शब्दसङ्केत का विषय नहीं हो सकता; क्योंकि 'विकल्प' भी क्षणिक है और साथ-साथ असाधारण (एकमात्र पुरुषवृत्ति) भी है । (प्र.) एक व्यक्तिव्यक्ति क्षणिक और असाधारण है; किन्तु विकल्पों के आकार तो असाधारण हैं (क्योंकि एक आकार के अनेक विकल्प अनेक पुरुषों में देखे जाते हैं), अतः विकल्प का आकार शब्दसङ्केत का विषय हो सकता है । (उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि विकल्प का यह आकार विकल्प से भिन्न कोई स्वतन्त्र वस्तु है ? या यह विकल्प से अभिन्न (वस्तुतः विकल्प ही) है ? यदि पहला पक्ष मानें (कि विकल्प का आकार विकल्प से भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है) तो फिर इस प्रथम पक्ष के प्रसङ्ग में भी यह पूछना है कि यह 'आकार' सभी विकल्पों में साधारण रूप से रहनेवाली एक ही वस्तु है ? या प्रत्येक विकल्प में रहनेवाला आकार अलग-अलग है ? यदि सभी विकल्पों में साधारण रूप से रहनेवाले एक 'आकार' को स्वीकार कर लिया जाय, तो वह सामान्य से अभिन्न ही होगा । फलतः सामान्य स्वीकृत ही हो गया । थोड़ा अन्तर इतना रह जाता है कि उसे (आकार को) आप ज्ञानों का धर्म मानते हैं और हम लोग उसे (सामान्य को) बहिर्मुखतया प्रतीत होने से विषयों का धर्म मानते हैं । यदि आकार को विकल्प से भिन्न मानें तो फिर वह ज्ञान से भिन्न ही होगा या ज्ञान स्वरूप ही होगा । दोनों ही स्थितियों में उनमें शब्दों के सम्बन्ध की सम्भावना नहीं रहेगी; क्योंकि ज्ञान की तरह (उससे भिन्न या अभिन्न आकार भी क्षणिक होने के कारण) शब्दसङ्केत

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५६

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५६ न्यायकन्दली इति चेत् ? बाह्यत्वेनारोपितो विकल्पाकार एकाधीनस्वभावत्वाद् विकल्पे जायमाने जायमान इव, विनश्यति विनश्यन्निव प्रतीयमानः प्रतिविकल्पं भिन्न एवावतिष्ठते । न च भेदानुपातिनि सङ्केतप्रवृत्तिरित्युक्तम् । अथोच्यते—यादृशमेको गोविकल्पे बाह्यात्मतया स्वप्रतिभासमारोपयति गोविकल्पान्त- रमपि तादृशमेवारोपयति, विकल्पाश्च प्रत्येकं स्वाकारमात्रग्राहिणो न परस्परारोपिता- नामाकाराणां भेदग्रहणाय पर्याप्नुवन्ति, तस्योभयग्रहणाधीनत्वात् । तदग्रहणाच्च विकल्पा- रोपितानामाकाराणामेकत्वमारोप्य विकल्पनामेको विषय इत्युच्यते । तदेव च सामान्यं बहिरारोपितेभ्यो विकल्पाकारेभ्योऽत्यन्तभेदाभावेनाभावरूपं स्वलक्षणज्ञानतदाकारारोपि- तैश्चतुर्भिः सहोभिः समस्यार्द्धपञ्चमाकार इत्युच्यमानमारोपितबाह्यत्वं शब्दाभिधेयं शब्द- का विषय नहीं हो सकता । (प्र.) यह परम्परया बाह्यविषयों के साथ भी है, अतः विकल्प स्वयं अपने में ही बाह्यत्व का आरोप कर अपने में बाह्यत्वाकार के विकल्प को भी उत्पन्न करता है । इसी बाह्यविषयक विकल्प में शब्दों का सङ्केत है । (उ.) बाह्यत्वविषयक यह आरोप प्रत्येक बाह्य विषय में अलग-अलग ही मानना पड़ेगा; क्योंकि इस बाह्यविषयक विकल्प की उत्पत्ति केवल कथित आन्तर विकल्प- मात्र से होती है, अतः इसके उत्पन्न होने पर वह वस्तुविषयक विकल्प उत्पन्न-सा और विनष्ट होने पर विनष्ट-सा दीखता है । इस प्रकार वस्तुविषयक वह विकल्प असाधारण और क्षणिक भी होगा । पहले ही कह चुके हैं कि सजातीय भिन्न व्यक्तियों में ही शब्द का सङ्केत हो सकता है, असाधारण किसी एकमात्र व्यक्ति में नहीं । (प्र.) एक गोविषयक विकल्प बाह्यत्वविषयक अपने जिस आकार को उत्पन्न करता है, गोविषयक दूसरा विकल्प भी उसी तरह के बाह्यत्वविषयक अपने आकार के विकल्प को उत्पन्न करता है । विकल्पों का यह स्वभाव है कि वे केवल अपने आकारों का ही आरोप करें । समान आकारों में जो आरोपित परस्पर भेद हैं, उन भेदों को ग्रहण कराने का सामर्थ्य उनमें नहीं है; क्योंकि भेद को समझने के लिए उसके प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों को समझना आवश्यक है । भेद के इस अज्ञान के कारण ही एक आकार के विकल्प से कल्पित आकारों में एकत्व का आरोप होता है । एकत्व के इसी आरोप के कारण 'इयं गौः' 'इस आकार के सभी विकल्पों का विषय एक ही है' इस प्रकार का व्यवहार होता है । इसी को (वैशेषिकादि) 'सामान्य' कहते हैं; किन्तु यह 'सामान्य' अभावरूप है (भावरूप नहीं); क्योंकि बाह्य वस्तुओं में एवं आरोपित विकल्पों में जो परस्पर भेद है, उनका अत्यन्ताभाव ही वह सामान्य है । (१) स्वलक्षण (कम्बुग्रीवादिमत्त्व प्रभृति), (२) उसका ज्ञान, (३) ज्ञान के आकार एवं (४) आकार का बाह्यत्वारोप इन चार सहायकों के साथ मिलकर (इन चारों से कुछ ही भिन्न होने के कारण) उसे 'अर्द्धपञ्चमाकार' कहा जाता है । उसी अर्द्धपञ्चमाकार वस्तु में शब्द

७६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [सामान्यनिरूपण- न्यायकन्दली संसर्गविषयः । तदध्यवसाय एव स्वलक्षणाध्यवसायः, तदात्मतया तस्य समारोपात् । अन्यव्यावृत्तिस्वभावं भावाभावसाधारणं चेदम्, गौरस्ति नास्तीति प्रयोगात् । भावा- त्मकत्वे ह्यस्य गौरस्तीति प्रयोगासम्भवः, पुनरुक्तत्वात् । नास्तीति च न प्रयुज्यते, विरोधात् । एवं तस्याभावात्मकत्वे नास्तीति पुनरुक्तम्, अस्तीति विरुध्यते । यथोक्तम्- घटो नास्तीति वक्तव्यं सन्नेव हि यतो घटः । नास्तीत्यपि न वक्तव्यं विरोधात् सदसत्तयोः ॥ इति । एतस्मादेव च भिन्नानामपि व्यक्तीनामेकतावभासः । इदं हि सर्वेषामेव विकल्पानां विषयोऽस्यैकत्वाद् विकल्पानामप्येकत्वम् । तेषामेकत्वाच्च तत्कारणानां का (सङ्केतरूप) संसर्ग होता है । शब्द से उसी का व्यवहार होता है एवं उसी का बाह्य अर्थरूप में भी व्यवहार होता है, उसे ही 'स्वलक्षण' भी कहते हैं । इसी 'स्वलक्षणाध्यवसाय' रूप से उसका आरोप होता है । इस (अर्द्धपञ्चमाकार) का अध्यवसाय ही 'स्वलक्षणाध्यवसाय' कहा जाता है; क्योंकि विकल्प का इसी रूप से आरोप होता है । यह (अपोह) अन्यव्यावृत्ति स्वभाव का है, अर्थात् इसका स्वभाव है कि अपने विषय को अन्यों से भिन्न रूप में समझावे । एवं भाव और अभाव दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान रूप से रहना भी इसका स्वभाव है; क्योंकि 'गौरस्ति' और 'गौर्नास्ति' ये दोनों ही प्रकार के प्रयोग होते हैं । यदि यह केवल भावरूप ही होता, तो फिर पुनरुक्ति के कारण 'गौरस्ति' यह प्रयोग सम्भव न होता। 'गौर्नास्ति' यह प्रयोग भी नहीं हो सकता; क्योंकि अस्तित्व और नास्तित्व दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । इसी प्रकार इसको केवल अभावरूप ही मानें तो 'गौर्नास्ति' यह प्रयोग पुनरुक्ति के कारण नहीं हो सकेगा और 'गौरस्ति' यह प्रयोग विरोध के कारण असम्भव होगा । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि- 1"यतः घट सत् है, अतः 'घटोऽस्ति' यह प्रयोग ठीक नहीं है (क्योंकि इससे पुनरुक्ति होती है) । 'घटो नास्ति' यह प्रयोग भी ठीक नहीं है; क्योंकि (घटशब्द से बोध्य) सत्त्व और (नास्तिशब्द से बोध्य) असत्त्व दोनों परस्पर विरोधी हैं ।" इसी (अर्द्धपञ्चमाकार) से विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति होती है । यही सभी विकल्पों का विषय है और इसी की एकता से सभी विकल्पों में भी एकता की प्रतीति होती है । विकल्पों के एकत्व से ही उसके कारणीभूत एवं प्रत्येक पिण्ड

  1. यह श्लोक मुद्रित पुस्तक में 'घटो नास्तीति वक्तव्यम्' इस प्रकार से मुद्रित है; किन्तु विषय विवेचन की दृष्टि से 'घटोऽस्तीति न वक्तव्यम्' ऐसा पाठ उचित जान पड़ता है । यह पाठ पाठान्तरों की सूची में भी है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७६१

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७६१ न्यायकन्दली प्रतिपिण्डभाविनां निर्विकल्पकानामप्येकत्वम् । तेषामेकत्वाच्च तत्कारणानां व्यक्तीनामेक- त्यावगमः । यथोक्तम्- एकप्रत्यवमर्षस्य हेतुत्वाद् धीरभेदिनी । एकधीहेतुभावेन व्यक्तीनामप्यभिन्नता ॥ इति । एतदप्ययुक्तम्, विकल्पानुपपत्तेः । विकल्पाकाराणां भेदाग्रहणादारोपितमैक्यं सामान्य- माचक्षते भिक्षवः । अत्र ब्रूमः । किमाकाराणां भेदाग्रहणमेवाभेदसमारोपः ? आहोस्वित्- भेदग्रहणमभेदारोपः ? न तावदाद्यः कल्पः, भेदसमारोपितस्यापि प्रसङ्गात् । यथा विकल्पाकाराणां भेदो न गृह्यते, तद्वदभेदोऽपि न गृह्यते । तत्र भेदाग्रहणादभेदारोपवद्- भेदाग्रहणाद् भेदारोपस्यापि प्रसक्तावभेदोचितव्यवहारप्रवृत्त्ययोगात् । अभेदग्रहणमभेदारोप इत्यपि न युक्तम्, आत्मवादे एको ह्यनेकदर्शी तेषां भेदाभेदौ प्रत्येति । नैरात्म्यवादे त्वेकोऽने- कार्थद्रष्टा न कश्चिदस्ति, विकल्पानां प्रत्येकं स्वाकारमात्रनियतत्वात् । अस्तु में उत्पन्न होनेवाले निर्विकल्पक ज्ञानों में भी एकता की प्रतीति होती है । निर्विकल्पक ज्ञानों की इस एकता से ही उनके कारणीभूत विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति होती है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि- "एकत्व ज्ञान के कारण ही परस्पर विभिन्न व्यक्तियों में अभेद बुद्धि उत्पन्न होती है एवं उस एकत्वविषयक बुद्धि को हेतु होने से ही व्यक्तियों में अभिन्नता होती है" । (उ.) यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि इस पक्ष के सम्भावित सभी विकल्प अनुपपन्न ठहरते हैं । विकल्प के आकारों में जो परस्पर भेद है, उस भेद के अज्ञान से उनमें जिस एकत्व का आरोप होता है, उसे ही भिक्षुगण 'सामान्य' कहते हैं । इस प्रसङ्ग में सिद्धान्तियों का पूछना है कि-(१) आकारों के भेद का जो अग्रह क्या वही अभेद (एकत्व) का आरोप है ? या (२) अभेद के ग्रहण को ही अभेद का आरोप कहते हैं ? (१) इनमें यदि प्रथम पक्ष मानें तो जिन व्यक्तियों में परस्पर भेद निश्चित है, उन दोनों में भी अभेद व्यवहार की आपत्ति होगी । दूसरी बात यह है कि, जिस प्रकार विकल्प के आकारों में भेद का ज्ञान नहीं होता है, उसी प्रकार उन आकारों में जो अभेद है, उसका भी भान नहीं होता है । इस स्थिति में भेद के अज्ञान से अभेद के आरोप की तरह अभेद के अज्ञान से भेद का आरोप भी होगा । फिर विकल्प के आकारों में अभेद व्यवहार की कथित रीति अयुक्त हो जायेगी । (२) 'अभेद का ग्रहण ही अभेद का आरोप है' यह पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि 'आत्मवाद' में अनेक विषयों का एक द्रष्टा स्वीकृत है, अतः उस पक्ष में एक ही पुरुष विकल्पों के भेद और अभेद दोनों

७६२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- न्यायकन्दली वाऽनेकार्थदर्शी कश्चिदेकस्तथाप्येकं निमित्तमन्तरेण भिन्नेष्वाकारेषु नाभेदग्रहणमस्ति । भवद्वा गवाश्वमहिषाद्याकारेष्वपि भेदाविशेषात् । गवाकारेष्वप्यगोव्यावृत्तिरेकं निमित्त- मस्तीति चेत् ? के पुनरगावो यद्व्यावृत्त्या गवाकारेष्वेकत्वमारोप्यते ? ये गावो न भवन्ति तेऽगाव इति चेत् ? गावः के ? ते येऽगावो न भवन्तीति चेत् ? गवाश्व- स्वरूपे निरूपिते तद्व्यावृत्तत्वेनागवां स्वरूपं निरूप्यते, अगवां स्वरूपे निरूपिते तद्व्यावृत्त्या गवां स्वरूपनिरूपणमित्येकाप्रतिपत्तावितराप्रतिपत्तेरुभयाप्रतिपत्तिः । यथाह तत्रभवान्- 1सिद्धश्च गौरपोह्येत गोनिषेधात्मकश्च सः । को क्रमशः समझ सकता है । किन्तु 'नैरात्म्यवाद' में अनेक वस्तुओं को देखनेवाला कोई एक पुरुष स्वीकृत नहीं है; क्योंकि विकल्प केवल अपने-अपने आकार मात्र में पर्यवसित हैं । अनेक वस्तुओं के एक द्रष्टा को यदि स्वीकार भी कर लें, फिर भी अनेक वस्तुओं में अभेद की प्रतीति तब तक नहीं हो सकती, जब तक उन अनेक वस्तुओं में रहनेवाले किसी एक निमित्त को न मान लिया जाय । बिना एक किसी पदार्थ को माने भी यदि उक्त अभेद की प्रतीति मानें तो गो, महिष प्रभृति आकारों में भी उक्त एकत्व की प्रतीति होगी; क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । (प्र.) गो के सभी आकारों में 'अगोव्यावृत्ति' (गोभिन्नभिन्नत्व) रूप एक धर्म के रहने से सभी गोव्यक्तियों में एकत्व का आरोप होता है ? (उ.) 'अगो' शब्द से कौन सब वस्तुएँ अभिप्रेत हैं, जिनकी व्यावृत्ति के कारण सभी गो व्यक्तियों में एकत्व का आरोप करते हैं ? (प्र.) गायों से भिन्न जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे ही प्रकृति में 'अगो' शब्द से अभिप्रेत हैं ? (उ.) गो कौन-सी वस्तु है ? यदि यह कहें कि (प्र.) वे ही गो हैं, जो गोभिन्न वस्तुओं से भिन्न हैं (उ.) तो फिर गो, अश्व प्रभृति वस्तुओं का स्वरूप जब ज्ञात होगा, तब तद्भिन्नत्वरूप से 'गो' के स्वरूप का निर्णय होगा । एवं 'अगो' के स्वरूप का जब निर्णय होगा, तब उनकी व्यावृत्ति से गो के स्वरूप का निर्णय होगा । इस प्रकार इस (अपोहवाद के) पक्ष में एक के बिना दूसरे की प्रतिपत्ति न होने के कारण फलतः 'गो' और 'अगो' दोनों का ज्ञान ही असम्भव होगा । जैसा कि इस प्रसङ्ग में 'तत्रभवान्' कुमारिलभट्ट ने कहा है कि-(किसी प्रमाण के द्वारा) सिद्ध 'अगो' से ही सभी गोव्यक्ति में व्यावृत्ति बुद्धि उत्पन्न हो सकती है; किन्तु 'अगो' वस्तुतः गो का निषेध रूप है; किन्तु यह निर्वचन करना पड़ेगा कि 'अगो' शब्द में प्रयुक्त 'नञ्' के द्वारा जिसका निषेध किया जाता है, वह 'गो' पदार्थ क्या है ?

  1. यह पद्य श्लोकवार्तिक का है । मुद्रित न्यायकन्दली में इसका पाठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६३ न्यायकन्दली तत्र गौरेव वक्तव्यो नञा यः प्रतिषिध्यते । गव्यसिद्धे त्यगौर्नास्ति तदभावे तु गौः कुतः ॥ इति । अथान्यापोहः शब्दार्थोऽनारोपितबाह्यत्वम् ? तत्राप्युच्यते, कोऽयमपोहो नाम ? किम- गोरपोहो भावोऽभावो वा ? यदि भावः, स किं गोपिण्डस्वभावोऽथागोपिण्डात्मकः ? गोपिण्डात्मकत्वे तावदस्यासाधारणता, न चासाधारणात्मकेऽर्थे शब्दप्रवृत्तिरित्युक्तम् । अगोपिण्डात्मकत्वेऽप्ययमेव दोषो दूषणान्तरं चैतदधिकम् । यद् गोशब्दस्य गौरित्ययमर्थो न प्राप्नोति । यदि तु पिण्डव्यतिरिक्तमनेकसाधारणं वस्तुभूतमपोहतत्त्वमिष्यते ? शब्दमात्र- विषया विप्रतिपत्तिः । अथापोहोऽन्यव्यावृत्तिरूपत्वादभावस्वभाव इष्यते ? तदास्य प्रत्ययत्वेन ग्रहणं न स्यात्, ज्ञानजनकस्यैव ग्राह्यलक्षणत्वात् । अभावस्य च समस्तार्थक्रियाविरहलक्षण- (फलतः) गो की सिद्धि के बिना 'अगो' की सत्ता सिद्ध नहीं की जा सकती । एवं 'अगो' की सिद्धि के बिना (तद्व्यावृत्ति-बुद्धि के विषय) गो की सत्ता ही किस प्रकार सिद्ध की जा सकती है ? (प्र.) अपोह शब्द के द्वारा आरोपित बाह्यत्व से भिन्न किसी ऐसे अर्थ का बोध होता है, जिसका बाह्यत्व रूप से आरोप न हो । (उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि 'अगो' का यह 'अपोह' कौन-सी वस्तु है ? भाव रूप है? अथवा अभाव रूप है? यदि 'भाव रूप है' तो फिर इस प्रसङ्ग में पूछना है कि (यह भावरूप अपोह) गोव्यक्ति स्वभाव का है? अथवा 'अगो' व्यक्तियों के स्वभाव का है? यदि उसे 'गोव्यक्ति' स्वरूप मानें, तो यह अपोह 'असाधारण' (एकमात्र पुरुषग्राह्य) होगा । पहले कह चुके हैं कि असाधारण अर्थ में शब्द की प्रवृत्ति नहीं होती है । यदि 'अगो' पिण्ड स्वरूप मानें तो फिर उक्त असाधारण्य रूप दोष तो है ही, यह दोष और अधिक है कि 'गो' शब्द से 'गो'रूप अर्थ का ग्रहण नहीं होगा । यदि सभी गोपिण्डों में रहनेवाला अथ च गोपिण्डों से भिन्न कोई 'भाव' पदार्थ ही 'अपोह' हो तो फिर हम दोनों का विवाद 'सामान्य' शब्द और 'अपोह' शब्द के प्रसङ्ग में ही रह जायेगा । यदि अपोह को अन्यव्यावृत्तिरूप होने के कारण अभावरूप मानें तो फिर विज्ञानत्वरूप से उसका ग्रहण न हो सकेगा; क्योंकि विज्ञान वही है जो किसी ज्ञान का जनक हो । किसी भी अर्थक्रिया के सामर्थ्य से शून्य को ही 'अभाव' कहते हैं । इस प्रकार अभावरूप अपोह में किसी शब्द की प्रवृत्ति ही नहीं होगी । (अपोह में शब्दों की प्रवृत्ति मान लेने पर भी) श्रोता को उस शब्द 'सिद्धश्च गौरपोहेत' इस प्रकार है । किन्तु विषयविवेचन की दृष्टि से 'सिद्धश्चागौरपोहेत' ऐसा पाठ उचित है । चौखम्भा से मुद्रित श्लोकवार्त्तिक में ऐसा ही पाठ है भी । तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।

७६४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- न्यायकन्दली त्यात् । न च प्रत्यक्षागृहीतेऽर्थे सङ्केतग्रहणमस्तीत्यभावे शब्दस्याप्रवृत्तिरेव । न च तस्मिन् प्रतीयमाने श्रोतुरर्थविषया प्रवृत्तिः स्यात्, भावाभावयोरन्त्यादसम्बन्धाच्च । स्वलक्षणात्मकत्वेनाभावप्रतीतावविवेकेन स्वलक्षणे प्रवृत्तिरिति चेत् ? १दृश्य- विकल्प्यावर्थावेकीकृत्यात्तत्संन्निवेशिभ्यो भ्रान्त्या प्रतिपत्तिः प्रतिपत्तृणामिति । तदयुक्तम् । अप्रतीते तदात्मकतया अभावसमारोपानुपपत्तेः । न च श्रोतुस्तदानीमर्थप्रतिपत्तिरस्ति शब्द- स्यातद्विषयत्वात् प्रमाणान्तरस्याभावात् । अस्ति च शब्दार्थे प्रवृत्तिस्तस्मान्नाभावोऽपि शब्दार्थः । न चान्यदेकं निमित्तं किञ्चिदस्ति । सर्वमिदमर्थजातं परस्परव्यावृत्तं प्रतिक्षणम- पूर्वमपूर्वमनुभूयमानं न शब्दात् प्रतीयते । नापि प्रत्यक्षाप्रतीतमपि हानोपादानविषयो भवेत्, अपरिज्ञातसामर्थ्यात् । अस्ति च शब्दो व्यवहारः, अस्ति च प्राण- से किसी भी भावार्थ में प्रवृत्ति नहीं होगी; क्योंकि (घटादि) भाव और उनमें रहनेवाला (अपोहरूप) अभाव दोनों भिन्न हैं । एवं परस्पर विरोधी होने से अपोह एवं घटादि पदार्थ दोनों का सम्बन्ध भी सम्भव नहीं है । (प्र.) घटादि की स्वलक्षणा प्रतीति और अपोह की प्रतीति दोनों में भेद-बुद्धि न रहने के कारण (अपोह के वाचक घटादि शब्दों से घटादिविषयक) प्रवृत्तियाँ होती हैं । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि- 'दृश्य अर्थ और समारोपित अर्थ जो वस्तुतः परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं, उन दोनों को एक समझकर ही सुननेवाले की तद्विषयक प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । (उ.) किन्तु यह कहना भी अयुक्त है । अज्ञात वस्तु (भाव) में अभिन्न रूप से अभाव (अपोह) का आरोप भी नहीं किया जा सकता । उस समय (शब्द को सुनने के बाद) श्रोता को अर्थ का ज्ञान नहीं है; क्योंकि शब्द प्रामाणिक (गवादि) अर्थों का बोधक प्रमाण नहीं है । एवं उस समय शब्द को छोड़ दूसरा प्रमाण उपस्थित भी नहीं है; किन्तु शब्द से (घटादि) अर्थों में प्रवृत्ति होती है । अतः (घटादि शब्दों के घटत्वादि रूप से घटादि भाव ही अर्थ हैं, अपोह रूप से) अभाव नहीं । (घटत्वादि) सामग्रियों को छोड़कर शब्दों का कोई एक (प्रवृत्ति) निमित्त नहीं है । यह कहना भी सम्भव नहीं है कि जितने भी अर्थ उत्पन्न होते हैं वे सभी परस्पर भिन्न हैं और प्रतिक्षण नये-नये ही उत्पन्न होते हैं और उन्हीं अर्थों का शब्द से अनुभव होता है । एवं (सामान्य के न मानने पर) प्रत्यक्ष के द्वारा अज्ञात व्यक्तियों में प्रवृत्ति और निवृत्ति नहीं होगी, (किन्तु प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात व्यक्ति के सजातीय) उन

  1. यहाँ मुद्रित पाठ को यथावत् मानना उचित नहीं जान पड़ता । अतः "दृश्यविकल्प्यौ" इसके पहले 'यथोक्तम्' इतना अधिक जोड़कर एवं 'प्रतिपत्तिः' इसके स्थान में 'प्रवृत्तिः' ऐसा पाठ मानकर अनुवाद किया गया है । ये दोनों ही पाठभेद नीचे के पाठभेदों में भी मुद्रित हैं ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६५ ॥ अथ विशेषपदार्थनिरूपणम् ॥ प्रशस्तपादभाष्यम् अन्तेषु भवा अन्त्याः, स्वाश्रयविशेषकत्वाद् विशेषाः । 'अन्त' में अर्थात् नित्य द्रव्यों में रहने के कारण इसको 'अन्त्य' कहते हैं । एवं अपने आश्रय को अपने से भिन्न पदार्थों से अलग रूप में न्यायकन्दली भृन्मात्रानुवर्तिनी प्रत्यक्षपूर्विका हिताहितप्राप्तिपरिहारार्था लोकयात्रा । सैव च भिन्नासु व्यक्तिषु सामान्यमेकं व्यवस्थापयति । यद्विषयाः शब्दात् प्रत्ययाः प्रवृत्तयश्चोपलभ्यन्ते, तज्जातीयत्वेन तदर्थक्रियोपयोग्यतां विनिश्चित्यापूर्वावगतेऽप्यर्थे लोकः प्रवर्तत इति । भिन्नेष्वनुगताकारा बुद्धिर्जातिर्निबन्धना । अस्या अभावे नैवेयं लोकयात्रा प्रवर्तते ॥ इति । ॥ इति भट्टश्रीश्रीधरविरचितायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां सामान्यपदार्थः समाप्तः ॥ • अप्रत्यक्ष व्यक्तियों में भी प्रवृत्ति और निवृत्त होती है; किन्तु प्रत्यक्ष के द्वारा अज्ञात अर्थ का शब्द से व्यवहार होता है एवं सभी प्राणियों में प्रत्यक्ष से होनेवाली हित की प्राप्ति के लिए प्रवृत्ति और अहित की निवृत्ति से ही 'लोकयात्रा' का निर्वाह देखा जाता है । यह 'लोकयात्रा' ही भिन्न व्यक्तियों में एक जाति को सिद्ध करती है । (लोकयात्रा के निर्वाह में सामान्य की उपयोगिता इस प्रकार है कि) जिस शब्द से जिस विषय को समझकर प्रवृत्ति होती है, उस जाति के और व्यक्तियों में भी केवल उस जाति के होने के नाते ही उस कार्य की क्षमता का बोध हो जाता है । इससे प्रथमतः ज्ञात उस जाति के दूसरे विषयों में भी लोक प्रवृत्त होता है । तस्मात्- भिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति जाति से ही होती है । अतः इसके न मानने पर 'लोकयात्रा' का निर्वाह न हो सकेगा । ॥ भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित पदार्थों के बोध को उत्पन्न करने वाली न्यायकन्दली टीका का सामान्य-निरूपण समाप्त हुआ ॥ • न्यायकन्दली चतुर्युग-चतुर्विद्या-चतुर्वर्ण-विधायिने । नमः पञ्चत्वशून्याय चतुर्मुखभृते सदा ॥ सत्यादि चारों युगों, आन्वीक्षिकी प्रभृति चारों विद्याओं, ब्राह्मणादि चारों वर्णों की रचना करनेवाले और स्वयं चार मुखवाले ब्रह्मा जी को प्रणाम करता हूँ, जो इस प्रकार चतुष्ट्व संख्याओं से युक्त होने के कारण 'पञ्चत्व' शून्य हैं (अर्थात् मृत्यु से रहित हैं ) । 'अन्तेषु भवा अन्त्याः' यह वाक्य विशेष पदार्थ की व्याख्या के लिए लिखा गया है।

७६६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ विशेषनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् विनाशारम्भरहितेषु नित्यद्रव्येष्वण्वाकाशकालदिगात्ममनस्सु प्रतिद्रव्य- मेकैकशो वर्तमाना अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतवः । यथास्मदादीनां समझने के कारण इसे 'विशेष' कहते हैं । सभी प्रकार के परमाणु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन ये सभी द्रव्य यतः उत्पत्ति और विनाश से रहित हैं, अतः इन सबों में 'विशेष' की सत्ता माननी पड़ती है; क्योंकि इनमें से प्रत्येक को अपने सजातीयों और विजातीयों से भिन्न रूप में विशेषव्याख्यानार्थमाह—अन्तेषु भवा अन्त्या इति । उत्पादविनाशयोरन्तेऽवस्थितत्वा- दन्तशब्दवाच्यानि नित्यद्रव्याणि, तेषु भवाः स्थिता इत्यर्थः । स्वाश्रयस्य सर्वतो विशेषकत्वाद् भेदकत्वाद् विशेषाः । एतद् विवृणोति—विनाशारम्भरहितेष्वित्यादिना । विनाशारम्भरहितेष्वित्यन्त्यपदस्य विवरणम् । अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतव इति च स्वाश्रयस्य विशेषकत्वादित्यस्य विवरणम् । प्रतिद्रव्यमेकैकशो वर्तमाना इति । द्रव्यं द्रव्यं प्रत्येकैको विशेषो वर्तत इत्यर्थः । एकेनैव विशेषेण स्वाश्रयस्य व्यावृत्तिसिद्धेरनेक- विशेषकल्पनावैयर्थ्यात् । यथा चेदं विशेषाणां लक्षणं भवति तथा पूर्वं व्याख्यातम् । 'सिद्धे विशेषसद्भावे तेषां लक्षणाविधानं युक्तं नासिद्धे' इत्याशङ्क्य विशेषाणां सद्भावं प्रतिपादयितुं ग्रन्थमवतारयति— यथेत्यादिना । यथा ('अन्तेषु भवा अन्त्याः' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न 'अन्त्य' शब्द में जो) 'अन्त' शब्द है, उससे नित्यद्रव्य अभिप्रेत हैं; क्योंकि वे उत्पत्ति और विनाश के अन्त में रहते हैं । 'तेषु भवा अन्त्याः' अर्थात् विशेष नित्य द्रव्यों में ही रहते हैं । इसका 'विशेष' नाम इस अभिप्राय से रक्खा गया है कि यह अपने आश्रय को और सभी वस्तुओं से अलग करता है । 'विशेष' पद का यही विवरण 'विनाशारम्भरहितेषु' इत्यादि से दिया गया है । उक्त वाक्य का 'विनाशारम्भरहितेषु' यह अंश 'अन्त्य' पद का विवरण है और 'अत्यन्तव्यावृत्तिहेतवः' यह अंश 'स्वाश्रयस्य विशेषकत्वात्' इस वाक्य का विवरण है । 'प्रतिद्रव्यमेकैकशो वर्तमानाः' अर्थात् प्रत्येक (नित्य) द्रव्य में एक-एक विशेष है । एक नित्य द्रव्य में एक ही विशेष पदार्थ की कल्पना करते हैं; क्योंकि एक ही विशेष को स्वीकार कर लेने से ही उसके आश्रय द्रव्य में और सभी पदार्थों की व्यावृत्ति बुद्धि उत्पन्न हो जाएगी । अतः एक द्रव्य में अनेक विशेषों की कल्पना व्यर्थ है । 'अन्यद्रव्यवृत्तयो व्यावर्तका विशेषाः' विशेष का यह लक्षण जिस प्रकार उपपन्न होता है, इसका विवरण पहले ही दे चुका हूँ । पहले विशेष पदार्थ की स्वतन्त्र सत्ता में प्रमाण दिखला कर बाद में उसका लक्षण कहना उचित है, उससे पहले नहीं। अतः विशेष पदार्थ सत्ता में प्रमाण दिखलाने के लिए ही 'यथा' इत्यादि सन्दर्भ का अवतार हुआ है । अभिप्राय यह है कि

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७६७ प्रशस्तपादभाष्यम् गवादिष्वश्वादिभ्यस्तुल्याकृतिगुणक्रियावयवसंयोगनिमित्ता प्रत्ययव्या- वृत्तिर्दृष्टा, गौः शुक्लः शीघ्रगतिः पीनककुद्मान् महाघण्ट इति । तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां नित्येषु तुल्याकृतिगुणक्रियेषु समझानेवाला (अत्यन्त व्यावृत्ति-बुद्धि का) कोई दूसरा कारण नहीं है । जिस प्रकार हम साधारण जनों को गो में अश्व से कुछ सादृश्य के रहते हुए भी विशेष आकृति, विशेष गुण, विशेष प्रकार की क्रिया एवं अवयवों के विशेष प्रकार के संयोगों के कारण (गो में अश्व से) ये व्यावृत्तिप्रत्यय होते हैं कि 'यह गो है' (अश्व नहीं, क्योंकि यह) विशेष प्रकार का शुक्ल है, यह विशेष प्रकार से दौड़ता है या इसका ककुद् बहुत न्यायकन्दली गवादिष्वश्वादिभ्यस्तुल्याकृतिनिमित्ता गौरिति, गुणनिमित्ता शुक्ल इति, क्रियानिमित्ता शीघ्रगतिरिति, अवयवनिमित्ता पीनककुद्मानिति, संयोगनिमित्ता महाघण्ट इति, अस्म- दादीनां प्रत्ययव्यावृत्तिर्दृष्टा । तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां तुल्याकृतिगुणक्रियेषु तुल्या- कृतिषु तुल्यगुणेषु तुल्यक्रियेषु परमाणुषु मुक्तात्ममनस्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमि- त्तेभ्यः प्रत्याधारमयमस्माद् विलक्षण इति प्रत्ययव्यावृत्तिर्भवति तेऽन्त्या विशेषाः । (योगियों से भिन्न) साधारण पुरुषों को सभी गो व्यक्तियों में समान आकृति के कारण उनसे भिन्न अश्वादि सभी पदार्थों से भिन्नत्व (व्यावृत्ति) की प्रतीति होती है । एवं उसी गो में 'शुक्लः' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि शुक्लवर्ण रूप गुण के कारण होती है । उसी गो में 'यह शीघ्र चलने वाला है' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि 'शीघ्रचलन' रूप क्रिया के कारण होती है । 'इसका ककुद् बहुत स्थूल है' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि ककुद् रूप अवयव के कारण होती है एवं 'यह बड़ा घण्टावाला है' इस प्रकार की व्यावृत्तिबुद्धि घण्टा के संयोग के कारण होती है । इसी प्रकार अस्मदादि से विशेष सामर्थ्यवाले योगियों को मादृश साधारण जनों से अत्यन्त दिव्यदृष्टि रूप वैशिष्ट्य के कारण समान आकृतिवाले, समान गुणवाले एवं समान क्रियावाले परमाणुओ में, मुक्त आत्माओं में और उनके मनो में जो परस्पर व्यावृत्ति की बुद्धियाँ होती हैं, आकृति-भेद (गुणभेदादि) उनके कारण नहीं हो सकते । अतः (यह कल्पना करनी पड़ती है कि कथित परमाणु प्रभृति) प्रत्येक आधार में 'यह इससे विभिन्न प्रकार का है' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि जिन कारणों से होती है, वे ही 'विशेष' हैं ।

७६८ न्यायखण्डलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ विशेषनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् परमाणुषु मुक्तात्ममनस्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमित्तेभ्यः बड़ा है या इसके गले में बहुत बड़ा घण्टा है । इसी प्रकार हम लोगों से सर्वथा उत्कृष्ट योगियों को सभी परमाणुओं में नित्य एवं समान आकृति के रहते हुए भी 'यह परमाणु उस परमाणु से भिन्न है' इस प्रकार की व्यावृत्ति की प्रतीति जिस कारण से होती है, वही 'विशेष' है । मुक्त आत्माओं में सर्वथा न्यायकन्दली यथास्मदादीनां गवादिव्यक्तिषु प्रत्ययभेदो भवति, तथा परमाण्वादिष्वपि तद्दर्शिनां परस्परापेक्षया प्रत्ययभेदेन भवितव्यम्, व्यक्तिभेदसम्भवात् । न चास्य व्यक्तिभेद एव निमित्तम् । तदुपलम्भेऽपि स्थाण्वादिषु संशयदर्शनात् । निमित्तान्तरं च नास्ति, आकृतेर्गुणस्य क्रियायाश्च तुल्यत्वात् । न च निर्निमित्तः प्रत्ययभेदो दृष्टः, तस्माद् यदस्य निमित्तं स विशेष इति । देशविप्रकर्षेण कालविप्रकर्षेण च दृष्टाः परमाणवः कस्यचित् प्रत्यभिज्ञाविषयाः सामान्यविशेषवत्त्वाद् घटादिवत् । न च पूर्वदृष्टेऽर्थे प्रत्यभिज्ञानं विशेषावगतिमन्तरेण भवति, अतोऽस्ति तस्य निमित्तं विशेषः । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार हम जैसे साधारण जनों को गो प्रभृति व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार की प्रतीतियाँ होती हैं; क्योंकि वे व्यक्तियों परस्पर विभिन्न होती हैं । इसी प्रकार परमाणु प्रभृति व्यक्तियों में भी परस्पर भेद रहने के कारण उन्हें प्रत्यक्ष देखनेवाले योगियों की उनमें से प्रत्येक में परस्पर व्यावृत्तिबुद्धि होनी ही चाहिए । परमाणु प्रभृति में योगियों की इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण उनका परस्पर भेद नहीं हो सकता; क्योंकि स्थाणु प्रभृति में पुरुषादि का भेद उपलब्ध होने पर 'अयं स्थाणुः पुरुषो वा' इत्यादि संशय ही होते हैं । योगियों की उन व्यावृत्तिबुद्धियों का कोई दूसरा कारण उपलब्ध नहीं होता है; क्योंकि परमाणु प्रभृति की आकृति और क्रिया प्रभृति समान हैं (अतः उनसे यहाँ व्यावृत्तिबुद्धि उत्पन्न नहीं हो सकती) । बिना विशेष कारण के प्रतीतियों की विभिन्नता कहीं उपलब्ध नहीं होती । तस्मात् योगियों की उन व्यावृत्तिबुद्धियों के जो कारण हैं, वे ही 'विशेष' हैं । (इस प्रसङ्ग में यह अनुमान भी है कि) जिस प्रकार परसामान्य और विशेष (अपरसामान्य) से युक्त होने के कारण किसी व्यक्ति की प्रत्यभिज्ञा के द्वारा घटादि ज्ञात होते हैं, उसी प्रकार एवं उन्हीं हेतुओं से विभिन्न स्थानों और विभिन्न समयों में देखे गये परमाणु भी किसी की प्रत्यभिज्ञा के द्वारा ही ज्ञात होते हैं । किसी 'विशेष' ज्ञान के बिना पहले देखी हुई वस्तु का प्रत्यभिज्ञान नहीं हो सकता, अतः परमाण्वादिविषयक प्रत्यभिज्ञानों का जो असाधारण कारण है, वही 'विशेष' है ।