वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५७ न्यायकन्दली यार्थजत्वं तद्भावभावित्वान्निर्विकल्पकज्ञाने प्रतीयत इति व्यापकविरुद्धोपलब्धिः । विपक्षे यत् स्मृतिपूर्वकं तदप्रत्यक्षं यथानुमानज्ञानम्, स्मृतिपूर्वकं च सविकल्पकज्ञानमिति प्रतिप- क्षानुमानमप्यस्तीति चेत् ? प्रत्यक्षत्वं यदि क्वचिदवगतम्, तदा सविकल्पके तस्य न प्रतिषेधः, प्राप्तिपूर्वकत्वात् प्रतिषेधस्य । अथ निर्विकल्पके प्रतीतम्, तत् कथं प्रतीतम् ? इन्द्रियार्थ- तद्भावभावित्वानुमानेनेति चेत् ? तर्हि प्रत्यक्षत्वप्रसाधकस्य तद्भावभावित्वानुमानस्य प्रामाण्याभ्युपगमे सति प्रत्यक्षत्वप्रतिषेधकानुमानं प्रवृत्तं तद्विपरीतवृत्ति अश्रावणः शब्द इतिवत् तेनैव बाध्यते । एवं तावच्छब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिः कल्पना न भवतीति । अर्थसंयोजनात्मिकापि विशिष्टग्राहिणी न कल्पना, विशेषणस्य विशेष्यञ्च च तयोः सम्बन्धस्य च व्यवच्छेद्यव्यवच्छेदकभावस्य वास्तवत्वात् । अर्थावग्रहं विज्ञानम्, तदर्थेन्द्रियसन्निकर्षाद् यथाभूतोऽर्थस्तथोपजायते न त्वर्थे होती है एवं प्रत्यक्ष में नहीं होती है, उसी प्रकार और भी जिन ज्ञानों में स्मृति की अपेक्षा होगी वे प्रत्यक्ष नहीं हो सकते । सविकल्पक ज्ञान में भी (वाचक शब्द की) स्मृति अपेक्षित होती है, अतः वह भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । (उ.) जिसका प्रतिषेध सविकल्पक ज्ञान में करते हैं, वह प्रत्यक्षत्व कहीं पर ज्ञात है, या नहीं ? यदि नहीं, तो फिर सविकल्पक ज्ञान में भी उसका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिसकी कहीं सत्ता ज्ञात रहती है उसी का कहीं प्रतिषेध भी किया जाता है । यदि इसका यह उत्तर देंगे कि 'यह प्रत्यक्षत्व निर्विकल्पक ज्ञान में ही ज्ञात है' तो फिर यह पूछेंगे कि किस हेतु से आपने निर्विकल्पक ज्ञान में प्रत्यक्षत्व को समझा ? यदि उसका यह उत्तर देंगे कि 'चूँकि निर्विकल्पक ज्ञान इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न होता है' अतः प्रत्यक्ष है , तो फिर यह स्वीकृत ही हो जाता है कि 'इन्द्रियार्थजत्व हेतु से जो प्रत्यक्षत्व का अनुमान होता है, वह प्रमाण है' इसके बाद यदि कोई यह अनुमान करेगा कि 'इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न भी सविकल्पक ज्ञान प्रमाण नहीं है' तो यह 'अश्रावणः शब्द' इस अनुमान की तरह धर्मिग्राहक प्रमाण से ही बाधित हो जाएगा । अतः कल्पना 'शब्दसंयोजनात्मिका' है, इस पक्ष में भी सविकल्पक ज्ञान का प्रामाण्य खण्डित नहीं हो सकता । यदि कल्पना को अर्थ संयोजनरूप विशिष्ट विषयक ज्ञान से अभिन्न मानें, तो भी सविकल्पक ज्ञान इस प्रकार की कल्पना रूप होने पर भी प्रमाण होगा ही, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान में विशेष्य, विशेषण और दोनों का व्यवच्छेद्य-व्यवच्छेदक-भाव सम्बन्ध ये तीन वस्तुएँ भासित होतीहैं, विशिष्टज्ञान के विषय ये तीनों ही विषय वास्तव हैं, आरोपित नहीं (अतः सविकल्पक ज्ञान केवल विशिष्ट विषयक होने से ही अप्रमाण नहीं हो
४५८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली विचार्य प्रवर्तते । विशिष्टज्ञानं तु विचार इदं विशेष्यमयमनयोः सम्बन्ध एषा च लोकस्थितिः । दण्डी पुरुषो न तु पुरुषो दण्ड इति विचार्य च प्रत्येकमेतानि पश्चादेकीकृत्य गृह्णाति दण्डी पुरुष इति । यद्यर्थस्य विशिष्टता वास्तवी प्रथममेव विशिष्टज्ञानं जायेत । न भवति चेत् ? नास्य स्वरूपतो विशिष्टता, किन्तूपा- धिकृतेति विशिष्टज्ञानं कल्पनेति चेत् ? दुरुहितमिदमायुष्मता, आत्मा हि प्रत्येकं विशेषणादीन् गृहीत्वा ताननुसन्दधान इन्द्रियेणार्थस्य विशिष्टतां प्रत्येति न ज्ञानमचेतनम्, तस्य प्रतिसन्धानाशक्तेः, विरम्य व्यापाराभावाच्च । अर्थो विशेषण- सम्बन्धाद् विशिष्ट एव, विशेषणादिग्रहणस्य सहकारिणोऽभावात् । प्रथममिन्द्रियेण न तथा गृह्यते, गृहीतेषु विशेषणादिषु गृह्यत इत्यर्थेन्द्रियजं तावद्विशिष्टज्ञानम् । यदि सकता)। (प्र.) इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान में अर्थ अपने वास्तविक रूप में ही भासित होता है । किन्तु वह विचार पूर्वक अपने विषय को प्रकाशित करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता । 'यह विशेषण है, यह विशेष्य है, यह उन दोनों का सम्बन्ध है' इस प्रकार के विचार से ही तो 'विशिष्ट ज्ञान' की उत्पत्ति होती है, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान के सम्बन्ध में साधारण जनों की स्थिति इस प्रकार है कि 'दण्ड ही विशेषण है और पुरुष ही विशेष्य है, किन्तु इसके विपरीत लोक में यह व्यवहार नहीं है कि 'पुरुष ही विशेषण है और दण्ड ही विशेष्य है' इस प्रकार के विचार के बाद दण्ड, पुरुष एवं दोनों के सम्बन्ध इन तीनों को एक ज्ञान में आरूढ कर 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि आकार की विशिष्ट प्रतीतियाँ होती हैं। ऐसी स्थिति में पुरुष की दण्डविशिष्टता अर्थात् अर्थ की विशिष्टता यदि वास्तव-वस्तु हो, तो फिर पहिले ही इन्द्रियपात होते ही 'विशिष्टबोध' की ही उत्पत्ति होती, सो नहीं होती है, अतः समझना चाहिए कि विशेषण विशिष्टता अर्थ का स्वाभाविक धर्म नहीं है, किन्तु औपाधिक धर्म है (जैसे कि जवाकुसुम संनिहित स्फटिक का लौहित्य) अतः विशिष्ट विषयक ज्ञान (अर्थात् सविकल्पक ज्ञान) प्रमा रूप नहीं है । (उ.) यह तो आप की बड़ी ही विचित्र कल्पना है, क्योंकि आत्मा पहिले विशेषणादि को जानकर फिर उनकी स्मृति की सहायता से इन्द्रिय के द्वारा अर्थ की विशिष्टता का भी अनुभव करता है । यह सब काम ज्ञान के द्वारा नहीं हो सकता; क्योंकि वह अचेतन है, एवं (क्षणिक होने के कारण) एक व्यापार के बाद दूसरे व्यापार की क्षमता भी ज्ञान में नहीं है । विशेषण से युक्त होने के कारण ही अर्थ 'विशिष्ट' कहलाता है (विशिष्ट रूप से गृहीत होने के कारण नहीं) इन्द्रिय के प्रथम सम्पात के बाद ही जो विशिष्ट बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होती है, उसका कारण है विशेषण ज्ञान रूप सहकारि कारण का अभाव । इस स्थिति में यदि विशिष्टबुद्धि रूप होने के अपराध से ही विशिष्ट ज्ञान (सविकल्पक ज्ञान)
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४५९
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४५९ प्रशस्तपादभाष्यम् मुत्पद्यते, सद् द्रव्यं पृथिवी विषाणी शुक्लो गौर्गच्छतीति । रूपरसगन्धस्पर्शेष्वनेकद्रव्यसमवायात् स्वगतविशेषात् स्वाश्रयसन्नि- इन्द्रियों के द्वारा रूप, रस, गन्ध और स्पर्श विषयक प्रत्यक्ष के उत्पादन के लिए इनमें से प्रत्येक के लिए नियमित चक्षुरादि तत्तत् इन्द्रिय, अनेक अवयवों से बने हुए द्रव्य में समवाय, रूपादि प्रत्येक में रहने- वाले रूपत्वादि असाधारण धर्म, एवं कथित रूपादि विषयों के आश्रयीभूत न्यायकन्दली विशिष्टज्ञानतयोदयादपरोक्षं न भवति, दुःसमाधेयमित्युपरम्यते । रूपादिषु प्रत्यक्षोत्पत्तिकारणमाह-रूपरसेत्यादि । अनेकेष्ववयवेषु समवेतं द्रव्यमनेक- द्रव्यम्, तत्र समवायात्। स्वगतो विशेषो रूपे रूपत्वं रसे रसत्वं गन्धे गन्धत्वं स्पर्शे स्पर्शत्वं तस्मात् स्वाश्रयसन्निकर्षाद् रूपादीनां य आश्रयस्तस्य ग्राहकैरिन्द्रियैः सन्निकर्षान्नियतेन्द्रियनिमित्तं चक्षुर्निमित्तं रूपे, रसननिमित्तं रसे, घ्राणनिमित्तं गन्धे, त्वगिन्द्रियनिमित्तं स्पर्शे ज्ञानमुत्पद्यते । प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, तो फिर इस प्रश्न का समाधान कठिन है, अतः हम इससे विरत होते हैं । 'रूपरस' इत्यादि पङ्क्ति के द्वारा रूपादि विषयों के प्रत्यक्ष के कारण कहे गये हैं । (इस वाक्य के 'अनेकद्रव्यसमवायात्' इस पद का) 'अनेकेष्ववयवेषु समवेतं द्रव्यमनेकद्रव्यं तत्र समवायात्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अनेक अवयवों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला (द्रव्य ही 'अनेकद्रव्य' शब्द का) अर्थ है, उसमें रूपादि का समवाय रूपादि के प्रत्यक्ष का कारण है । (अर्थात् कथित 'अनेकद्रव्य' में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले रूपादि का ही प्रत्यक्ष होता है, अन्य रूपादि का नहीं) रूप में रूपत्व, रस में रसत्व, गन्ध में गन्धत्व और स्पर्श में स्पर्शत्व ही प्रकृत 'स्वगतविशेष' शब्द से अभिप्रेत हैं, ये भी क्रमशः रूपादि प्रत्यक्ष के कारण हैं । 'स्वाश्रयसन्निकर्ष' से अर्थात् रूपादि के जो आश्रयद्रव्य हैं, उनका अपने-अपने ग्राहक इन्द्रियों के साथ जो संनिकर्ष (उससे रूपादि का) 'नियतेन्द्रियनिमित्त' अर्थात् रूप में चक्षु स्वरूप निमित्त से, रस में रसनेन्द्रिय निमित्त से, गन्ध में घ्राण रूप निमित्त से, एवं स्पर्श में त्वक् रूप निमित्त से प्रत्यक्ष की उत्पत्ति होती है । चूँकि 'स्वगतविशेष' अर्थात् रूपत्वादि धर्म भी क्रमशः रूपादि प्रत्यक्ष के कारण हैं, अतः (रूप का प्रत्यक्ष चक्षु से ही हो, रस का प्रत्यक्ष रसनेन्द्रिय से ही हो इत्यादि प्रकार की) व्यवस्थायें उपपन्न होती हैं । ऐसा न मानने पर कोई व्यव- च्छेदक न रहने के कारण इन्द्रियों के साङ्कर्य की आपत्ति होगी । 'शब्दस्य त्रय-
४६० न्याय्कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- प्रशस्तपादभाष्यम् कर्षाश्रियतेन्द्रियनिमित्तमुत्पद्यते । शब्दस्य त्रयसन्निकर्षाच्छ्रोत्रसमवेतस्य तेनै- वोपलब्धिः । संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वस्नेह- तत्तत् द्रव्य में चक्षुरादि तत्तद् इन्द्रिय का सन्निकर्ष, इन तीन कारणों की और अपेक्षा होती है । श्रोत्र (रूप आकाश) में रहनेवाले शब्द का ही श्रोत्र रूप इन्द्रिय से प्रत्यक्ष होता है (किन्तु) इसमें आत्मा, मन और श्रोत्र रूप इन्द्रिय इन तीनों के (दो) सन्निकर्षों की भी अपेक्षा होती है (रूपादि प्रत्यक्ष में कथित आत्मादि चार वस्तुओं के तीन सन्निकर्षों की नहीं) । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, स्नेह, न्यायकन्दली स्वगतविशेषाणां हेतुत्वाद् रूपादिष्विन्द्रियव्यवस्था, अन्यथा परिप्लवः स्याद् विशेषा- भावात् । शब्दस्य त्रयसन्निकर्षाच्छ्रोत्रसमवेतस्य तेनैवोपलब्धिः । त्रयसन्निकर्षादिति आत्ममन इन्द्रियाणां सन्निकर्षो दर्शितः । इन्द्रियार्थसन्निकर्षः श्रोत्रसमवेतस्येत्यनेनोक्तः । तेनैवोपलब्धिरिति । श्रोत्रेणैवोपलब्धिरित्यर्थः । संख्यादीनां कर्मान्तानां प्रत्यक्षद्रव्यसमवेता- नामाश्नयवच्चक्षुःस्पर्शनाभ्यां ग्रहणम् । कर्मप्रत्यक्षमिति न मृष्यामहे, गच्छति द्रव्ये संयोगविभागातिरिक्तपदार्था- न्तरानुपलब्धेः । यस्त्वयं चलतीति प्रत्ययः, स संयोगविभागानुमितक्रियालम्बन इति । तदसारम्, यदि कर्माप्रत्यक्षं विभागसंयोगाभ्यामनुमीयते, तदा विभाग- संयोगयोरुभयवृत्तित्वादाश्रयान्तरेऽपि कर्मानुमीयेत । न च मूलादग्रमग्राच्च मूलं गच्छति शाखामृगे तरावप्यनारतसंयोगविभागाधिकरणे चलतीति प्रत्यय उदयते । सन्निकर्षात्' इत्यादि वाक्य के 'त्रयसन्निकर्षात्' इस पद के द्वारा आत्मा, मन और इन्द्रियों के सन्निकर्ष (प्रत्यक्ष के कारण रूप में) दिखलाये गये हैं । एवं 'श्रोत्रसमवेतस्य' इस पद के द्वारा (शब्द प्रत्यक्ष के कारणीभूत) इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष दिखलाया गया है । 'तेनैवोपलब्धिः' अर्थात् श्रोत्र में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले शब्द का श्रोत्रेन्द्रिय से ही प्रत्यक्ष होता है । प्रत्यक्ष के विषय द्रव्यों में रहनेवाले 'संख्यादीनां कर्मान्तानाम्' अर्थात् संख्या से लेकर कर्मपर्यन्त (संख्या परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, स्नेह, द्रवत्व, वेग और कर्म इन ग्यारह वस्तुओं का) चक्षु और त्वचा इन दोनों इन्द्रियों से ग्रहण होता है । (प्र.) हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि कर्म का भी प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि द्रव्य के चलने पर (उत्तर देश के साथ) संयोग और (पूर्व देश से) विभाग इन दोनों से भिन्न किसी वस्तु की प्रतीति द्रव्य में नहीं होती है । द्रव्य में जो 'चलति' इस प्रकार की
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६१ न्यायकन्दली यदि मतं योऽयं तरुमृगस्याकाशादिनापि संयोगस्तस्य तरुसमवेतात् कर्मणो निष्पत्त्यनव- कल्पनान्न तरौ कर्मानुमानमिति कल्प्यताम् ? तर्हि देशान्तरसंयोगार्थं तरुमृगेऽपि कर्मान्त- रम्, तरौ तु कर्मकल्पना न निवर्तत एव । यदधिकरणं कार्यं तदधिकरणं कारणमित्युत्सर्ग- स्तस्यैकत्र व्यभिचारेऽन्यत्र क आश्वासः ? शाखामृगसमवेतेन कर्मणा कल्पितेन शाखामृगस्य तरुणा देशान्तरेणापि समं संयोगविभागयोरुत्पत्तेरुभयकर्मकल्पनानुपयोग इति चेत् ? नैवम्, प्रतिबद्धं हि लिङ्गं यत्रोपलभ्यते तत्र प्रतिबन्धकमुपस्थापयतीत्येतावत्येवानुमानस्य सामग्री। प्रतीति होती है, वह कर्म विषयक अनुमिति रूप है, जिसकी उत्पत्ति उक्त संयोग और विभाग रूप हेतुओं से होती है । (उ.) उक्त कथन में कुछ सार नहीं है, क्योंकि यदि कर्म का प्रत्यक्ष नहीं होता है एवं संयोग और विभाग से उसका अनुमान ही होता है तो फिर (संयोग और विभाग तो उभयाश्रयी हैं) अतः उनके दूसरे आश्रयों (पूर्वदेश और उत्तर देशों) में भी कर्म की अनुमिति होनी चाहिए (सो नहीं होती है), किन्तु वृक्ष में जिस समय मूलभाग से अग्रभाग की तरफ और अग्रभाग से मूलभाग की तरफ बन्दर दौड़ लगाता रहता है, उस समय (संयोग और विभाग के दूसरे आश्रय) वृक्ष में 'चलति' यह प्रतीति भी नहीं होती । यदि यह कहें कि (वृक्ष के साथ संयुक्त) बन्दर का आकाशादि द्रव्यों के साथ भी तो संयोग है, सुतराम् वृक्ष में रहनेवाली क्रिया से उस संयोग की उत्पत्ति नहीं हो सकती, अतः वृक्ष में क्रिया का अनुमान नहीं हो सकता । (प्र.) तो फिर आकाशादि दूसरे देशों के साथ वानर के संयोग और विभाग के लिए बन्दर में ही (वृक्ष में कपि के संयोगादि के उत्पादक कर्म से भिन्न) दूसरे कर्म की ही कल्पना कीजिए, (उ.) इससे तो वृक्ष में क्रिया के अनुमान की निवृत्ति नहीं हो सकती । यह औत्सर्गिक नियम है कि कार्य के आश्रय में कारण को अवश्य ही रहना चाहिए । इस नियम में यदि यहाँ व्यभिचार हो (अर्थात् कार्य के अधिकरण में कारण के न रहने पर या अन्यत्र रहने पर भी उस अधिकरण में कार्य की उत्पत्ति हो) तो फिर दूसरे स्थानों में (कार्य के अधिकरण में कारण के नियमतः रहने के नियम में) कौन सा विश्वास रह जाएगा ? (प्र.) वानर में समवाय सम्बन्ध से अनुमित होनेवाली क्रिया के द्वारा ही वानर का वृक्ष के साथ एवं आकाशादि दूसरे देशों के साथ भी संयोग और विभाग दोनों की उत्पत्ति हो सकती है, अतः वानर में (वृक्षगत संयोगादिजनक एवं आकाशादिगत संयोगादि के जनक) दो क्रियाओं की कल्पना का कोई उपयोग नहीं है । (उ.) ऐसी बात नहीं हो सकती, क्योंकि प्रतिबद्ध (अर्थात् साध्य की व्याप्ति से युक्त) जिस हेतु की उपलब्धि जिस पक्ष में होती है, उस पक्ष में वह हेतु 'प्रतिबन्धक' को (अर्थात् जिसका प्रतिबन्ध हेतु में है उस साध्य को) अवश्य ही उपस्थित करेगा । उसमें साध्य की दूसरे प्रकार से उत्पत्ति के द्वारा
४६२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली तस्यार्थापत्तिवदन्यथोपपत्या कः परिभवः, न चेदं पुरुष इव चेतनं यत् प्रयोजनानुरोधात् प्रवर्त्तते । यदि त्वेकस्य व्योमप्रदेशस्य संयोगविभागाः क्रियानुमितिहेतवः कल्प्यन्ते ? न शक्यं कल्पयितुम्, अतीन्द्रियव्योमाश्रयाणां विभागसंयोगानामप्रत्यक्षत्वात् । भूगोलकप्रदेशविभाग- संयोगसन्तानानुमेयत्वे गच्छतो वियति विहङ्गमस्य कर्म दुरधिगमं स्यात् । वियद्वित- तालोकनिवहविभागसंयोगप्रवाहो यदि तस्य लिङ्गमिष्यते ? अनिच्छतोऽप्यन्धकारे वायु- दोषादेकस्मादुपजातायतकम्पस्य भुजाग्रं मे कम्पते भ्रूश्चलतीत्यदृष्टान्तःकरणाधिष्ठित- त्वगिन्द्रियजा कर्मबुद्धिरनिबन्धना स्यात् । रात्रौ महामेघान्धकारे क्षणमात्रस्थायिन्यां विद्युति चलतीति प्रत्ययस्य का गतिः ? बुद्धीत्यादि । आत्मसमवेतानां संयुक्तसमवायाद् ग्रहणम् । भावेति । कौन सी बाधा आएगी ? जैसे कि अर्थापत्ति में साध्य की अन्यथा उपपत्ति के द्वारा बाधा आती है । क्योंकि पुरुष की तरह प्रमाण चेतन तो है नहीं कि वह प्रयोजन के अनुसार काम करेगा (अचेतन वस्तु तो स्वभाव के अनुसार ही काम कर सकती है, अतः साध्य की व्याप्ति से युक्त हेतु पक्ष में साध्य को अवश्य ही उपस्थित करेगा, चाहे उस साध्य की उस पक्ष में दूसरे प्रकार से भी उपपत्ति सम्भव हो ) । यदि आकाश प्रदेश के संयोगों और विभागों को ही सभी क्रियाओं की अनुमिति का कारण मानें (तो कदाचित् उपपत्ति हो सकती है, क्योंकि सभी मूर्त द्रव्यों का संयोग और विभाग आकाशादि नित्यद्रव्यों के साथ अवश्य रहता है) । किन्तु यह कल्पना सम्भव नहीं है । यदि यह कहें कि (प्र.) आकाशादि अतीन्द्रिय हैं, अतः उनमें रहनेवाले संयोग और विभाग भी अतीन्द्रिय ही होंगे, अतः उनके द्वारा कर्म का अनुमान यद्यपि नहीं हो सकता, फिर भी भूगोलक में विद्यमान संयोग और विभाग को ही कर्म का अनुमापक लिङ्ग मान सकते हैं (इससे कर्म की अनुमिति उपपन्न होगी)। (उ.) इस हेतु के द्वारा आकाश में उड़ते हुए पक्षियों में विद्यमान क्रिया की अनुमिति न हो सकेगी, जिससे उक्त पक्षियों की क्रियाओं का ज्ञान ही कठिन हो जाएगा । यदि आकाश में फैले हुए आलोक रूप तेज (द्रव्य) में रहनेवाले संयोग को पक्षियों में रहनेवाले कर्म का अनुमापक हेतु मानेंगे तो भी रात में विना इच्छा के भी वायु के दोष से उत्पन्न होनेवाले कम्प रूप कर्म की 'भुजाग्रं मे कम्पते, भ्रूश्चलति' इत्यादि आकार की जितनी भी प्रतीतियाँ अदृष्ट एवं अन्तःकरण (मन) से अधिष्ठित त्वगिन्द्रिय से (प्रत्यक्ष रूप) उत्पन्न होती हैं, उनको विना कारण के ही स्वीकार करना पड़ेगा । एवं रात को बादल घिर जाने के कारण गाढ़ अन्धकार में जब बिजली कौंधती है उस समय उस क्षणिक विद्युत् में जो 'बिजली चलती है' इत्यादि आकारकी प्रतीतियाँ होती हैं उनके प्रसङ्ग में ही (कर्म को प्रत्यक्ष न माननेवाले) क्या उपाय करेंगे ? 'बुद्धि' इत्यादि पङ्क्ति का सार यह है कि आत्मा में समवाय सम्बन्ध से रहने वालों का संयुक्तसमवाय सम्बन्ध के द्वारा प्रत्यक्ष होता है । 'भाव' इत्यादि पङ्क्ति का
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६३ प्रशस्तपादभाष्यम् द्रवत्ववेगकर्मणां प्रत्यक्षद्रव्यसमवायाच्चक्षुःस्पर्शनोभ्यां ग्रहणम् । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नानां द्वयोरात्ममनसोः संयोगादुपलब्धिः । द्रवत्व, वेग और क्रिया इन ग्यारह वस्तुओं का चक्षु और त्वचा इन दोनों इन्द्रियों से ग्रहण हो सकता है, (किन्तु इनके उक्त प्रत्यक्ष के लिए) प्रत्यक्ष हो सकनेवाले द्रव्यों में इनके समवाय का रहना भी आवश्यक है (अर्थात् प्रत्यक्ष होनेवाले द्रव्य में रहनेवाले संख्यादि गुणों के ही प्रत्यक्ष हो सकते हैं, प्रत्यक्ष न होनेवाले द्रव्यों के संख्यादि के नहीं)। बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न इन छः गुणों का आत्मा और मन इन दोनों के ही न्यायकन्दली सत्ताद्रव्यत्वादीनां सामान्यानामाश्रयो येनेन्द्रियेण गृह्यते तेनैव तानि गृह्यन्ते । तत्र संयोगाद् द्रव्यग्रहणम्, संयुक्तसमवायाद् गुणादिप्रतीतिः, संयुक्तसमवेतसमवायाद् गुणत्वादि- ज्ञानम्, समवायाच्छब्दग्रहणम्, समवेतसमवायाच्छब्दत्वग्रहणम्, सम्बद्धविशेषणतया चाभाव- ग्रहणमिति षोढा सन्निकर्षः यत् संयुक्तसमवेतविशेषणत्वेन रूपे रसाभावग्रहणम्, या च संयुक्तसमवेतविशेषणविशेषणत्वेन रूपत्वे रसत्यायभावप्रतीतिः, यच्च समवेतविशेषणतया ककारे खकाराभावावगमः, यच्च समवेतसमवेतविशेषणतया गत्वे खत्वाद्यभावसंवेदनम्, तत् सर्वं सम्बद्धविशेषणभावेन संगृहीतम् । यह अभिप्राय है कि सत्ता द्रव्यत्व प्रभृति सामान्यों का प्रत्यक्ष उसी इन्द्रिय से होता है, जिससे उनके आश्रयों का प्रत्यक्ष होता है । (इन्द्रियों के निम्नलिखित छः संनिकर्ष प्रत्यक्ष के सम्पादक हैं) जिनमें (१) संयोग के द्वारा द्रव्य का प्रत्यक्ष होता है । (२) संयुक्त समवाय सम्बन्ध से गुणादि का (अर्थात् द्रव्यसमवेत वस्तुओं का) प्रत्यक्ष होता है । (३) गुणत्वादि का प्रत्यक्ष संयुक्तसमवेत-समवाय सम्बन्ध से होता है । केवल (४) समवाय सम्बन्ध से शब्द का प्रत्यक्ष होता है । (५) शब्दत्व का प्रत्यक्ष समवेतसमवाय सम्बन्ध से निष्पन्न होता है और (६) सम्बद्ध विशेषणता सम्बन्ध से अभाव का प्रत्यक्ष होता है । रूप में रसाभाव का प्रत्यक्ष 'संयुक्तसमवेत- विशेषणता' सम्बन्ध से, रूपत्व में रसत्वाभाव का प्रत्यक्ष 'संयुक्तसमवेतविशेषण (समवेत) विशेषणता सम्बन्ध से, 'क' वर्ण में 'ख' वर्ण के अभाव का प्रत्यक्ष 'समवेतविशेषणता' से, एवं गत्व में खत्वाभाव का प्रत्यक्ष 'समवेतसमवेत- विशेषणता' सम्बन्ध से होता है, ये सभी विशेषणतायें कथित 'सम्बद्धविशेषणता' शब्द के द्वारा संगृहीत होती हैं ।
४६४ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- प्रशस्तपादभाष्यम् भावद्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादीनामुपलब्धाधारसमवेतानामाश्रयग्राहकैरिन्द्रियैर्ग्रहण- मित्येतदस्मदादीनां प्रत्यक्षम् । अस्मद्विशिष्टानां तु योगिनां संयोग से प्रत्यक्ष होता है । (उन्हीं) भाव (सत्ता) द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि का प्रत्यक्ष उनके आश्रयीभूत वस्तुओं के ग्राहक इन्द्रियों से होता है, जिनके आश्रय प्रत्यक्ष के द्वारा ग्रहण के योग्य हों । न्यायकन्दली अपरे तु सर्वत्र यथासम्भवं संयोगसमवाययोरेव हेतुत्वादवान्तरसम्बन्धकल्पनां नेच्छन्ति, ईदृशो हि तेषां भावानां स्वभावो यदेषामन्यसन्निकर्षादेव ग्रहणम् । अतिप्रसङ्गश्च नास्ति, स्वाश्रयप्रत्यासत्तेर्नियामकत्वात् । उपसंहरति—एतदस्मदादीनां प्रत्यक्षमिति । अस्मदादीनामयोगिना- मित्यर्थः । योगिप्रत्यक्षमाह-अस्मद्विशिष्टानां त्विति । योगः समाधिः । स द्विविधः-सम्प्रज्ञातोऽसम्प्रज्ञातश्च । सम्प्रज्ञातो धारकेण प्रयत्नेन किसी सम्प्रदाय के लोग प्रत्यक्ष के लिए (१) संयोग और (२) समवाय इन दो ही सम्बन्ध को आवश्यक मानते हैं एवं (संयुक्त समवायादि) अवान्तर सम्बन्ध की कल्पना को निरर्थक समझते हैं, अर्थात् द्रव्य में चक्षु का जो संयोग है, उसी से द्रव्य की तरह उसमें रहनेवाले सामान्य, गुण एवं कर्मादि के भी बोध होंगे, एवं समवाय सम्बन्ध से शब्द एवं उसमें रहनेवाले शब्दत्वादि सामान्यों का भी बोध होगा । कुछ वस्तुओं का यह स्वभाव स्वीकार करेंगे कि दूसरे के साथ के सन्निकर्ष से भी उनका प्रत्यक्ष होता है । संयोग सन्निकर्ष से यदि घटत्व या घट रूप का प्रत्यक्ष हो सकता है, तो फिर उसी सम्बन्ध से शब्द का भी प्रत्यक्ष हो (क्योंकि दोनों में ही संयोग सन्निकर्ष की असत्ता समान रूप से है) इस पक्ष में उक्त अतिप्रसङ्गों की भी सम्भावना नहीं है, क्योंकि आश्रय में सन्निकर्ष का रहना नियामक होगा (अर्थात् इस पक्ष में ऐसा नियम है कि इन्द्रिय का संयोग सन्निकर्ष जिस द्रव्य के साथ रहेगा, उसमें रहनेवाले सामान्य, गुण या कर्म का ही उस संयोग सन्निकर्ष से भान होगा । शब्द के आश्रय आकाश रूप द्रव्य में चक्षु का प्रत्यक्षजनक सन्निकर्ष नहीं है । इसी प्रकार समवाय में भी समझना चाहिए) । 'एतदस्मदादीनां प्रत्यक्षम्' इस वाक्य के द्वारा (अस्मदादि के प्रत्यक्ष का) उपसंहार करते हैं । उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'अस्मदादि' शब्द का अर्थ है योगियों से भिन्न जीव । 'अस्मद्विशिष्टानाम्' इत्यादि संदर्भ के द्वारा योगियों के प्रत्यक्ष का निरूपण करते हैं । 'योग' शब्द का अर्थ है समाधि । यह योग (१) सम्प्रज्ञात और (२) असम्प्रज्ञात भेद से दो प्रकार का है । धारक प्रयत्न के द्वारा आत्मा के किसी प्रदेश में नियोजित मन का और तत्त्वज्ञान की इच्छा से युक्त आत्मा का संयोग ही 'सम्प्रज्ञातयोग' है । वश किए हुए मन का बिना किसी विशेष अभिलाषा के पहिले ही बिना विचारे हुए
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४६५
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४६५ प्रशस्तपादभाष्यम् युक्तानां योगधर्मानुगृहीतेन मनसा स्वात्मान्तराकाशादिकालपरमाणुवायुमनस्सु तत्समवेतगुणकर्मसामान्यविशेषेषु समवाये चावितथं स्वरूपदर्शनमुत्पद्यते । वियुक्तानां पुनश्चतुष्टयसन्निकर्षाद् योगधर्मानुग्रहसामर्थ्यात् सूक्ष्मव्यवहित विप्रकृष्टेषु प्रत्यक्षमुत्पद्यते । १. युक्त और २. वियुक्त भेद से योगी दो प्रकार के हैं, उनमें (हम लोग जैसे साधारण जनों से विलक्षण) 'युक्तयोगियों' को योगाभ्यास के द्वारा विशेष बलशाली मन से अपनी आत्मा, आकाश, दिक्, काल, परमाणु, वायु और मन एवं इन सबों में रहनेवाले गुण, कर्म, सामान्य, विशेष एवं समवाय प्रभृति पदार्थों के भी यथार्थस्वरूप का प्रत्यक्ष होता है । किन्तु (वियुक्त योगियों को) आत्मा, मन, इन्द्रिय और अर्थ इन (चारों के) तीन संयोग से ही योगजनित धर्मरूप विशेष बल के कारण सूक्ष्म (परमाण्वादि), व्यवहित (दीवाल प्रभृति से घिरे हुए वस्तु) और बहुत दूर की वस्तुओं का भी प्रत्यक्ष होता है । न्यायकन्दली क्वचिदात्मप्रदेशे वशीकृतस्य मनसस्तत्त्वबुभुत्साविशिष्टेनात्मना संयोगः । असम्प्रज्ञातश्च वशीकृतस्य मनसो निरभिसन्धिर्निरभ्युत्थानात् क्वचिदात्मप्रदेशे संयोगः । तत्रायमुत्तरो मुमुक्षूणामविद्यासंस्कारविलयार्थमन्त्ये जन्मनि परिपच्यते, न धर्ममुपचिनोति, अभि- सन्धिसहकारिविरहात् । नापि बाह्यं विषयमभिमुखीकरोति, आत्मन्येव परिणामात् । पूर्वस्तु योगोऽभिसन्धिसहायः प्रतनोति धर्मम् । यदर्थं तत्त्वबुभुत्साविशिष्टश्च तदर्थ- मुद्द्योतयति, इति तेन योगेन योगिनः च्युतयोगा अपि योग्यतया योगिन उच्यन्ते । न च तेषामप्रक्षीणमलावरणानां तदानीमतीन्द्रियार्थदर्शनमस्त्यत आह-युक्तानामिति । युक्तानां समाध्यवस्थितानां योगधर्मानुगृहीतेन मनसा स्वात्मनि, किसी द्रव्य के साथ संयोग ही 'असम्प्रज्ञात' योग है । इन दोनों योगों में अन्तिम योग अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि का परिपाक मुमुक्षुओं को अन्तिम जन्म में होता है, जिससे संस्कार-सहित अविद्या का विनाश हो जाता है । असम्प्रज्ञात समाधि से धर्म की उत्पत्ति नहीं होती है, क्योंकि धर्म का सहकारिकारण अभिलाषा या एषणा उस समय नहीं रहती है । उस समय किसी बाह्य विषय का भान भी नहीं होता है, क्योंकि उस समय अन्तःकरण केवल अपने स्वरूप से ही परिणत होता है । पहिला योग अर्थात् सम्प्रज्ञातयोग विषयों की अभिलाषा की सहायता से धर्म को उत्पन्न करता है, जिससे तत्त्वज्ञान की इच्छा से युक्त योगी को सभी विषय प्रतिभात होते हैं। अतः सम्प्रज्ञात समाधि से युक्त
४६६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली स्वात्मान्तरेषु स्वात्मन आत्मान्तरेषु परकीयेषु, आकाशे दिशि काले वायौ परमाणुमनस्सु तत्समवेतेषु गुणादिषु समवाये चावितथमविपर्यस्तं स्वरूपदर्शनं भवति । अस्मदादिभिरात्मा सर्वदैवाहं ममेति कर्तृत्वस्वामित्वरूपसंभिन्नः प्रतीयते, उभयं चैतच्छरीराद्युपाधिकृतं रूपं न स्वाभाविकमत एव अहं ममेति, प्रत्ययो मिथ्यादृष्टिरिति गीयते, सर्वप्रवादेषु, विपरीतरूपग्राहकत्वात् । स्वाभाविकं तु यदस्य स्वरूपं तद्योगिभिरालोक्यते, यदा हि योगी वेदान्तप्रवेदितमात्मस्वरूपमहं तत्त्वतोऽनुजानीयामित्यभिसन्धानाद् बहिरिन्द्रियेभ्यो मनः प्रत्याहृत्य क्वचिदात्मदेशे नियम्यैकाग्रतयात्मानुचिन्तनमभ्यस्यति, तदास्य तत्त्वज्ञान- संवर्तकधर्माधानक्रमेणाहङ्कारममकारविनिर्मुक्तमात्मतत्त्वं स्फुटीभवति । यदा तु परात्माकाश- कालादिबुभुत्सया तदनुचिन्तनप्रवाहमभ्यस्यति, तदास्य परात्मादितत्त्वज्ञानानुगुणोऽचिन्त्य- प्रभावो धर्म उपचीयते, तद्वलाच्चान्तःकरणं बहिः शरीरान्निर्गत्य परात्मादिभिः संयुज्यते । तेषु संयोगात्, संयुक्तसमवायात् तद्गुणादिषु, संयुक्तसमवेतसमवायात् योगी (अपने लक्ष्य असम्प्रज्ञात से) च्युत होने पर भी 'योग' की अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता के कारण 'योगी' कहलाते हैं । सम्प्रज्ञात समाधि के समय योगियों के (तत्त्व के) आवरक मल की सत्ता सर्वथा क्षीण नहीं रहती है, अतः उन्हें अतीन्द्रिय अर्थों का प्रत्यक्ष नहीं होता है । यही बात 'युक्तानाम्' इत्यादि से कही गयी है । 'युक्तों' को अर्थात् 'सम्प्रज्ञात' समाधि से युक्त योगियों को इस योग से उत्पन्न धर्म के अनुग्रह से युक्त मन के द्वारा अपनी आत्मा और अपनी आत्मा से भिन्न आत्माओं का अर्थात् अपनी आत्मा से भिन्न दूसरों की आत्माओं का, आकाश, काल, वायु, परमाणु और मन इन सबों का और इन सबों में रहनेवाले गुणादि और समवाय का 'अवितथ' अर्थात् विपर्ययरहित (यथार्थ) ज्ञानं होता है । अस्मदादि को आत्मा की प्रतीति कर्तृत्व एवं स्वामित्व रूप से ही बराबर होती है । ये दोनों ही शरीररूप उपाधि मूलक होने के कारण आत्मा के स्वाभाविक धर्म नहीं हैं । अतः तन्मूलक 'अहम्, मम' इत्यादि आकार की आत्मा की सभी प्रतीतियाँ सभी मतों के अनुसार आत्मा के स्वरूप के विरुद्ध धर्म विषयक होने के कारण 'मिथ्यादृष्टि' कही जाती हैं । आत्मा के स्वाभाविक स्वरूप को केवल योगिगण ही देख पाते हैं । जिस समय योगिगण उपनिषदों में कथित आत्मा के स्वरूप को 'मैं यथार्थ रूप से जानूँ' इस संकल्प के द्वारा बाह्य विषयों से मन को खींचकर आत्मा के किसी भी प्रदेश में लगाकर आत्मचिन्तन का अभ्यास करते हैं, उस समय तत्त्वज्ञान के सम्पादक धर्म के उत्पादन के क्रम से अहङ्कार और ममकार से विनिर्मुक्त आत्मा का तत्त्व प्रकाशित होता है । जिस समय दूसरे की आत्मा एवं कालादि वस्तुओं को जानने की इच्छा से उनके चिन्तन के प्रयास का अभ्यास योगिगण करते हैं, उस समय योगियों में वह उत्कृष्ट धर्म बढ़ने लगता है, जिसका प्रभाव हम
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६७ न्यायकन्दली तद्गुणत्वादिषु, सम्बद्धविशेषणभावेन समवायाभावयोर्ज्ञानं जनयति । दृष्टं तावत् समाहितेन मनसाऽभ्यस्यमानस्य विद्याशिल्पादेरज्ञातस्यापि ज्ञानम् । तदितरत्रानुमानम् । आत्माकाशा- दिष्वभ्यासप्रचयस्तत्त्वज्ञानहेतुः, विशिष्टाभ्यासात्वाद् विद्याशिल्पाद्यभ्यासवत् । तथा बुद्धेस्तारतम्यं क्वचिद्विश्रान्तिशयं सातिशयत्वात् परिमाणतारतम्यवत् । ननु सन्ताप्यमानस्योदकस्यौष्ण्ये तारतम्यमस्ति, न च तस्य सर्वातिशायी वह्निरूपतापत्ति- लक्षणः प्रकर्षो दृश्यते । नापि लङ्घनाभ्यासस्य क्वचिद् विश्रान्तिरवगता, न सोऽस्ति पुरुषो यः समुत्प्लवेन भुवनत्रयं लङ्घयति । उच्यते-यः स्थिराश्रयो धर्मः स्वाश्रये च विशेष- मारभते, सोऽभ्यासः क्रमेण प्रकर्षपर्यन्तमासादयति । यथा कधौतस्य पुटपाकप्रबन्धाहिता शुद्धिः परां रक्तसारताम् । न चोदकतापस्य स्थिर आश्रयो यन्नायमभ्यस्यमानः परां काष्ठां गच्छेत्, साधारण जनों की चिन्ता के भी बाहर है । उस धर्म के बल से अन्तःकरण उनके शरीर से बाहर होकर दूसरों की आत्मा प्रभृति वस्तुओं के साथ सम्बद्ध होता है । (दूसरों की आत्मा में) अन्तःकरण के संयोग से दूसरी आत्मा का एवं (उसी संयोग से युक्त) संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उस आत्मा में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले गुणादि का, एवं संयुक्त-समवेतसमवाय सम्बन्ध से उन गुणादि में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले गुणत्वादि धर्मों का, एवं परात्मसम्बद्ध विशेषणतासम्बन्ध से उस आत्मा में रहनेवाले समवाय और अभाव का प्रत्यक्ष योगियों को होता है । क्योंकि पूर्व से सर्वथा अज्ञात विद्या एवं शिल्पादि ज्ञान का भी समाधि युक्त मन के द्वारा अभ्यास करने पर योगियों को होता है । इस प्रसङ्ग में इससे यह अनुमान फलित होता है कि जिस प्रकार विशेष प्रकार के अभ्यास से योगियों को विद्या- शिल्पादि का ज्ञान देखा जाता है, उसी प्रकार विशेष प्रकार के अभ्यास के कारण उनको आकाश एवं दूसरे की आत्मा प्रभृति अतीन्द्रिय विषयों का भी प्रत्यक्ष होता है । एवं इसी प्रसङ्ग में यह दूसरा अनुमान प्रयोग भी है कि जैसे परिमाण के आधिक्य का विश्राम आकाश में एवं परिमाण की न्यूनता का विश्राम परमाणुओं में होता है, उसी प्रकार बुद्धि की विशदता का भी कहीं विश्राम अवश्य होगा (वह आश्रय योगियों और परमेश्वर की बुद्धि ही है) । (प्र.) आग पर चढ़े हुए जल की गर्मी में न्यूनाधिक भाव देखा जाता है, किन्तु उसके आधिक्य की पराकाष्ठ-जो प्रकृत में जल का आग में परिवर्तित हो जाना ही है-नहीं देखा जाता । एवं यह भी नियम नहीं है कि सभी की चरम विश्रान्ति हो ही, क्योकि लङ्घन (कूदना) के अभ्यास की चरम परिणति नहीं देखी जाती । कोई भी पुरुष ऐसा उपलब्ध नही है, जो कूदकर तीनों भुवनों को लाँघ सके । (अतः उक्त अनुमान ठीक नहीं है) । (उ.) इसके उत्तर में कहना है कि स्थिर आश्रय में रहनेवाला जो धर्म है, वही अपने आश्रय में वैशिष्ट्य का सम्पादन कर सकता है, और उसी का अभ्यास क्रमशः चरम सीमा
४६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली अत्यन्ततापे सत्युदकपरिक्षयात् । नापि लङ्घनाभ्यासस्य स्वाश्रये विशेषाधायकत्वमस्ति, निरन्वयविनष्टे पूर्वलङ्घने लङ्घनान्तरस्य बलान्तरात् प्रयत्नान्तरादप्यपूर्ववदुत्पत्तेः । अत एव त्रिचतुरोत्प्लवपरिश्रान्तस्य लङ्घनं पूर्वस्मादपचीयते, सामर्थ्यपरिक्षयात् । बुद्धिस्तु स्थिराश्रया स्वाश्रये विशेषमाधत्ते, प्रथममगृहीतार्थस्य पुनः पुनरभ्यस्यमानस्य ग्रहणदर्शनात् । तस्याः पूर्वपूर्वाभ्यासाहिताधिकाधिकोत्तरोत्तरविशेषाधानक्रमेण दीर्घकालादरनैरन्तर्येण सेविताया योगजधर्मानुग्रहसमासादितशक्तेः प्रकर्षपर्यन्तप्राप्तिर्नानुपपत्तिमती । यत् पुनरुक्तम्, योगिनोऽतीन्द्रियार्थद्रष्टारो न भवन्ति, प्राणित्वात्, अस्मदादिवत्; तद्यदि पुरुषमात्रं पक्षीकृत्योक्तं तदा सिद्धसाधनम्, पुरुषविशेषश्च परस्यासिद्धः, सिद्धिश्चे- र्धर्मिग्राहकप्रमाणविरुद्धमनुमानम् । अथोच्यते—प्रसङ्गसाधनमिदम्, प्रसङ्गसाधनं च न स्वपक्षसाधनायोपादीयते, किन्तु परस्यानिष्टापादनार्थम् । परानिष्टं च तदभ्युपगमसिद्धैरेव धर्मादिभिः तक हो सकता है । जैसे सुवर्ण में पुटपाक से आनेवाली शुद्धता स्वर्ण के पूर्ण रक्त वर्ण होने तक जाती है । जल की गर्मी का कोई स्थिर आश्रय नहीं है, जहाँ किया गया उसका अभ्यास चरम सीमा तक हो सके; क्योंकि अत्यन्त ताप के बाद तो जल का नाश ही हो जाता है । इसी तरह लङ्घन के अभ्यास में भी वह सामर्थ्य नहीं है, जिससे कि कूदनेवाले में कूदने की विशेष क्षमता को उत्पन्न कर सके, क्योंकि एक लङ्घन के पूर्ण विनष्ट हो जाने पर ही दूसरे लङ्घन की उत्पत्ति दूसरे बल और प्रयत्न से होती है । यही कारण है कि तीन-चार बार कूदने के बाद कूदनेवाले का सामर्थ्य घट जाने के कारण आगे का कूदना कुछ न्यून ही हो जाता है; किन्तु बुद्धि का आश्रय तो स्थिर है, अतः अभ्यास के द्वारा अपने आश्रय में वह 'विशेष' का आधान कर सकती है, क्योंकि देखा जाता है कि जो विषय पूर्ण अज्ञात रहता है, अभ्यास से उसका भी विशेष प्रकार का ज्ञान होता है । अतः योगजनित धर्म के अनुग्रह से विशेष शक्तिशालीनी बुद्धि के प्रकर्ष की अत्यन्त उत्कृष्ट परिणति होने में कोई बाधा नहीं है; क्योंकि वह उसके पहले-पहले के अभ्यास से आगे-आगे के ज्ञानों में विशेष का आधान करती रहती है, यदि बहुत दिनों तक बिना बीच में छोड़े हुए आदरपूर्वक उसकी सेवा की जाय । जो सम्प्रदाय (मीमांसक लोग) यह अनुमान उपस्थित करते हैं कि (प्र.) योगीगण भी हमलोगों की तरह प्राणी हैं, अतः वे भी अतीन्द्रिय विषयों को नहीं देख सकते । (उ.) उनसे इस प्रसङ्ग में पूछना है कि इस अनुमान में सभी पुरुष पक्ष हैं या विशेष प्रकार के पुरुष ? यदि सभी पुरुषों को पक्ष करें तो उक्त अनुमान में सिद्धसाधन
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६९ न्यायकन्दली शक्यमापादयितुम् । तत्र प्रमाणेन स्वप्रतीतिरनपेक्षणीया, न ह्येवं परः प्रत्यवस्थातुमर्हति 'तवासिद्धा धर्मादयो नाहं स्वसिद्धेष्वपि तेषु प्रतिपद्ये' इति । अत्र ब्रूमः-किं प्रसङ्गसाधनमनुमानं तदन्यद्वा ? यद्यन्यत् क्वाप्युक्तलक्षणेषु प्रमाणेष्व- न्तर्भावो वर्णनीयः, वक्तव्यं वा लक्षणान्तरम् । यदि त्वनुमानमेव, तदा स्वप्रतीति- पूर्व कमेव प्रवर्त्तते, स्वनिश् चयवदन्येषां निश्चयोत्पिपादयिषया सर्वस्य परार्थानु- मानस्य प्रवृत्तेः । अन्यथा गगनकमलं सुरभि, कमलत्वात्, क्रीडासरःकमलय- दोष होगा, क्योंकि सभी पुरुषों को अतीन्द्रिय अर्थों का द्रष्टा तो कोई भी नहीं मानता । यदि विशेष प्रकार के पुरुष में अतीन्द्रियार्थ दर्शन के अभाव की सिद्धि करना चाहते हैं, तो फिर इसमें आपके मत से पक्षासिद्धि होगी, क्योंकि पक्ष का उसके असाधारण धर्म के साथ निश्चित रहना अनुमान के लिए आवश्यक है । मीमांसकों के मत में 'विशेष प्रकार के पुरुष' सिद्ध नहीं हैं । यदि उनकी सिद्धि करना चाहेंगे, तो उस (धर्मितावच्छेदकविशिष्ट) धर्मी के ग्राहक प्रमाण से ही योगियों में अतीन्द्रियार्थ दर्शनरूप 'विशेष' की भी सिद्धि हो जाएगी, जिससे उक्त अनुमान बाधित हो जाएगा । यदि यह कहें कि (प्र.) (उक्त अनुमान तो) प्रसङ्ग (आपत्ति) साधन के लिए है । प्रसङ्ग के साधन का उपन्यास तो दूसरों के मत के खण्डन के लिए ही किया जाता है, अपने मत के साधन के लिए नहीं, दूसरों (प्रतिपक्षी) के अनभिमत धर्मों की आपत्ति तो उनके मत से सिद्ध धर्मादि के द्वारा भी दी जा सकती है । यह आवश्यक नहीं है कि जिसकी आपत्ति देनी है, उसके विषयों को अपने मत के अनुसार प्रमाणों के द्वारा भी सिद्ध होना ही चाहिए; क्योंकि प्रतिपक्षी यह आरोप कर ही नहीं सकते कि तुम्हारे मत के अनुसार जिन धर्मों की उत्पत्ति नहीं हो सकती, उन धर्मों की केवल अपने मत से सिद्ध पदार्थों में प्रतीति मुझे नहीं होती । (उ) इस प्रसङ्ग में हम (सिद्धान्तियों) लोगों का कहना है कि जिसे आप 'प्रसङ्गसाधन' कहते हैं, वह अनुमान ही है या और कुछ ? यदि अनुमान नहीं है, तो फिर कथित प्रमाणों में ही उसका अन्तर्भाव करना होगा या फिर इसके लिए कोई दूसरा ही लक्षण करना पड़ेगा ? यदि अनुमान ही है, तो फिर पहिले उसके विषयों का ज्ञान अवश्य चाहिए; क्योंकि इस स्वज्ञान के द्वारा ही अनुमान की उत्पत्ति होती है । सभी परार्थानुमानों में इच्छा से ही प्रवृत्ति होती है । जो कोई भी परार्थानुमान में प्रवृत्त होता है, सबकी यही इच्छा रहती है कि मेरे सदृश ज्ञान का उत्पादन बोद्धा में हो । अन्यथा (यदि पक्षतावच्छेदक रूप से पक्ष का उभयसिद्ध ज्ञान न रहने पर भी अनुमान प्रमाण हो तो) यदि कोई परार्थानुमान का प्रयोग करनेवाला पुरुष कमल की उत्पत्ति गगन में मानकर इस अनुमान का प्रयोग करे कि गगन का कमल सरोवर के कमल की तरह ही सुगन्धित है, क्योंकि वह भी कमल है, तो इसे भी प्रमाण मानना पड़ेगा । (अतः 'योगिनो अतीन्द्रियार्थद्रष्टारो न भवन्ति'
४७० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली दित्यस्यापि प्रतिपादकाभ्युपगतसिद्धाश्रयस्य प्रामाण्योपपत्तिः । सन्दिग्धव्याप्तयश्च प्राणित्वादयः । यदि विवादाध्यासितस्य पुरुषधौरेयस्य प्राणित्वादिकमपि भवेत् सर्वज्ञत्वमपि स्यात्, केयात्रानुपपत्तिः ? नहि तयोः कश्चिद् विरोधः प्रतीक्षितः, सर्वज्ञताया प्रमाणान्तरानगोचरत्वात् । प्राणित्वादेरसर्वज्ञतया सहभावस्तु सन्दिग्धः, किमस्मदादीनां प्राणित्वाद्यनुबन्धिनीयमसर्वज्ञता ? किं वा सर्वज्ञानकारणत्वेनावगतस्य योगजधर्मस्याभावकृतेति न शक्यते निर्धारयितुम् । अतोऽनवधारितव्याप्तिकं प्राणित्वादिकम्, न तदनुमानसमर्थम् । अतीन्द्रियज्ञानकारणं योगजो धर्म इति न सिद्धम्, कुतस्तदभावादस्मदादीनामसर्वज्ञता शङ्क्येत, अस्माकं तावत्सिद्धं तेनेदमाशङ्क्यते ततश्च नोभयसिद्धा व्याप्तिः, कुतोऽनुमानम् ? युक्तानां प्रत्यक्षं व्याख्याय वियुक्तानां व्याचष्टे-वियुक्तानां पुनरिति । अत्यन्तयोगाभ्यासोपचितधर्मतिशया असमाध्यवस्थिता अपि येऽतीन्द्रियं इत्यादि अनुमान प्रमाण नहीं हो सकते) । दूसरी बात यह है कि इस अनुमान के प्राणित्वादि हेतु में व्याप्ति सन्दिग्ध है (निश्चित नहीं, प्राणी सर्वज्ञ न हो, इसका कोई निश्चय नहीं है) । अतः पुरुष श्रेष्ठ (योगी) प्राणी भी हो सकते हैं और सर्वज्ञ भी हो सकते हैं, इसमें कौन-सी अनुपपत्ति है ? क्योंकि प्राणित्व और सर्वज्ञत्व इन दोनों में कोई परस्पर विरोध पहिले से निश्चित नहीं है । (आपके मत से) सर्वज्ञता किसी दूसरे प्रमाण से सिद्ध नहीं है । हम लोगों की तरह प्राणियों में जो प्राणित्व और असर्वज्ञत्व दोनों का सहभाव देखा जाता है, उससे यह निश्चय नहीं कर सकते कि हम लोग प्राणी हैं, इसीलिए असर्वज्ञ हैं या हम लोगों में योग से उत्पन्न होनेवाला और सर्वज्ञता को उत्पन्न करनेवाला वह उत्कृष्ट धर्म नहीं है, इस कारण असर्वज्ञ हैं । अतः कथित प्राणित्व हेतु-जिसमें कि असर्वज्ञता की व्याप्ति निश्चित नहीं है-उक्त अनुमान का सम्पादन नहीं कर सकता । 'योग से उत्पन्न धर्म के द्वारा अतीन्द्रिय विषयों का ज्ञान उत्पन्न होता है' यह आपके मत से निश्चित नहीं है, अतः आप किस प्रकार यह आशङ्का करते हैं कि हम लोगों में चूँकि योगज धर्म नहीं है,अतः हम लोग असर्वज्ञ हैं । एवं हम लोगों को यह निश्चित है कि 'योग-जनित धर्म के ज्ञान से अतीन्द्रिय ज्ञान की उत्पत्ति होती है' अतः हम लोगों की यह शङ्का ठीक है कि 'हम लोगों में चूँकि योगज उत्कृष्ट धर्म नहीं है, अतः हम लोग असर्वज्ञ हैं' अतः आपके हेतु में अन्वय और व्यतिरेक दोनों से ही व्याप्ति असिद्ध है, अतः उससे अनुमान किस प्रकार हो सकता है ? युक्त योगियों के प्रत्यक्ष के बाद 'वियुक्त' योगियों के प्रत्यक्ष की व्याख्या 'वियुक्तानां पुनः' इत्यादि ग्रन्थ से की गयी है । वे ही 'वियुक्तयोगी' हैं जो समाधि अवस्था में न होते हुए भी अत्यन्त योगाभ्यास के कारण अतीन्द्रिय वस्तुओं को भी देख सकते हैं । उन्हें 'चतुष्टयसंनिकर्ष' अर्थात् आत्मा, मन, इन्द्रिय और विषय इन चार वस्तुओं के संनिकर्ष से योगजधर्म के अनुग्रह से प्राप्त विशेष सामर्थ्य के द्वारा
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४७१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४७१ प्रशस्तपादभाष्यम् तत्र सामान्यविशेषेषु स्वरूपालोचनमात्रं प्रत्यक्षं प्रमाणम्, प्रमेया द्रव्यादयः पदार्थाः, प्रमाताऽऽत्मा, प्रमितिर्द्रव्यादिविषयं ज्ञानम् । जिस समय सत्तारूप (सामान्य) एवं (द्रव्यत्वादिरूप) विशेष विषयों का स्वरूपालोचन (निर्विकल्पक) ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण है, (उस समय) द्रव्यादि पदार्थ प्रमेय हैं । आत्मा प्रमाता है । द्रव्यादि-विषयक न्यायकन्दली पश्यन्ति ते वियुक्ताः, तेषामभिमुखीभूतनिखिलविषयग्राहाणामप्रतिहतकारणगणानां चतुष्टयसन्निकर्षादात्ममनइन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् योगजधर्मानुग्रहसहकारितात् तत्सामर्थ्यात् सूक्ष्मेषु मनः परमाणुप्रभृतिषु व्यवहितेषु नागभुवनादिषु विप्रकृष्टेषु ब्रह्मभुवनादिषु प्रत्यक्षमुत्पद्यते ज्ञानम् । एवं तावद्व्याख्यातं प्रत्यक्षम्, सम्प्रति प्रमाणफलं विभजते-तत्र सामान्यविशेषेषु स्वरूपालोचनमात्रं प्रत्यक्षमिति । सामान्यं सत्ता, द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादिकं विशेषा व्यक्तयः, तेषु स्वरूपालोचनमात्रं स्वरूपग्रहणमात्रं विकल्परहितं प्रमाणम्, प्रमायां साधकतमत्वात् । साधकतमत्वं च तस्मिन् सति प्रमित्सोर्भवत्येवेत्यतिशयः, प्रमातरि प्रमेये च सति प्रमा भवति, न तु भवत्येव, प्रमाणे तु निर्विकल्पके अपने सामने की सभी वस्तुओं और उनके सभी कारणों का एवं 'सूक्ष्म विषयों' का अर्थात् मन एवं परमाणु प्रभृति विषयों का, एवं 'व्यवहित विषयों' का अर्थात् नागलोकादि का, एवं 'विप्रकृष्ट' विषयों का अर्थात् ब्रह्मलोक प्रभृति का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । इस प्रकार प्रत्यक्ष की व्याख्या हो गयी । अब 'तत्र सामान्यविशेषेषु स्वरूपा- लोचनमात्रं प्रत्यक्षम्' इत्यादि से प्रत्यक्ष प्रमाण कौन है ? और उस (करण) का फल कौन है ? इसका विभाग करते हैं । (उक्त वाक्य के) 'सामान्य' शब्द से सत्ता, द्रव्यत्व, कर्मत्व प्रभृति को समझना चाहिए । 'विशेष' शब्द से (उक्त सामान्य के आश्रय) व्यक्तियों को समझना चाहिए । इन सबों में 'स्वरूपालोचनमात्र, अर्थात् स्वरूप का ग्रहणमात्र फलतः निर्विकल्पक ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है, क्योंकि प्रकृत में वही (उन विषयों के सविकल्पक ज्ञानरूप) प्रमा का सबसे निकट साधक (साधकतम) है । वह साधकतम इसलिए है कि उसके रहने पर उक्त प्रमाज्ञान के इच्छुक पुरुष को उक्त सविकल्पक ज्ञानरूप प्रमा अवश्य होती है । प्रमा के और करणों से उसमें यही 'विशेष' है । प्रमाता, प्रमेय प्रभृति साधनों के रहते हुए भी प्रमा ज्ञान की उत्पत्ति
४७२ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्यविशेषज्ञानोत्पत्तावविभक्तमालोचनमात्रं प्रत्यक्षं प्रमाणम्, प्रत्यक्ष ज्ञान ही (उक्त प्रत्यक्ष प्रमाण की फलरूप) प्रमिति है । जिस समय उक्त (सत्तारूप) सामान्य और (द्रव्यत्वादि) विशेष विषयक निर्विकल्पक ज्ञान ही प्रमितिरूप से (फलरूप से) इष्ट हो, उस समय ('आलोच्यते ज्ञायते अर्थोऽनेन' इस व्युत्पत्ति के अनुसार) केवल 'आलोचन' अर्थात् (ज्ञान से न्यायकन्दली विशेषणज्ञानादिलक्षणे विशेष्यज्ञानादिलक्षणा प्रमा भवत्येवेत्यतिशयः । प्रमेया द्रव्यादयः पदार्थाः, द्रव्यादयश्चत्वारः पदार्थाः प्रमेयाः प्रमितिविषयाः प्रमितौ जातायां तेषु हानादिव्यवहारः प्रवर्त्तत इत्यर्थः । प्रमाता आत्मा, बोधाश्रयत्वात् । प्रमितिर्द्रव्यादिविषयं ज्ञानम्, यदा निर्विकल्पकं सामान्यविशेषज्ञानं प्रमाणम्, तदा द्रव्यादिविषयं विशिष्टं ज्ञानं प्रमितिरित्यर्थः । यदा निर्विकल्पकं सामान्यविशेषज्ञानमपि प्रमाणमर्थ- प्रतीतिरूपत्वात्, तदा तदुत्पत्तावविभक्तमालोचनमात्रं प्रत्यक्षम् । आलोच्यतेऽनेनेत्यालोचनमिन्द्रियार्थसन्निकर्षस्तन्मात्रम् । अविभक्तं केवलं ज्ञानानपेक्षमिति यावत् । सामान्यविशेषज्ञानोत्पत्तौ प्रमाणम्, विशेष्यज्ञानोत्पत्तावपीन्द्रियार्थसन्निकर्षः यद्यपि होती है, किन्तु होती ही नहीं है । विशेषणज्ञान रूप निर्विकल्पक ज्ञान के रहने पर (विशेषणविशिष्ट) विशेष्य ज्ञानरूप प्रमा अवश्य होती है, अतः वही प्रमाण (अर्थात् प्रमा का साधकतम) है । यही और कारणों से इसमें 'विशेष' है । 'प्रमेया द्रव्यादयः पदार्थाः' अर्थात् द्रव्यादि (द्रव्य, गुण, कर्म और सामान्य ये) चार पदार्थ प्रत्यक्ष के 'प्रमेय' हैं, अर्थात् प्रमाज्ञान के विषय हैं । अभिप्राय यह है कि (उक्त विशिष्ट) प्रमाज्ञान के होने पर ही हानोपानादि के व्यवहार होते हैं । आत्मा प्रमा ज्ञान का आश्रय है, अतः वह 'प्रमाता' है । प्रमिति है द्रव्यादिविषयक ज्ञान । अभिप्राय यह है कि जिस समय सामान्य और विशेष का निर्विकल्पक ज्ञान प्रमाण है, उस समय द्रव्यादि विषयक विशिष्ट (सविकल्पक) ज्ञान ही फलरूपा प्रमिति है । जिस सामान्य और विशेष विषयक निर्विकल्पक ज्ञान को ही अर्थ की प्रतीतिरूप होने के कारण (फलरूप) प्रमा मानते हैं, उस समय उस प्रमा ज्ञान की उत्पत्ति में 'अविभक्त आलोचन मात्र' ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । 'आलोच्यते अनेन' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इस वाक्य के 'आलोचन' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष । 'तन्मात्रमविभक्तम्' अर्थात् ज्ञान से अनपेक्ष केवल इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही सामान्य विशेषविषयक (निर्विकल्पक ज्ञान का उत्पा-
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७३ प्रशस्तपादभाष्यम् अस्मिन्नान्यत् प्रमाणान्तरमस्ति, अफलरूपत्वात् । अनपेक्ष) इन्द्रिय और अर्थ का सम्प्रयोग ही प्रत्यक्ष प्रमाण है, क्योंकि वहाँ ज्ञानादि कोई दूसरा प्रमाण उपस्थित नहीं है । एवं यह ज्ञान निर्विकल्पक होने के कारण किसी ज्ञानरूप प्रमाण का फल भी नहीं है, इस हेतु से भी उक्त निर्विकल्पक ज्ञानरूप प्रत्यक्ष प्रमिति के पक्ष में उक्त आलोचनरूप इन्द्रिय और अर्थ का सम्प्रयोग ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । न्यायकन्दली प्रमाणं भवत्येव प्रमाहेतुत्वात्, किन्तु विशेषणज्ञानसहकारितया न केवलः, सामान्य- विशेषज्ञानोत्पत्तौ तु ज्ञानानपेक्षः केवल एवेत्यभिप्रायः । सन्निकर्षमात्रमिह प्रमाणं न ज्ञानमित्यत्रोपपत्तिमाह-न तस्मिन्निति । सामान्यविशेषज्ञाने नान्यत् प्रमाणं ज्ञानरूपमस्ति सामान्यविशेषज्ञानस्या- फलरूपत्वात् ज्ञानफलत्वाभावात् । विशेष्यज्ञानं हि विशेषणज्ञानस्य फलम्, विशेषण- ज्ञानं न ज्ञानान्तरफलम्, अनवस्थाप्रसङ्गात् । अतो विशेषणज्ञाने इन्द्रियार्थ- सन्निकर्षमात्रमेव प्रमाणमित्यर्थः । यदा निर्विकल्पकं सामान्यविशेषज्ञानं फलं तदेन्द्रियार्थसन्निकर्षः प्रमाणम्, यदा विशेष्यज्ञानं फलं तदा सामान्यविशेषाद्यालोचनं दक कारण) प्रमाण है (अर्थात् जिस समय निर्विकल्पक ज्ञान फल रूप है, उस समय इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष प्रमाण है)। विशेष्य (विशिष्ट) ज्ञान की उत्पत्ति में भी इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष उक्त ज्ञान का कारण होने से (यद्यपि) प्रमाण है ही, फिर भी विशिष्ट ज्ञानरूप कार्य के उत्पादन के लिए उसे विशेषण ज्ञान (निर्विकल्पक ज्ञान) की भी अपेक्षा होती है, अतः केवल वही विशिष्ट ज्ञान का कारण (प्रमाण) नहीं है । किन्तु सामान्य विशेषज्ञान (निर्विकल्पक ज्ञान) के उत्पादन में उसे दूसरे किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं होती, अतः वहाँ वह 'केवल' अर्थात् ज्ञान से अनपेक्ष होकर (प्रमा का उत्पादक कारण) प्रमाण है । 'न तस्मिन्' इत्यादि ग्रन्थ से यह उपपादन करते हैं कि निर्विकल्पक ज्ञानरूप प्रमा के उत्पादन में केवल इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही क्यों करण है ? कोई ज्ञान उसका करण क्यों नहीं है ? अभिप्राय यह है कि कोई ज्ञान निर्विकल्पक ज्ञानरूप प्रमा का उत्पादक करण (प्रमाण) नहीं है, क्योंकि निर्विकल्पक ज्ञान 'अफल रूप है' अर्थात् किसी ज्ञान का फल नहीं हैं । विशिष्ट ज्ञान (विशेष्य ज्ञान) तो विशेषण ज्ञान (निर्विकल्पकज्ञान) का फल है, किन्तु निर्विकल्पक ज्ञान (विशेषण ज्ञान) किसी ज्ञानरूप करण का फल नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर अनवस्था हो जाएगी । यही कारण है निर्विकल्पक (विशेषण) प्रमा का, इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही केवल करण है । फलितार्थ यह है कि जिस समय निर्विकल्पकरूप सामान्य और विशेष का ज्ञान फल है, उस समय इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही केवल प्रमाण है, एवं जिस समय विशेष्य
४७४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- प्रशस्तपादभाष्यम् अथवा सर्वेषु पदार्थेषु चतुष्टयसन्निकर्षादवितथमव्यपदेश्यं अथवा आत्मा, मन, इन्द्रिय और अर्थ इन चारों के (तीन) सम्प्रयोग से जिस किसी भी वस्तुविषयक अव्यपदेश्य अर्थात् शब्दाजन्य यथार्थ ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है। एवं द्रव्यादि पदार्थ (इस प्रमाण के) प्रमेय हैं। एवं आत्मा प्रमाता है। न्यायकन्दली प्रमाणमित्युक्तं तावत् । सम्प्रति हानादिबुद्धीनां फलत्वे विशेषज्ञानं प्रमाणमित्याह- अथवेति । सर्वेषु पदार्थेषु चतुष्टयसन्निकर्षात् चतुष्टयग्रहणमुदाहरणार्थम् । द्वयसन्निकर्षात् त्रयसन्निकर्षादवितथं संशयविपर्ययरहितमव्यपदेश्यं व्यपदेशे भवं व्यपदेश्यं न व्यपदेश्यमव्य- पदेश्यं शब्दाजन्यं यद् विज्ञानं जायते तत् प्रत्यक्षं प्रमाणम् । संशयो ह्यनवस्थितोभय- धर्मतया पदार्थमुपदर्श्य व्यवस्थितैकधर्माणं प्रापयति, अन्यथाध्यवसायो वितथ एवेत्यवितथ- पदेन व्युदस्यन्ति । अव्युत्पन्नस्य सन्निहितेऽर्थे व्याप्रियमाणे चक्षुषि शब्दश्रवणानन्तरं यद् गौरिति ज्ञानं जायते, तत्राक्षमपि कारणम्, अन्यथा रेखोपरेखतादिविशेषप्रतीत्ययोगात् । (विशिष्ट) ज्ञान ही फलरूप से अभिप्रेत है, उस समय सामान्य और विशेष का आलोचन (निर्विकल्पक) ज्ञान ही प्रमाण है । 'अथवा' इत्यादि ग्रन्थ से अब यह कहते हैं कि हानादि बुद्धि को अगर फल मानें, तो विशिष्ट ज्ञान ही प्रमाण है । 'सर्वपदार्थेषु चतुष्टयसन्निकर्षात्' इस वाक्य में 'चतुष्टय' पद का प्रयोग केवल उदाहरण दिखाने के लिए है, अतः दो के संनिकर्ष से या तीन के संनिकर्ष से भी उत्पन्न 'अवितथ' अर्थात् संशय और विपर्यय से भिन्न 'अव्यपदेश्य' (अर्थात् 'व्यपदेशे भवं व्यपदेश्यम्, न व्यपदेश्य- मव्यपदेश्यम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार) शब्द से अनुत्पन्न उक्त प्रकार का ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । जिन दो रूपों से संशय के द्वारा एक ही विषय उपस्थित होता है, बाद में उनमें से एक रूप से निश्चित अर्थ की प्राप्ति का प्रयोजक होने से उपादान बुद्धिरूप प्रमिति के कारणरूप संशय प्रमाण कोटि में यद्यपि आ सकता है, किन्तु संशय उस एक वस्तु को भी अनिश्चितरूप से ही उपस्थित करता है, इस प्रकार संशय 'वितथ' ही है, अवितथ नहीं । 'अन्यथाध्यवसाय' अर्थात् विपर्यय तो वितथ ही है । इस प्रकार 'अवितथ' पद से संशय और विपर्ययरूप सभी मिथ्या ज्ञानों की व्यावृत्ति होती है । (गो में गोशब्दवाच्यत्व विषयक ज्ञानरूप) व्युत्पत्ति जिस पुरुष को नहीं है, उसका चक्षु जिस समय गोरूप पिण्ड में व्यापृत रहता है, उसी समय 'अयं गौः' इस वाक्य के द्वारा जो उसे 'गौः' इस प्रकार का शब्दज्ञान होता है, उसकी व्यावृत्ति के लिए ही 'अव्यपदेश्य' पद दिया गया है । इस ज्ञान के प्रति यद्यपि चक्षु भी कारण है, यदि ऐसा न हो तो उस व्यक्ति को गो की छोटी बड़ी रेखाओं का ज्ञान न हो सकेगा, फिर भी वह ज्ञान
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७५ प्रशस्तपादभाष्यम् यज्ज्ञानमुत्पद्यते, तत् प्रत्यक्षं प्रमाणम्, प्रमेया द्रव्यादयः पदार्थाः, प्रमातात्मा, प्रमितिर्गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनमिति । एवं उन विषयों में उपादेयत्व या हेयत्व अथवा उपेक्षा की बुद्धि ही प्रमिति है । न्यायकन्दली न च तत् प्रत्यक्षम्, अनन्तरभाविनः शब्दस्यैव तदुत्पत्तौ साधकतमत्वादिन्द्रियस्यापि तत्सहकारितामात्रत्वात् । तथापि पृष्टो व्यपदिशति-अनेन समाख्यातम्, न पुनरेव- मभिधत्ते प्रत्यक्षो मया प्रतीत गौरयमिति, तस्य व्यवच्छेदार्थमुक्तमव्यपदेश्यमिति । प्रमितिर्गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम् । गुणदर्शनमुपादेयत्वज्ञानम्, दोषदर्शनं हेयत्व- ज्ञानम्ः, माध्यस्थ्यदर्शनं न हेयं नोपादेयमिति ज्ञानं प्रमितिः, पदार्थस्वरूपबोधे सत्युप- कारादिस्मरणात् । सुखसाधनत्वादिदिनिश्चये सत्युपादेयादिज्ञानं भवतु पदार्थस्वरूपबोध- स्यैव फलं भवति, सुखस्मरणादीनामवान्तरव्यापारत्वात् । यथोक्तम्- "अन्तराले तु यस्तत्र व्यापारः कारकस्य सः"॥ इति । प्रत्यक्षरूप नहीं है, क्योंकि शब्द ही उस प्रमा का 'साधकतम' करण है, इतना ही विशेष है कि इन्द्रिय भी उस ज्ञान का सहकारिकारण है । इसीलिए पूछने पर वह व्यक्ति यह कहता है कि 'उसने कहा है कि यह गो है' वह यह नहीं कहता, मैंने प्रत्यक्ष के द्वारा देखा है कि 'यह गो है' । 'प्रमितिर्गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम्' । 'यह ग्रहण के योग्य है' इस आकार का (उपादेयत्व) ज्ञान ही 'गुणदर्शन' है । 'यह त्याग के योग्य है' इस प्रकार का (हेयत्व) ज्ञान ही 'दोषदर्शन' है । 'न इसके लेने से कुछ होगा न छोड़ने से' इस प्रकार का ज्ञान ही 'माध्यस्थ्यदर्शन' है । ये ज्ञान ही (विशिष्ट ज्ञानरूप प्रत्यक्ष प्रमाण से उत्पन्न होनेवाली) प्रमितियाँ हैं, क्योंकि उक्त हेयत्व या उपादेयत्व का ज्ञान पदार्थ के स्वरूप विषयक बोध (विशिष्टज्ञान) का ही फल है, सुख के स्मरण का नहीं, क्योंकि सुखादि की स्मृतियाँ तो बीच के व्यापार हैं । (विशिष्ट ज्ञान से हेयत्वादि ज्ञान के उत्पादन का यह क्रम है कि) पदार्थों के स्वरूप का ज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) होने पर उस ज्ञान के विषय में 'यह सुख (या दुःख) का साधन है' इस आकार का निश्चय उत्पन्न होता है । इसके बाद उन विषयों में उपादेयत्व (या हेयत्व) की बुद्धि उत्पन्न होती है । (उपादेयत्वादि का ज्ञान उक्त विशिष्ट ज्ञान का ही फल है, सुखादि स्मरण का नहीं) । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि (कार्य के लिए करण की प्रवृत्ति के बाद और कार्य की उत्पत्ति से पहिले इस) मध्य में जो उत्पन्न होता है, वह तो कारक (करण) का (कार्योत्पादन में सहायक) व्यापार है (स्वयं कारक नहीं है, अतः करण भी नहीं है) ।
४७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- प्रशस्तपादभाष्यम् लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् । हेतु के ज्ञान से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान ही 'लैङ्गिक' ज्ञान (अनुमिति) है । न्यायकन्दली अन्ये त्वेवमाहुः-यदर्थस्य सुखसाधनत्वज्ञानं तद् गुणदर्शनम्, उपादेयत्वज्ञानमपि तदेव । यद् दुःखसाधनत्वज्ञानं तद् दोषदर्शनं हेयत्वज्ञानमपि तदेव । यच्च न सुखसाधनं न च दुःखसाधनमेतदिति ज्ञानं तन्माध्यस्थ्यं न हेयं नोपादेयमिति ज्ञानं प्रमितिः । पदार्थस्वरूपबोधे सत्युपकारादिस्मरणात् सुखसाधनत्वादिविनिश्चये सत्युपादेयादिज्ञानं भवत् पदार्थस्वरूप- बोधस्यैव फलं भवति, सुखस्मरणादीनामुपेक्षाज्ञानमपि तदेव । सर्वं चैतदभ्यासपाटवोपेतस्य व्याप्तिस्मरणमनपेक्षमाणस्य वस्तुस्वरूपग्रहणामात्रादेवानुसंहितलिङ्गस्यापरोक्षावभासित- योत्पादादभ्यासपाटवसहकारिणः प्रत्यक्षस्य फलमिति । लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् । दर्शनशब्द उपलब्धिवचनो न चाक्षुषप्रतीतिवचनः, अनुमितानुमानस्यापि सम्भवात् । लिङ्गदर्शनाल्लिङ्गविषयः संस्कारो जायते; किन्त्वस्य न परिग्रहः, बुद्धयधिकारेण विशेषितत्वात् । संशब्देन सम्यगर्थवाचिना संशयविपर्ययस्मृतीनां व्युदासः । लिङ्गस्य कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि (घटादि) अर्थों का 'इससे सुख मिलता है' इस आकार का जो (सुखसाधनत्व) का ज्ञान होता है, वही गुणदर्शन है, एवं 'उपादेयत्व का ज्ञान' भी वही है । एवं (कण्टकादि) विषयों का जो 'इससे दुःख मिलता है, इस आकार का (दुःखसाधनत्व) का ज्ञान होता है, वही 'दोषदर्शन' है, एवं 'हेयत्वज्ञान' भी वही है । हवा में उड़ते हुए (पत्ते प्रभृति) विषयों में जो 'इससे न सुख ही मिलेगा न दुःख ही' इस आकार का ज्ञान होता है, उसी को 'माध्यस्थ्य दर्शन' कहते हैं । (उपादेयत्वादि के) ये सभी ज्ञान चूँकि अपने विषयों को अपरोक्षरूप से ही प्रकाशित करते हैं और इनकी उत्पत्ति में (अनुमिति के प्रयोजक) लिङ्गदर्शन एवं व्याप्ति स्मरणादि की भी अपेक्षा नहीं होती है, अतः ये (सविकल्पक) प्रत्यक्षरूप प्रत्यक्ष प्रमाण के ही फल हैं । इतना अवश्य है कि इन ज्ञानों के उत्पन्न होने में अभ्यास जनित पटुता भी अपेक्षित होती है, अतः वह भी उन प्रमितियों का सहकारिकारण है । 'लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम्' इस वाक्य में प्रयुक्त 'दर्शन' शब्द का अर्थ केवल चक्षु से उत्पन्न ज्ञान ही नहीं है, किन्तु सभी ज्ञान या उपलब्धि उसके अर्थ हैं, क्योंकि अनुमान के द्वारा ज्ञात हेतु से भी अनुमान होता है (अर्थात् अनुमितानुमान भी होता है) । यद्यपि (कथित) लिङ्गदर्शन से लिङ्गविषयक संस्कार भी उत्पन्न होता है, (जिससे लिङ्ग की स्मृति उत्पन्न होती है, अतः उसमें अनुमिति का लक्षण अतिव्याप्त हो जाएगा, किन्तु यह बुद्धि (अनुभव) का प्रकरण है, अतः 'प्रकरण' के द्वारा