भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 489 में से

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पृष्ठ 127

अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य [ ११७

Sanskrit ShlokasHindi Translation
कृत्वा सीरं स सौवर्णं गृह्य रुद्रवृषं प्रभुः।<br>पौण्ड्रकं याम्यमहिषं स्वयं कर्षितुमुद्यतः॥ २३<br>तं कर्षन्तं नरवरं समभ्येत्य शतक्रतुः।<br>प्रोवाच राजन् किमिदं भवान् कर्तुमिहोद्यतः॥ २४<br>राजाब्रवीत् सुरवरं तपः सत्यं क्षमां दयाम्।<br>कृषामि शौचं दानं च योगं च ब्रह्मचारिताम्॥ २५राजाने सुवर्णमय हल बनवाकर उसमें शङ्करके बैल एवं यमराजके पौण्ड्रक नामक भैंसेको नाँधकर स्वयं जोतनेके लिये तैयार हुए। इसपर इन्द्रने उनके पास जाकर कहा—राजन्! आप यहाँ यह क्या करनेके लिये उद्यत हुए हैं? राजा बोले—मैं यहाँ तप, सत्य, क्षमा, दया, शौच, दान, योग और ब्रह्मचर्य—इन अष्टाङ्गोंकी खेती कर रहा हूँ॥ २२—२५॥
तस्योवाच हरिर्देवः कस्माद्बीजो नरेश्वर।<br>लब्धोऽष्टाङ्गेति सहसा अवहस्य गतस्ततः॥ २६<br>गतेऽपि शक्रे राजर्षिरहन्यहनि सीरधृक्।<br>कृषतेऽन्यान् समन्ताच्च सप्तक्रोशान् महीपतिः॥ २७<br>ततोऽहमब्रुवं गत्वा कुरु किमिदमित्यथ।<br>तदाऽष्टाङ्गं महाधर्मं समाख्यातं नृपेण हि॥ २८<br>ततो मयाऽस्य गदितं नृप बीजं क्व तिष्ठति।<br>स चाह मम देहस्थं बीजं तमहमब्रुवम्।<br>देह्यहं वापयिष्यामि सीरं कृषतु वै भवान्॥ २९<br>ततो नृपतिना बाहुर्दक्षिणः प्रसृतः कृतः।<br>प्रसृतं तं भुजं दृष्ट्वा मया चक्रेण वेगतः॥ ३०<br>सहस्रधा ततश्छिद्य दत्तो युष्माकमेव हि।<br>ततः सव्यो भुजो राज्ञा दत्तश्छिन्नोऽप्यसौ मया॥ ३१<br>तथैवोरुयुगं प्रादान्मया छिन्नौ च तावुभौ।<br>ततः स मे शिरः प्रादात् तेन प्रीतोऽस्मि तस्य च।<br>वरदोऽस्मीत्यथेत्युक्ते कुरुर्वरमयाचत॥ ३२इसपर इन्द्र उनसे बोले—नरेश्वर! आपने (कृषिके लिये साधनभूत) हल और बीज कहाँसे प्राप्त किये हैं? यह कहते हुए उपहास कर इन्द्र वहाँसे शीघ्र ही चले गये। इन्द्रके चले जानेपर भी राजा प्रतिदिन हल लेकर चारों ओर सात कोसोंतक पृथ्वी जोतते रहे। तब मैंने (विष्णुने) उनसे जाकर कहा—कुरु! तुम यह क्या कर रहे हो? (इसपर) राजाने कहा—मैं (पूर्वोक्त) अष्टाङ्ग-महाधर्मोंकी खेती कर रहा हूँ। फिर मैंने उनसे पूछा—राजन्! बीज कहाँ है? राजाने कहा—बीज मेरे शरीरमें है। मैंने उनसे कहा—उसे मुझे दे दो। मैं (उसे) बोऊँगा, तुम हल चलाओ। तब राजाने अपना दाहिना हाथ फैला दिया। फैलाये हुए हाथको देखकर मैंने चक्रसे शीघ्र ही उसके हजारों टुकड़े कर डाले और उन टुकड़ोंको तुम देवताओंको दे दिया। उसके बाद राजाने वाम बाहु दिया और उसे भी मैंने काट दिया। इसी प्रकार उसने दोनों ऊरुओंको दिया। उन दोनोंको भी मैंने काट दिया। तब उसने अपना मस्तक दिया, जिससे मैं उसके ऊपर प्रसन्न हो गया और कहा—तुम्हें मैं वर दूँगा। मेरे ऐसा कहनेपर कुरुने (मुझसे) वर माँगा—॥ २६—३२॥
कुरुरुवाच<br>यावदेतन्मया कृष्टं धर्मक्षेत्रं तदस्तु च।<br>स्नातानां च मृतानां च महापुण्यफलं त्विह॥ ३३<br>उपवासं च दानं च स्नानं जप्यं च माधव।<br>होममज्ञादिकं चान्यच्छुभं वाप्यशुभं विभो॥ ३४<br>त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश शङ्खचक्रगदाधर।<br>अक्षयं प्रवरे क्षेत्रे भवत्वत्र महाफलम्॥ ३५<br>तथा भवान् सुरैः सार्धं समं देवेन शूलिना।<br>वस त्वं पुण्डरीकाक्ष मन्नामव्यञ्जकेऽच्युत।<br>इत्येवमुक्तस्तेनाहं राज्ञा बाढमुवाच तम्॥ ३६**कुरुने कहा—**जितने स्थानको मैंने जोता है, वह धर्मक्षेत्र हो जाय और यहाँ स्नान करनेवालों एवं मरनेवालोंको महापुण्यकी प्राप्ति हो। माधव! विभो! शङ्खचक्रगदाधारी हृषीकेश! यहाँ किये गये उपवास, स्नान, दान, जप, हवन, यज्ञ आदि तथा अन्य शुभ या अशुभ कर्म भी इस श्रेष्ठ क्षेत्रमें आपकी कृपासे अक्षय एवं महान् फल देनेवाले हों तथा हे पुण्डरीकाक्ष! हे अच्युत! मेरे नामके व्यञ्जक (प्रकाशक) इस कुरुक्षेत्रमें आप सभी देवताओं एवं शिवजीके साथ निवास करें। राजाके ऐसा कहनेपर मैंने उनसे कहा—बहुत
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