वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १२० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय २३ |
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तेईसवाँ अध्याय
वामन-चरितका उपक्रम, बलिका दैत्यराज्याधिपति होना और उनकी अतुल राज्य-लक्ष्मीका वर्णन
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋषय ऊचुः<br><br>ब्रूहि वामनमाहात्म्यमुत्पत्तिं च विशेषतः।<br>यथा बलिर्नियमतो दत्तं राज्यं शतक्रतोः॥ १ | ऋषियोंने कहा—(कृपया आप) वामनके माहात्म्य और विशेषकर उनकी उत्पत्तिका वर्णन (विस्तारसे) करें तथा यह भी बतलायें कि बलिको किस प्रकार बाँधकर इन्द्रको राज्य दिया गया॥ १॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br><br>शृणुध्वं मुनयः प्रीता वामनस्य महात्मनः।<br>उत्पत्तिं च प्रभावं च निवासं कुरुजाङ्गले॥ २<br><br>तदेव वंशं दैत्यानां शृणुध्वं द्विजसत्तमाः।<br>यस्य वंशे समभवद् बलिवैरोचनिः पुरा॥ ३<br><br>दैत्यानामादिपुरुषो हिरण्यकशिपुः पुरा।<br>तस्य पुत्रो महातेजाः प्रह्लादो नाम दानवः॥ ४<br><br>तस्माद् विरोचनो जज्ञे बलिर्जज्ञे विरोचनात्।<br>हते हिरण्यकशिपौ देवानुत्साद्य सर्वतः॥ ५<br><br>राज्यं कृतं च तेनेष्टं त्रैलोक्ये सचराचरे।<br>कृतयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यतां गते॥ ६ | **लोमहर्षणने कहा—**मुनियो! आपलोग प्रसन्नतापूर्वक महात्मा वामनकी उत्पत्ति, उनका प्रभाव और कुरुजाङ्गल स्थानमें उनके निवासका वर्णन सुनें! द्विजश्रेष्ठो! आपलोग दैत्योंके उस वंशके सम्बन्धमें भी सुनें, जिस वंशमें प्राचीनकालमें विरोचनके पुत्र बलि उत्पन्न हुए थे। पहले समयमें दैत्योंका आदिपुरुष हिरण्यकशिपु था। उसका प्रह्लाद नामक पुत्र अत्यन्त तेजस्वी दानव था। उससे विरोचन उत्पन्न हुआ और विरोचनसे बलि। हिरण्यकशिपुके मारे जानेपर बलिने सभी स्थानोंसे देवताओंको खदेड़ दिया और वह चराचरसहित तीनों लोकोंका राज्य स्वच्छन्दतासे करने लगा। (विरोधमें) देवताओंके (बहुत) प्रयत्न करते रहनेपर भी तीनों लोक दैत्योंके अधीन हो ही गये (एवं त्रैलोक्यपर देवताओंका अधिकार नहीं रह गया)॥ २—६॥ |
| जये तथा बलवतोर्मयशम्बरयोस्तथा।<br>शुद्धासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि॥ ७<br><br>संप्रवृत्ते दैत्यपथे अयनस्थे दिवाकरे।<br>प्रह्लादशम्बरमयैरनुह्लादेन चैव हि॥ ८<br><br>दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते।<br>देवेषु मखशोभां च स्वर्गस्थां दर्शयत्सु च॥ ९<br><br>प्रकृतिस्थे ततो लोके वर्तमाने च सत्पथे।<br>अभावे सर्वपापानां धर्मभावे सदोत्थिते॥ १० | बलशाली मय और शम्बरकी विजय-वैजयन्ती फहराने लग गयी। धर्मकार्य सर्वत्र होने लग गये। फलतः दिशाएँ शुद्ध हो गयीं। सूर्य दैत्योंके मार्ग (दक्षिण अयन)-में चले गये। (दैत्योंके शासनमें) प्रह्लाद, शम्बर, मय तथा अनुह्लाद—ये सभी दैत्य सभी दिशाओंकी रक्षा करने लगे। आकाश भी दैत्योंसे रक्षित हो गया। देवगण स्वर्गमें होनेवाले यज्ञोंकी शोभा देखने लगे। सारा संसार प्रकृतिमें स्थित और (व्यवस्थित) हो गया तथा सभी सन्मार्गपर चलने लगे। सर्वत्र पापोंका अभाव और धर्मभावका उत्कर्ष हो गया॥ ७—१०॥ |