वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य २०५
अनुसार उत्तम कर्म हैं, जिनका मैंने तुमसे वर्णन किया है। महाभागे! यह वृत्त सर्वथा गोपनीय है। इसके प्रभावसे मेरे कर्मपरायण रहनेवाले मनुष्य संसारसागरको तर जाते हैं। देवता भी इसे नहीं जानते; क्योंकि मैं भगवान् नारायण यहाँ स्वयं वराहके रूपमें विराजमान हूँ। इस प्रकारके ज्ञानका उन्हें भी अभाव है। यह विषय दीक्षा-हीन, मूर्ख, चुगली करनेवाले, निन्दित शिष्य एवं शास्त्रके अर्थोंमें दोषारोपण करनेवालेसे नहीं कहना चाहिये। गोघाती एवं धूर्तोंके बीच भी इसका कथन अनुचित है; क्योंकि उनके मध्य इसको कहनेसे लाभके बदले हानि ही होती है। जो भगवान्में श्रद्धा रखनेवाले हैं तथा जिन्होंने धार्मिक दीक्षा ली है, उनके सामने ही इसकी व्याख्या करनी चाहिये।
[अध्याय १२४]
माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य
सूतजी कहते हैं—पवित्र व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाली भगवती वसुंधराने छः ऋतुओंके वैष्णव-कृत्योंका वर्णन सुनकर भगवान् नारायणसे पुनः पूछा—'भगवन्! आपने मङ्गल एवं पवित्रमय जिन विषयोंका वर्णन किया है, जिनकी स्वर्गादि लोकों तथा मेरे भूलोकमें प्रसिद्धि हो चुकी है, वे आपके—वैष्णव-धर्मके कृत्य मेरे मनको आनन्दित कर रहे हैं। माधव! आपके मुखारविन्दसे निकले हुए इन कर्मोंको सुनकर मेरी बुद्धि निर्मल हो गयी। पर मेरे मनमें एक सूक्ष्म कौतूहल उत्पन्न हो गया है। मेरा हित करनेके विचारसे उसे आप बतलानेकी कृपा कीजिये। भगवन्! आप अपनी जिस मायाका सर्वदा वर्णन किया करते हैं, उसका स्वरूप क्या है तथा उसे 'माया' क्यों कहा जाता है? मैं इसे तथा इसके आन्तरिक रहस्योंको जानना चाहती हूँ।'
इसपर मायापति भगवान् नारायण हँसकर बोले—'पृथ्वी देवि! तुम जो मुझसे यह मायाकी बात पूछ रही हो, इसे न पूछनेमें ही तुम्हारी भलाई है। तुम व्यर्थमें यह कष्ट क्यों मोल लेना चाहती हो? इसे देखनेसे तो तुम्हें कष्ट ही होगा। ब्रह्मासहित रुद्र एवं इन्द्र आदि देवता भी आजतक मुझे तथा मेरी मायाको जाननेमें असफल रहे हैं, फिर तुम्हारी तो बात ही क्या? विशालाक्षि! जब मेघ पानी बरसाते हैं तो जलसे सारा जगत् भर उठता है। पर कभी वही सारा देश फिर शुष्कबंजर बन जाता है। कृष्णपक्षमें चन्द्रदेव क्षीण होते हैं और शुक्लपक्षमें बढ़ते हैं, यह सब मेरी मायाका ही तो प्रभाव है। सुन्दरि! अमावास्याकी रात्रिमें चन्द्रमा दृष्टिगोचर नहीं होते, हेमन्त-ऋतुमें कुएँका जल गर्म हो जाता है—विचारकी दृष्टिसे देखें तो यह सब मेरी माया ही है। इसी प्रकार ग्रीष्म-ऋतुमें जल ठंडा हो जाता है। पश्चिम दिशामें जाकर सूर्य अस्त हो जाते हैं। पुनः वे प्रातःकाल पूरबमें उदित होते हैं। प्राणियोंके शरीरमें रक्त और शुक्र—इन दोनोंका समावेश रहता है, वस्तुतः यह सब मेरी माया ही तो है। सुन्दरि! प्राणी गर्भमें आता है, उसे वहाँ सुख और दुःखका अनुभव होता है, पुनः उत्पन्न हो जानेपर उसे वह बात भूल जाती है। अपने कर्ममें रचा-पचा जीव अपने स्वरूपको भूल जाता है, उसकी स्पृहा समाप्त हो जाती है, वस्तुतः यह सब मेरी मायाका ही प्रताप है। कर्मके प्रभावसे जीव दूसरी जगह पहुँच जाता है। शुक्र और रक्तके संयोगसे जीवधारियोंकी उत्पत्ति होती है, दो भुजाएँ, दो पैर, बहुत-सी अँगुलियाँ, मस्तक, कटि, पीठ,