वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य २११
ब्राह्मणके इस प्रकार कहनेपर भी निषाद वहाँसे नहीं गया, उसने मीठे स्वरमें उनसे पूछा—'विप्रवर! आपके द्वारा कौन-सा पाप बन गया था, जिससे आप स्त्री बन गये थे और अब फिर पुरुष हो गये? यह मुझे बतानेकी कृपा करें।'
इसपर ऋषिने कहा—'मैं हरिद्वार तीर्थके तटवर्ती क्षेत्रोंमें भ्रमण करता और एक ही बार भोजन कर जगदीश्वर जनार्दनकी पूजा करता रहता था। उन प्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षासे मैंने बहुत-से उत्तम धर्म-कर्म किये। बहुत समय बीत जानेके पश्चात् मुझे भगवान् श्रीहरिने दर्शन दिया और मुझसे वर माँगनेको कहा। मैंने प्रार्थना की—'प्रभो! आप भक्तोंपर कृपा करनेवाले सर्वव्यापक पुरुष हैं। आप मुझे अपनी मायाका दर्शन कराइये।'
इसपर भगवान् विष्णुने कहा था—'ब्राह्मणदेव! माया देखनेकी इच्छा छोड़ दो।' किंतु मैंने बार-बार उनसे वही आग्रह किया, तब भगवान्ने कहा—'अच्छा, नहीं मानते हो तो 'कुब्जाम्रक' क्षेत्र (ऋषिकेश)-में जाओ। वहाँ गङ्गामें स्नान करनेपर तुम्हें माया दिखलायी पड़ेगी और वे अन्तर्धान हो गये। मैं भी माया-दर्शनकी लालसासे गङ्गातटपर गया और वहाँ अपने दण्ड, कमण्डलु एवं वस्त्रको यत्नसे एक ओर रखकर स्नान करनेके लिये निर्मल जलमें पैठा। इसके बाद मैं कुछ भी न जान सका कि कहाँ क्या है और क्या हो रहा है? तत्पश्चात् मैं किसी मल्लाहिनके उदरसे कन्याके रूपमें उत्पन्न होकर तुम्हारी पत्नी बन गया। वही मैं आज फिर किसी कारण जब गङ्गाके जलमें पैठकर स्नान करने लगा तो पहले-जैसे ही ऋषिके रूपमें परिणत हो गया हूँ। निषाद! देखो, पहले-जैसे ही यहाँ मेरी कुण्डी और मेरे वस्त्र भी विराजमान हैं। पचास वर्षोंतक मैं तुम्हारे घरमें रह चुका हूँ, परंतु मेरे पास जो दण्ड एवं वस्त्र थे, जिन्हें गङ्गाके तटपर मैंने रखा था, अभी जीर्ण-शीर्ण नहीं हुए हैं और न वे गङ्गाके प्रवाहोंद्वारा प्रवाहित ही हुए हैं।
ब्राह्मणके इस प्रकार कहते ही वह निषाद सहसा गायब हो गया। उसके साथ जो बालक थे, वे भी तिरोहित हो गये। देवि! यह देखकर वह ब्राह्मण भी चकित होकर पुनः तपमें संलग्न हो गया। उसने अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर साँसकी गति भी रोक ली और केवल वायुके आहारपर रहने लगा। इस तरह अपराह्न हो गया। इस प्रकार कुछ समय तपस्या कर जब वह जलसे बाहर आया तो श्रद्धापूर्वक पूजाके लिये कुछ पुष्पोंको तोड़कर विधिपूर्वक भगवान्की पूजा करनेके लिये वीरासनसे बैठ गया। अब बहुत-से प्रधान तपस्वी ब्राह्मणोंने जो वहाँ गङ्गामें स्नान करनेके लिये आये थे, उसे घेर लिया और उससे कहने लगे—'द्विजवर! आपने आज पूर्वाह्नमें अपने दण्ड, कमण्डलु और अन्य उपकरण यहाँ रख दिये थे और स्नान कर मल्लाहोंके पास गये थे, फिर क्या आप यह स्थान भूलकर कहीं अन्यत्र चले गये थे? आपके आनेमें इतनी देर कैसे हुई?'
देवि! जब उस मुनिने ब्राह्मणोंकी बात सुनी तो वह मौन हो गया। साथ ही बैठकर वह मन-ही-मन ब्राह्मणोंद्वारा निर्दिष्ट बातपर सोचने लगा। "एक ओर तो उधर पचास वर्षका समय व्यतीत हो गया है और इधर अमावस्या भी आज ही है। ये सब ब्राह्मण मुझसे कह रहे हैं 'तुमने पूर्वाह्नमें अपने वस्त्रोंको यहाँ स्नानके लिये रखा तो अब अपराह्नमें इन्हें लेने क्यों आये हो? तुम्हें इतनी देर कैसे हो गयी,' यह सब क्या बात है?" देवि! ठीक इसी समय मैंने ब्राह्मणको पुनः अपना रूप