भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १४९ ] द्वारका-माहात्म्य २७९

देवि! मेरे इस द्वारकाक्षेत्रमें 'पञ्चपिण्ड' नामसे प्रसिद्ध एक गुह्य स्थान है, उसमें अगाध जल है। उसे पार करना सभीके लिये कठिन है। वह एक कोसके विस्तारमें फैला है। मनुष्य पाँच रात वहाँ रहकर मेरा अभिषेक करे। इससे वह इन्द्रके लोकमें निःसंदेह आनन्द भोगता है। यशस्विनि ! यदि वहाँ उसके प्राण शरीरसे निकल गये तो फिर वह वहाँसे मेरे धाममें पहुँच जाता है। उसी द्वारकाक्षेत्रमें हंसकुण्ड-नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जहाँ 'मणिपूर' पर्वतसे होकर एक जलकी धारा गिरती है। उस तीर्थमें छः दिनोंतक रहकर स्नान करनेकी बड़ी महिमा है। महाभागे ! इसमें स्नान करनेवाला व्यक्ति आसक्तिरहित होकर वरुणलोकमें आनन्द प्राप्त करता है। वरानने ! यदि उस 'हंसतीर्थ' में वह अपने पाञ्चभौतिक शरीरका त्याग करता है तो वरुणलोकका परित्याग कर मेरे लोकमें पहुँचकर प्रतिष्ठा पाता है। उसी प्रसिद्ध द्वारकाक्षेत्रमें 'कदम्ब' नामसे प्रसिद्ध एक स्थान है। यह वह स्थान है, जहाँ वृष्णिकुलके शुद्ध व्यक्ति मेरे धाम सिधारे थे। मनुष्यको चाहिये कि चार राततक वहाँ निवास करके मेरा अभिषेक करे। ऐसा करनेसे वह पुण्यात्मा पुरुष निःसंदेह ऋषियोंके लोकोंको प्राप्त कर लेता है।

वसुंधरे! मेरे उसी द्वारकाक्षेत्रमें 'चक्रतीर्थ' नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ स्थान है। वहाँ मणिपूर पर्वतसे होती हुई जलकी पाँच धाराएँ गिरती हैं। पाँच दिनोंतक वहाँ रहकर अभिषेक करनेवाला मनुष्य दस हजार वर्षोंतक स्वर्गमें सुख भोगता है। लोभ और मोहसे मुक्त होकर मानव यदि वहाँ प्राण छोड़ता है तो सम्पूर्ण आसक्तियोंका परित्याग कर वह मेरे धाममें चला जाता है। उसी द्वारकाक्षेत्रमें एक 'रैवतक' नामका तीर्थ है, जहाँ मैं लीला करता हूँ, वह स्थान समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध है। बहुत-सी लताएँ, वल्लरियाँ और फूल उसकी छवि छिटकाते रहते हैं। उसके दसों दिशाओंमें अनेक वर्णवाले पत्थर तथा गुहाएँ हैं और वह वापियों तथा कन्दराओंसे भी युक्त है तथा देवसमुदायके लिये भी दुर्लभ है। मनुष्यको छः दिनोंतक वहाँ रहकर अभिषेक करना चाहिये। फिर तो वह कृतकृत्य होकर निश्चय ही चन्द्रमाके लोकमें चला जाता है। मेरी पूजामें निरत वह पुरुष यदि वहाँ प्राणोंका त्याग करता है तो उस लोकसे मेरे धाममें निवास करने चला जाता है। महाभागे ! वहाँकी भी एक अलौकिक बात बतलाता हूँ, सुनो। धर्मके अभिलाषी प्रायः सभी पुरुष वह दृश्य देख सकते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। वहाँ सम्पूर्ण वृक्षोंके बहुत-से पत्ते गिरते हैं, किंतु एक भी पत्ता किसीको दिखायी नहीं पड़ता। सभी पत्ते विमल जलमें चले जाते हैं। एक विशाल वृक्ष मेरे पूर्वभागमें है तथा इसके अतिरिक्त कुछ वृक्ष मेरे पार्श्वभागमें हैं। देवतालोग भी इन वृक्षोंका दर्शन करनेमें असमर्थ हैं। पाँच कोसका विस्तारवाला वह स्थान तथा महान् वृक्ष—ये दोनों अत्यन्त शोभनीय हैं। सुन्दर गन्धवाले पद्म एवं उत्पल उसे चारों ओरसे घेरे हुए हैं। बहुत-सी मछलियाँ और जलोंसे पूर्ण तालाब भी उसके सभी भागोंमें हैं। मनुष्यको आठ दिनोंतक वहाँ रहकर अभिषेक करना चाहिये। इसमें स्नान करनेवाला अप्सराओंसे युक्त दिव्य नन्दनवनमें विहार करता है।

वसुंधरे! मेरे इस द्वारका-क्षेत्रमें 'विष्णुसंक्रम' नामका एक स्थान है, जहाँ 'जरा' नामक व्याधने मुझे अपने बाणसे मारा था। मैंने वहाँ पुनः अपनी मूर्तिकी स्थापना कर दी है। महाभागे! वहाँ एक कुण्ड भी है। यह स्थान 'मणिपूर पर्वत' पर है, ऐसा सुना जाता है। वहाँ जलकी एक धारा गिरती है।