वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १५३—१५५ ] मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य २८५
बलिने पहले सूर्यदेवकी उपासना की थी। उसकी उपासनासे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यदेवने तपका कारण पूछा। इसपर बलिने कहा—‘देवेश्वर! पातालमें मेरा निवास है। इस समय मैं राज्यसे वञ्चित हो गया हूँ एवं धनहीन हूँ।’ इसपर भगवान् सूर्यने बलिको अपने मुकुटसे चिन्तामणि निकालकर दिया, जिसे लेकर बलि पाताललोक चले गये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यके समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं और वहाँ मरनेपर उस प्राणीको मेरे लोककी प्राप्ति होती है। देवि! प्रत्येक रविवारके दिन, संक्रान्तिके अवसरपर अथवा सूर्य एवं चन्द्रग्रहणमें उस तीर्थमें स्नान करनेसे राजसूय-यज्ञके समान फल मिलता है। ध्रुवने भी यहीं स्नानादिपूर्वक कठोर तपस्या की थी, जिससे वह आज भी ‘ध्रुवलोक’ में प्रतिष्ठा पाता है। वसुंधे! जो पुरुष इस ‘ध्रुवतीर्थ’ में श्रद्धा रखता है, उसके सभी पितर तर जाते हैं। ‘ध्रुवतीर्थ’ के दक्षिणभागमें तीर्थराजका स्थान है। देवि! वहाँ अवगाहन कर मानव मेरा धाम प्राप्त करता है। देवि! मथुरामें ‘कोटितीर्थ’ नामक एक स्थान है, जिसका दर्शन देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। वहाँ स्नान एवं दान करनेसे मेरे धाममें प्रतिष्ठा मिलती है। उस ‘कोटितीर्थ’ में स्नान करके पितरों एवं देवताओंका तर्पण करना चाहिये। इससे पितामह आदि सभी पितर तर जाते हैं। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा पाता है। यहीं पितरोंके लिये भी दुर्लभ एक ‘वायुतीर्थ’ है, जहाँ पिण्डदान करनेसे पुरुष पितृलोकमें जाता है। देवि! गयामें पिण्डदान करनेसे मनुष्यको जो फल मिलता है, वही फल यहाँ ज्येष्ठमें पिण्ड देनेसे प्राप्त हो जाता है—इसमें कोई संशय नहीं। इन बारह तीर्थोंका केवल स्मरण करनेसे भी पाप दूर हो जाते हैं और मनुष्यकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। [ अध्याय १५२ ]
मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य
**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! ‘शिवकुण्ड’—के उत्तर ‘नवक’नामक एक पवित्र क्षेत्र है, जहाँ स्नान करनेमात्रसे ही प्राणीको सौभाग्य सुलभ हो जाता है और पापी पुरुष भी मेरे धाममें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
अब इस तीर्थकी एक पुरानी घटना सुनो। पहले नैमिषारण्यमें एक दुष्ट निषाद रहता था। एक बार वह किसी मासकी चतुर्दशीको मथुरा आया और उसके मनमें यमुनामें तैरनेकी इच्छा उत्पन्न हुई। यद्यपि वह यमुनामें तैरता हुआ ‘संयमन’ तीर्थतक पहुँच गया, फिर भी दैवयोगसे वह उससे बाहर न निकल पाया और वहीं उसका प्राणान्त भी हो गया। दूसरे जन्ममें वही (निषाद) क्षत्रियवंशमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण भूमण्डलका स्वामी बना, जिसकी राजधानी सौराष्ट्रमें थी और कालान्तरमें वही ‘यक्ष्मधनु’ नामसे प्रख्यात हुआ। वह अपने धर्म (क्षात्रधर्म तथा राजधर्म)-का भलीभाँति पालन करता तथा अपने राज्यकी रक्षा और प्रजाका रञ्जन करनेमें समर्थ और सफल था। उसका विवाह काशिराजकी सुन्दरी कन्या पीवरीसे हुआ। यक्ष्मधनुकी और भी रानियाँ थीं, किंतु सभी रानियोंमें पीवरी ही उसे सबसे अधिक प्रिय थी। वह उसके साथ भवनों, उद्यानों, उपवनों और नदी-तटोंपर विहार करता हुआ राज्यसुखका उपभोग करने लगा। कालान्तरमें उसके सात पुत्र और पाँच पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार यक्ष्मधनुके सतहत्तर वर्ष बीत गये। एक समय जब वह शयन कर रहा था तो अचानक उसे मथुराके संयमन-तीर्थकी स्मृति हो आयी और उसके मुँहसे ‘हा! हा!’ शब्द निकलने लगा। इसपर पासमें सोयी उसकी पटरानी