भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 414 में से

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पृष्ठ 306

अध्याय १६१-१६२] देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव २९५

अपने नामसे अङ्कित भगवान् शंकरकी प्रतिमा स्थापित कर दी। इससे उन्हें यात्रामें सफलता मिली। अतः इनका दर्शन शुभका सूचक है। मन्दिरमें प्रवेश करते समय दक्षिण-भागका सुशब्द कार्यकी अनुकूलता सूचित करता है। स्वयं श्रीकृष्णको कंसवधकी सफलताके लिये प्रार्थना करनेपर इन देवीका शुभसूचक उत्तम दर्शन पहले और अन्तमें भी प्राप्त हुआ था। अतः इनका दर्शन करनेसे मनुष्यके सभी अभीष्ट कार्य पूर्ण होते हैं। उस समय कंसके बड़े-बड़े पहलवानोंको मारनेके विचारसे श्रीकृष्णने वज्रके समान मुखवाले भगवान् सूर्यका भी ध्यान किया था। जब वे सभी मल्ल कालके ग्रास बन गये, तब उन्होंने वहीं उन वज्रानन सूर्यकी स्थापना कर दी। तबसे मथुरामें निवास करनेवाले व्यक्तियोंने इन वरदाता सूर्यको अपने कुलका प्रधान देवता मान लिया है। अतः 'सूर्य-तीर्थ' पर उनका दर्शन करके प्रदक्षिणाकी यात्रा समाप्त करनी चाहिये। मथुराकी प्रदक्षिणाके समय मनुष्यके जितने पैर पृथ्वीपर पड़ते हैं, उसके कुलके उतने व्यक्ति सनातन सूर्यलोकमें स्थान पाते हैं। मथुराकी परिक्रमा पूर्ण करके आनेवाले मनुष्यको जो कोई भी देख लेता है तो वह भी पापोंसे छूट जाता है और जो परिक्रमाकी बात सुनते हैं, वे भी अपराधोंसे मुक्त होकर परमपद प्राप्त कर लेते हैं।

[अध्याय १५८-१६०]


देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! अधर्मी एवं दुरात्मा मनुष्य भी मथुराके सेवनसे तथा वहाँके वनोंके दर्शन अथवा उस पुरीकी परिक्रमासे नरकक्लेशसे मुक्त हो जाते हैं तथा स्वर्गभोगके अधिकारी हो जाते हैं।

देवि! इस मथुरामण्डलमें बारह वन हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—मधुवन, तालवन, कुन्दवन, काम्यकवन, बहुवन, भद्रवन, खदिरवन, महावन, लौहवन, बिल्ववन, भाण्डीर-वन और वृन्दावन। ये सभी परम श्रेष्ठ और मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। लौहवनके प्रभावसे प्राणीके समस्त पाप दूर हो जाते हैं तथा बिल्ववन तो देवताओंसे भी प्रशंसित है। जो मानव इन वनोंका दर्शन करते हैं, उन्हें नरक नहीं भोगना पड़ता।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! अब मथुराके उत्तर भागमें स्थित 'चक्रतीर्थ' की महिमा कहता हूँ, उसे सुनो। पहले जम्बूद्वीपकी शोभा बढ़ानेवाला 'महागृहोदय' नामसे प्रसिद्ध एक उत्तम नगर था। शुभे! उस दिव्य नगरमें एक वेदोंका पारगामी प्रतिष्ठित ब्राह्मण रहता था। देवि! एक समयकी बात है, वह अपने पुत्रको लेकर शालग्राम (मुक्तिनाथ) तीर्थको गया और वहीं अपना निवास बना लिया। सदा वह नियमतः वहाँ पवित्र नदीमें स्नानकर देवताओंका दर्शन करता, यही उसका नित्यकर्म था। वहीं उसे एक 'कान्यकुब्ज' के सिद्ध पुरुषके दर्शन हुए, जो बहुधा 'कल्पग्राम' में भी जाया करता था। बातचीतके प्रसङ्गमें वह सिद्ध प्रायः प्रतिदिन 'कल्पग्राम' की प्रशंसा करता। उस ग्रामकी विभूति सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके मनमें भी विचार उठा कि मैं भी उस 'कल्पग्राम' में चलूँ और उसने सिद्ध पुरुषसे प्रार्थना की—'मित्रवर! आप सिद्ध पुरुष हैं, अतः एक बार मुझे भी आप 'कल्पग्राम' ले चलनेकी कृपा कीजिये।'

पृथ्वि! उस श्रेष्ठ ब्राह्मणकी बात सुनकर सिद्ध पुरुषने कहा—'द्विजवर! वहाँ तो केवल सिद्ध पुरुष ही जा सकते हैं, सामान्य व्यक्तिका वहाँ जाना सम्भव नहीं है।' इसपर उस ब्राह्मणने

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