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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १७४ ] ब्राह्मण-प्रेत-संवाद, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि ३१३

वर दिया। देवियाँ भी गोकर्णसे—'तुम्हारा कल्याण हो'—यों कहकर दिव्य लोकमें चली गयीं। अयोध्या-नरेशने गोकर्णको बहुत-से गाँव, अमूल्य वस्त्र, हाथी, घोड़े तथा अन्य अपार धन भी दिये। 'बाग-बगीचे लगाना परम धर्म है। इससे आश्चर्यमय महान् फलकी प्राप्ति होती है'—यह सुनकर उस नरेशने अन्य उद्यानोंके आरोपणकी भी व्यवस्था कर दी।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! गोकर्ण न्यायका पालन करते हुए अब मथुरामें निवास करने लगा। उसने घर पहुँचकर अपने माता और पिताके चरणकमलोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। उस तोतेने भी गोकर्णके माता-पिता और चारों सहधर्मिणियोंका अपने वैभव एवं शक्तिके अनुसार सम्मान करके उनकी पूजा की। मथुरामें निवास करनेवाली प्रजाको बाग लगानेकी प्रेरणा दी। फिर गोकर्णने एक यज्ञ आरम्भ किया और ब्राह्मणोंको उत्तम भोज्य एवं अन्य बहुत-से दान दिये। तोतेको हृदयसे लगाकर भली प्रकार उसने देखा और गद्गद होकर कहने लगा—'यह ऐसा जीव है, जिसकी कृपासे मुझे जीवन, सद्धर्म तथा उत्तम गतिकी प्राप्ति हुई है।'

गोकर्णने मथुरामें एक मन्दिर बनवाया और उसका नाम 'शुकेश्वर' मन्दिर रखा। उसमें 'शुकेश्वर'के नामसे एक प्रतिमा भी स्थापित की और एक अन्न-वितरण करनेकी संस्था भी खोल दी। उसमें दो सौ ब्राह्मणोंको भोजनके लिये प्रतिदिन अन्न बाँटने लगा। गोकर्णने उस संस्थाका नाम 'शुकसत्र' रख दिया। उस स्थानपर जिसकी मृत्यु होती है, वह मुक्त हो जाता है। अन्तमें वह सुग्गा भी विचित्र विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकमें चला गया। जिस शबरकी कृपासे गोकर्णको वह तोता प्राप्त हुआ था, उसका उद्धार होनेके लिये गोकर्णने त्रिवेणी-स्नानका फल अर्पण कर दिया। अतः वह शबर अपनी पत्नीसहित स्वर्ग गया। शुकोदरके साथ ही वे सभी दिव्य विमानपर विराजमान होकर स्वर्ग गये।

वसुंधरे! इस प्रकार मैंने तुमसे मथुराके सरस्वती-सङ्गममें स्नानका, गोकर्णेश्वर शिवके दर्शनका, गोकर्ण नामक वैश्यकी अविनाशी संतानका तथा उसके सुख-सुखोपभोग और मुक्तिलाभका वर्णन कर दिया। [अध्याय १७२-१७३]


ब्राह्मण-प्रेत-संवाद*, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! त्रिवेणी-सङ्गमसे सम्बन्धित एक दूसरा प्रसङ्ग सुनो। पूर्व समयमें यहीं महानाम वनमें उत्तम व्रतका पालन करनेवाला एक 'महानाम' संज्ञक योगाभ्यासी ब्राह्मण भी रहता था। एक बार तीर्थयात्राके विचारसे उसने मथुराकी यात्रा की, मार्गमें उसे पाँच विकराल प्रेत मिले। उनसे ब्राह्मणने पूछा—'अत्यन्त भयंकर रूपवाले आपलोग कौन हैं? तथा आपलोगोंका ऐसा बीभत्स रूप किस कर्मसे हुआ है?'

अब प्रथम प्रेत बोला—'हमलोग प्रेत हैं और हमारे नाम क्रमशः 'पर्युषित', 'सूचीमुख', 'शीघ्रग', 'रोधक' और 'लेखक' हैं। इनमेंसे मैं तो स्वयं स्वादिष्ट भोजन करता और बासी अन्न ब्राह्मणको दिया करता था, इसी कारण मेरा नाम 'पर्युषित' पड़ा है। इस दूसरेके पास अन्न पानेकी इच्छासे जो ब्राह्मण आते थे उनको यह मार डालता था, अतः यह 'सूचीमुख' है। इस


* पुराणोंमें यह प्रेत-प्रसङ्ग बहुत प्रसिद्ध है और प्रायः इन्हीं नामोंसे 'वायुपुराणके 'माघमाहात्म्य' तथा स्कन्दादि पुराणोंमें भी प्राप्त होता है।